साउथ में थिएटर संस्कृति का जादू: क्या है इसकी वजह?
थिएटर संस्कृति का विकास
मुंबई, 30 सितंबर (वेब वार्ता)। ओटीटी प्लेटफॉर्म्स के उदय ने फिल्म देखने के तरीके में क्रांतिकारी बदलाव लाया है। अब नई फिल्मों को थिएटर में रिलीज होने के कुछ समय बाद ही घर पर देखना संभव हो गया है। इसका प्रभाव सिनेमाघरों पर भी स्पष्ट है। हालांकि, देश के विभिन्न क्षेत्रों में थिएटर जाने की आदत में काफी भिन्नता देखी जाती है।
विशेष रूप से दक्षिण भारत के कई हिस्सों में लोग आज भी बड़े पर्दे पर फिल्में देखने के लिए सिनेमाघरों का रुख करते हैं, जबकि उत्तर के कई क्षेत्रों में थिएटर जाने की प्रवृत्ति में कमी आई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इसके पीछे केवल ओटीटी का प्रभाव नहीं है, बल्कि टिकट की कीमतें, थिएटर का माहौल और स्थानीय दर्शकों तक सिनेमा की पहुंच भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
टिकट की कीमतों का प्रभाव
इस विषय पर बात करते हुए ट्रेड एनालिस्ट गिरीश वानखेड़े ने कहा, "दक्षिण और उत्तर के बीच का मुख्य अंतर यह है कि वहां टिकट की कीमतों का एक निश्चित स्लैब है। इसका अर्थ है कि एक निर्धारित कीमत से अधिक टिकट नहीं बेचे जा सकते, जबकि उत्तर में ऐसी कोई सीमा नहीं है।"
उन्होंने आगे कहा, "किफायती टिकटों के कारण अधिक लोग सिनेमाघरों में फिल्में देखने आते हैं और कई थिएटरों में नियमित ऑक्यूपेंसी 70 प्रतिशत से अधिक रहती है। दक्षिण में एसोसिएशन और यूनियन ने भी टिकट की कीमतों को एक सीमा से अधिक बढ़ने नहीं दिया है, जबकि उत्तर में स्थिति भिन्न है।"
दर्शकों की बदलती आदतें
थिएटर उद्योग से जुड़े विशेक चौहान का मानना है कि केवल टिकट की कीमतें ही पूरी कहानी नहीं बतातीं। बिहार के पूर्णिया के चौथी पीढ़ी के थिएटर मालिक विशेक चौहान ने कहा कि बढ़ती कीमतों ने फिल्मों की खपत पर असर डाला है। पहले दर्शक साल में 10-12 फिल्में देखने जाते थे, अब वे केवल एक या दो फिल्मों के लिए ही थिएटर पहुंचते हैं।
विशेक चौहान ने टिकट दरों की तुलना करते हुए कहा, "चेन्नई और दिल्ली जैसे शहरों में काफी अंतर है। दिल्ली में आपको 700 रुपए में टिकट बेचनी पड़ती है, जबकि चेन्नई में यह 190 रुपए में बिकती है।"
प्रीमियम अनुभव का प्रभाव
उन्होंने यह भी कहा, "आज के कई बड़े मल्टीप्लेक्स खुद को प्रीमियम या लाइफस्टाइल अनुभव के रूप में पेश करते हैं। बीडीआर, आइनॉक्स और सिनेपोलिस जैसे महंगे विकल्प आम दर्शकों को दूर कर सकते हैं। आम दर्शक महंगे और प्रीमियम थिएटरों में जाने में सहज महसूस नहीं करते। थिएटर उद्योग को ऐसे स्थान बनाने होंगे जहां सामान्य परिवार आसानी से फिल्म देखने जा सकें।"
भाषाई विविधता का लाभ
विशेक चौहान ने एक और महत्वपूर्ण मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा, "उत्तर भारत में दर्शक लंबे समय से मुख्य रूप से हिंदी फिल्मों पर निर्भर रहे हैं, जबकि दक्षिण में एक ही क्षेत्र में विभिन्न भाषाओं की फिल्मों के लिए दर्शक मिल जाते हैं। कर्नाटक जैसे बाजारों में कन्नड़, तेलुगु, तमिल, मलयालम, हिंदी और हॉलीवुड फिल्मों के लिए भी दर्शक मौजूद हैं। इससे थिएटर व्यवसाय को कंटेंट के अधिक विकल्प मिलते हैं।"
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