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भरत व्यास: वो गीतकार जिनके बोल आज भी दिलों को छूते हैं

भरत व्यास, एक ऐसा नाम जो बॉलीवुड के गीत लेखन में अमर है। उनके गाने न केवल मनोरंजन करते हैं, बल्कि दिलों को छूने वाली भावनाओं को भी व्यक्त करते हैं। जानें उनके जीवन, रचनाओं और उनके अद्वितीय योगदान के बारे में।
 
भरत व्यास: वो गीतकार जिनके बोल आज भी दिलों को छूते हैं

भरत व्यास का अद्वितीय योगदान


नई दिल्ली, 5 जनवरी। गाने केवल मनोरंजन का साधन नहीं होते, बल्कि कभी-कभी ये हमारे दिलों में इस कदर बस जाते हैं कि उन्हें भुला पाना मुश्किल हो जाता है। चाहे खुशी का कोई क्षण हो या किसी दुखद याद की कसक, कुछ गाने हर परिस्थिति में हमारे दिल के करीब होते हैं। बॉलीवुड में ऐसे कई लोग हैं, जो केवल गाने नहीं लिखते, बल्कि लोगों की भावनाओं को भी अपने गीतों में पिरोते हैं। ऐसे ही एक अद्भुत गीतकार थे भरत व्यास।


भरत व्यास, जो बॉलीवुड के प्रसिद्ध गीतकारों में से एक माने जाते हैं, केवल शब्दों के जादूगर नहीं थे, बल्कि वे लोगों के जज्बातों को छूने वाले कलाकार भी थे। उनके गीतों में प्यार और खुशी के साथ-साथ जीवन की छोटी-छोटी बातें, रिश्तों की नाजुकता और अधूरी ख्वाहिशें इतनी सरलता से व्यक्त की गई हैं कि सुनने वाला खुद को उनके बोलों में खो जाता है।


भरत व्यास का जन्म 6 जनवरी 1918 को राजस्थान के बीकानेर में हुआ। वे मूलतः चुरू जिले के निवासी थे। बचपन से ही उनमें कवि प्रतिभा झलकने लगी थी और 17-18 साल की उम्र में उन्होंने लिखना शुरू कर दिया था। चुरू से मैट्रिक करने के बाद वे कलकत्ता चले गए, जहां उन्होंने अपनी लेखनी को और निखारा। उनका पहला गीत था 'आओ वीरो हिलमिल गाए वंदे मातरम,' और इसके अलावा उन्होंने 'रामू चन्ना' नामक नाटक भी लिखा।


1942 के बाद उन्होंने मुंबई का रुख किया। शुरुआत में उन्होंने कुछ फिल्मों में अभिनय किया और गाने भी गाए, लेकिन असली पहचान उन्हें गीत लेखन से मिली। हिंदी सिनेमा में उनका पहला बड़ा ब्रेक 1943 में आई फिल्म 'दुहाई' से मिला। नूरजहां और शांता आप्टे जैसे कलाकारों ने उनके गीतों को आवाज दी। इसके बाद उनकी रचनाएं लगातार लोकप्रिय होती गईं।


भरत व्यास ने केवल फिल्मी गीत नहीं लिखे, बल्कि नाटकों और रिकॉर्डिंग के लिए भी राजस्थानी गीत रचे। उनके गाने सरल और दिल को छू लेने वाले होते थे। चाहे सारंगा, नवरंग, रानी रूपमती या गूंज उठी शहनाई जैसी फिल्में हों, उनके गीतों के बोल हर पीढ़ी के दिलों तक पहुंचे। 'आ लौट के आजा मीत', 'निर्बल से लडाई बलवान की', 'ऐ मालिक तेरे बंदे हम' जैसे गीत आज भी याद किए जाते हैं।


उनकी लेखनी में एक खास बात यह थी कि वे आम इंसान की भावनाओं को सहजता से प्रस्तुत करते थे। प्यार, दोस्ती, दर्द, उत्सव—हर भावना उनके गीतों में इतनी खूबसूरती से मिलती कि सुनने वाला खुद को उस कहानी का हिस्सा महसूस करता। यही कारण है कि उनके गीत समय की कसौटी पर खरे साबित हुए हैं और आज भी अमर हैं।


भरत व्यास का जीवन भी उनके गीतों की तरह प्रेरणादायक था। उन्होंने मुंबई में अपनी जड़ों से जुड़े रहकर काम किया और फिल्म इंडस्ट्री की चमक-दमक के बीच भी सादगी और सच्चाई को बनाए रखा। उनके छोटे भाई बृजमोहन व्यास भी अभिनेता थे, लेकिन भरत व्यास की पहचान हमेशा गीतों से जुड़ी रही।


4 जुलाई 1982 को उनका निधन हुआ, लेकिन उनके शब्द और गीत आज भी हमारे साथ हैं। उनके गाने न केवल मनोरंजन करते हैं, बल्कि सोचने, महसूस करने और यादों में खो जाने का माध्यम भी बनते हैं।


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