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महेंद्र कपूर: भारतीय संगीत के अनमोल सितारे की कहानी

महेंद्र कपूर, भारतीय संगीत के एक अद्वितीय सितारे, ने अपने करियर की शुरुआत 1957 में की थी। उनकी आवाज ने न केवल फिल्म उद्योग में बल्कि हर घर में एक विशेष स्थान बनाया। मोहम्मद रफी को अपना गुरु मानने वाले महेंद्र कपूर ने कई यादगार गाने गाए, जिनमें 'मेरे देश की धरती' और 'चलो एक बार फिर से अजनबी बन जाएं हम दोनों' शामिल हैं। उनके योगदान ने उन्हें हर दिल में अमर बना दिया। जानें उनके जीवन की अनकही कहानियाँ और संगीत यात्रा के बारे में।
 
महेंद्र कपूर: भारतीय संगीत के अनमोल सितारे की कहानी

महेंद्र कपूर का अद्वितीय सफर




मुंबई, 8 जनवरी। यह कहानी 1957 की है, जब मुंबई के 'मेट्रो' सिनेमा हॉल में दर्शकों की भीड़ उमड़ पड़ी थी। मंच पर संगीत के दिग्गज जैसे नौशाद अली, अनिल बिस्वास, सी रामचंद्र और मदन मोहन उपस्थित थे। उस समय 'मर्फी ऑल इंडिया गायन प्रतियोगिता' का आयोजन हो रहा था। तभी एक युवा गायक ने मंच पर कदम रखा और जैसे ही उसने "इलाही कोई तमन्ना नहीं जमाने में, मेरी जवानी तो गुजरी शराबखाने में..." गाया, पूरा हॉल चुप हो गया।


जजों की आंखों में चमक थी, लेकिन पर्दे के पीछे कुछ प्रतिकूलताएं भी थीं। एक प्रतियोगी ने आरोप लगाया कि यह युवक पहले से ही एक फिल्म में गा चुका है। यह विवाद इतना बढ़ गया कि युवक का करियर शुरू होने से पहले ही खत्म हो सकता था, लेकिन अनिल बिस्वास ने उसकी रक्षा की। वह युवक न केवल प्रतियोगिता का विजेता बना, बल्कि भारतीय संगीत के आकाश पर 'महेंद्र कपूर' के नाम से चमकने लगा।


महेंद्र कपूर का जन्म 9 जनवरी 1934 को अमृतसर में हुआ। उनका परिवार कपड़ों के व्यापार में था, लेकिन महेंद्र को संगीत की ओर झुकाव था। जब उनका परिवार मुंबई आया, तो उनके सपनों की शुरुआत हुई। उन्होंने मोहम्मद रफी को अपना गुरु माना।


महेंद्र कपूर ने शास्त्रीय संगीत की एक मजबूत नींव रखी, जो आज के गायकों के लिए प्रेरणा का स्रोत है। पंडित हुस्नलाल, उस्ताद नियाज अहमद खान और उस्ताद अब्दुल रहमान खान से मिली शिक्षा ने उनकी आवाज को वह गहराई और गूंज दी, जो उनकी पहचान बनी।


जब वे उच्च स्वर में गाते थे, तो श्रोताओं को आश्चर्यचकित कर देते थे। फिल्म 'नवरंग' का 'आधा है चंद्रमा रात आधी' या 'गुमराह' का प्रसिद्ध गीत 'चलो एक बार फिर से अजनबी बन जाएं हम दोनों' में उनकी आवाज में विरह और मिलन के भाव एक साथ सुनाई देते थे।


1967 में आई फिल्म 'उपकार' में 'मेरे देश की धरती' गाने के बाद यह गाना केवल एक गीत नहीं, बल्कि देशभक्ति का प्रतीक बन गया।


महेंद्र कपूर का सबसे सफल सहयोग बीआर चोपड़ा और संगीतकार रवि के साथ रहा। जब रफी साहब और चोपड़ा साहब के बीच मतभेद हुए, तो महेंद्र कपूर को 'हमराज' और 'गुमराह' जैसी फिल्मों में अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर मिला। 'नीले गगन के तले' जैसे गानों ने उन्हें फिल्मफेयर पुरस्कार दिलाए।


1980 के दशक के अंत में, जब पूरा भारत रविवार की सुबह टेलीविजन के सामने बैठ जाता था, तब जो पहली आवाज सुनाई देती थी, वह थी, "अथ श्री महाभारत कथा..."। बीआर चोपड़ा की 'महाभारत' में महेंद्र कपूर के गाए दोहे और श्लोक आज भी लोगों के दिलों में बसे हुए हैं। 'यदा यदा ही धर्मस्य' को उन्होंने जिस गंभीरता और भक्ति के साथ गाया, उसने उन्हें हर घर में अमर बना दिया।


महेंद्र कपूर केवल हिंदी सिनेमा तक सीमित नहीं रहे। उन्होंने मराठी सिनेमा में भी अपनी आवाज का जादू बिखेरा। वे पहले भारतीय पार्श्व गायक थे जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर 'बोनी एम' के साथ 'एम-3' एल्बम के लिए पॉप गीत रिकॉर्ड किए। इसके अलावा, उन्होंने गुजराती फिल्मों के लिए लगातार छह वर्षों तक राज्य पुरस्कार जीते।


उन्होंने हमेशा मोहम्मद रफी को अपना गुरु माना। 27 सितंबर 2008 को उनकी हृदय गति रुकने से मृत्यु हो गई।


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