Movie prime

क्या तकनीक संगीत की आत्मा को छू सकती है? मुज्तबा अजीज नजा का अनोखा दृष्टिकोण

मुज्तबा अजीज नजा, एक प्रसिद्ध भारतीय गायक, ने हाल ही में संगीत की आध्यात्मिकता और तकनीक के बढ़ते प्रभाव पर अपने विचार साझा किए। उन्होंने बताया कि संगीत केवल सुरों का खेल नहीं है, बल्कि यह एक गहरी आध्यात्मिक साधना है। नजा ने अपने नए प्रोजेक्ट 'डूमेडिका सुल्तान' के बारे में भी जानकारी दी, जिसमें उनकी सूफी जड़ों की झलक देखने को मिलेगी। जानें उनके विचार और संगीत के प्रति उनके दृष्टिकोण के बारे में।
 
क्या तकनीक संगीत की आत्मा को छू सकती है? मुज्तबा अजीज नजा का अनोखा दृष्टिकोण

संगीत और तकनीक: एक आध्यात्मिक संवाद




मुंबई, 25 अप्रैल। प्रसिद्ध भारतीय गायक, कव्वाल और संगीतकार मुज्तबा अजीज नजा ने हाल ही में एक मीडिया चैनल के साथ बातचीत में संगीत की बदलती परिभाषा, तकनीक के प्रभाव और अपनी सूफी परंपरा पर विचार साझा किए।


उन्होंने बताया कि संगीत केवल सुरों का खेल नहीं है, बल्कि यह एक गहरी आध्यात्मिक साधना है, जिसे एआई कभी भी प्रतिस्थापित नहीं कर सकता।


गायक ने एआई के बढ़ते प्रभाव पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि तकनीक सहायक हो सकती है, लेकिन वह संगीत की आत्मा को नहीं छू सकती। उनका कहना था, "संगीत एक गहन भावनात्मक और आध्यात्मिक अनुभव है। एआई केवल उन सीमाओं के भीतर कार्य करता है, जो उसे सिखाई गई हैं।"


उन्होंने यह भी कहा कि सूफी और कव्वाली जैसी शैलियाँ सीधे दिल से निकलती हैं और आध्यात्मिक प्रेरणाओं पर आधारित होती हैं। ऐसी गहराई को कोई मशीन नहीं समझ सकती।


मुज्तबा अजीज नजा ने अपने नए प्रोजेक्ट 'डूमेडिका सुल्तान' के बारे में जानकारी दी, जिसमें उनकी सूफी जड़ों की झलक देखने को मिलेगी। उन्होंने कहा, "यह गाना पहले ही तैयार हो चुका था, लेकिन किसी कारणवश इसे रिलीज नहीं किया गया। अब मैं इसे स्वतंत्र रूप से प्रस्तुत करने जा रहा हूँ।"


फिल्मी गानों और स्वतंत्र संगीत के बीच के अंतर पर उन्होंने कहा, "फिल्मों में काम करते समय कलाकार को कई दृष्टिकोणों का ध्यान रखना पड़ता है, जिससे उनकी अभिव्यक्ति सीमित हो जाती है। स्वतंत्र संगीत में, कलाकार को अपनी रचनात्मकता को व्यक्त करने की पूरी स्वतंत्रता मिलती है।"


लाइव इवेंट्स और कव्वाली के अनुभवों पर बात करते हुए उन्होंने कहा, "हालांकि मैं गानों की एक सूची लेकर मंच पर जाता हूँ, असली जादू दर्शकों की ऊर्जा से होता है। जब दर्शकों की प्रतिक्रिया मिलती है, तो हम खुद को उसी के अनुसार ढाल लेते हैं।"


आज के व्यावसायिक युग में, मुज्तबा ने संगीत को 'आध्यात्मिक साधना' बताया और कहा कि अब इसे केवल एक पेशे के रूप में देखा जाने लगा है, जिससे भक्ति का भाव कम होता जा रहा है।


OTT