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गंगूबाई हंगल: भारतीय शास्त्रीय संगीत की अनमोल धरोहर

गंगूबाई हंगल, भारतीय शास्त्रीय संगीत की एक महान गायिका, ने अपने संगीत सफर की शुरुआत 13 साल की उम्र में की। उन्होंने किराना घराने की परंपरा को आगे बढ़ाया और खयाल गायकी में अपनी पहचान बनाई। उनके योगदान के लिए उन्हें कई सम्मान मिले, जिनमें पद्म भूषण और पद्म विभूषण शामिल हैं। जानें उनके संघर्ष, उपलब्धियों और संगीत के प्रति उनके समर्पण के बारे में।
 

गंगूबाई हंगल का संगीत सफर


मुंबई, 20 जुलाई। गंगूबाई हंगल ने अपनी अद्भुत आवाज से शास्त्रीय संगीत को एक नई पहचान दी। उनका संगीत का सफर बहुत कम उम्र में शुरू हुआ। उन्होंने केवल 13 वर्ष की आयु में संगीत की शिक्षा लेना आरंभ किया और बाद में किराना घराने की प्रमुख गायिकाओं में से एक बन गईं। 21 जुलाई 2009 को उनका निधन हो गया, लेकिन उनकी साधना और भारतीय शास्त्रीय संगीत में उनके योगदान को हमेशा याद किया जाएगा।


प्रारंभिक जीवन और शिक्षा

गंगूबाई हंगल का जन्म 5 मार्च 1913 को कर्नाटक के धारवाड़ में हुआ। उनका परिवार संगीत से भरा हुआ था, उनकी मां अंबाबाई एक कर्नाटकी संगीत गायिका थीं, जिससे घर में हमेशा संगीत का माहौल बना रहता था। गंगूबाई की संगीत में रुचि बचपन से ही थी, और उनकी मां ने उनकी प्रतिभा को पहचानकर उन्हें प्रारंभिक शिक्षा देना शुरू किया।


संगीत में संघर्ष और सफलता

उस समय महिलाओं के लिए संगीत को पेशे के रूप में अपनाना आसान नहीं था। समाज में कई तरह की बाधाएं थीं और कलाकारों को सम्मान पाने के लिए संघर्ष करना पड़ता था। गंगूबाई ने भी इन चुनौतियों का सामना किया, लेकिन उन्होंने अपने सपनों को कभी नहीं छोड़ा। 13 साल की उम्र में उन्होंने हिंदुस्तानी संगीत की औपचारिक शिक्षा ली और कई गुरुओं से संगीत की बारीकियां सीखी। उन्हें प्रसिद्ध संगीत गुरु सवाई गंधर्व का मार्गदर्शन मिला, जो किराना घराने के प्रमुख कलाकार थे।


खयाल गायकी में पहचान

गंगूबाई हंगल की पहचान मुख्य रूप से खयाल गायकी से बनी। अपने करियर की शुरुआत में उन्होंने भजन, ठुमरी और शास्त्रीय संगीत की प्रस्तुति दी, लेकिन बाद में उन्होंने पूरी तरह से खयाल गायकी को अपनाया। 1940 के दशक तक, वह देश की प्रमुख शास्त्रीय गायिकाओं में शामिल हो चुकी थीं। उन्होंने देशभर में कार्यक्रम किए और ऑल इंडिया रेडियो के माध्यम से उनकी आवाज लाखों लोगों तक पहुंची।


सम्मान और योगदान

गंगूबाई हंगल ने लगभग सात दशकों तक संगीत की सेवा की। उन्होंने न केवल मंच पर प्रस्तुतियां दीं, बल्कि नई पीढ़ी के कलाकारों को भी संगीत की शिक्षा दी। वह कर्नाटक विश्वविद्यालय में मानद संगीत प्रोफेसर भी रहीं। उनके योगदान के लिए उन्हें कई बड़े सम्मान मिले, जैसे कि 1971 में पद्म भूषण, 1973 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, और 2002 में पद्म विभूषण।


अंतिम दिन और विरासत

गंगूबाई हंगल ने 2006 में अपने संगीत जीवन के 75 साल पूरे होने पर आखिरी सार्वजनिक कार्यक्रम दिया। उनका निधन 21 जुलाई 2009 को 96 वर्ष की आयु में कर्नाटक के हुबली में हुआ। उन्होंने अपनी आंखें दान कर अंगदान के प्रति जागरूकता बढ़ाने का संदेश भी दिया।


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