बेगम अख्तर: गज़लों की मल्लिका की अनकही कहानी
बेगम अख्तर की अद्भुत आवाज़
नई दिल्ली, 6 अक्टूबर। इस दुनिया में कई गायक हुए हैं, लेकिन कुछ आवाजें ऐसी होती हैं जो सीधे दिल में उतर जाती हैं। बेगम अख्तर की आवाज़ भी ऐसी ही थी। उनकी गज़लें सुनते समय ऐसा लगता था जैसे कोई आपके दिल के दर्द को बयां कर रहा हो। उनकी गायकी में प्रेम की मिठास और जुदाई का ग़म दोनों का समावेश था, यही कारण है कि उन्हें 'मल्लिका-ए-गज़ल' की उपाधि दी गई। जब वह गाती थीं, तो महफिल में उपस्थित लोग केवल सुनते नहीं थे, बल्कि उस अनुभव को जीते थे। उनकी प्रसिद्ध गज़ल 'ऐ मोहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया' आज भी संगीत प्रेमियों के दिलों में बसी हुई है।
जीवन यात्रा
बेगम अख्तर का जन्म 7 अक्टूबर 1914 को फैजाबाद में हुआ था। उनका असली नाम अख्तरी बाई फैजाबादी था। बचपन से ही उन्हें संगीत में गहरी रुचि थी। उन्होंने कम उम्र में ही संगीत की शिक्षा लेना शुरू कर दिया और जल्दी ही उनकी आवाज़ लोगों के बीच पहचान बनाने लगी। केवल 14 वर्ष की आयु में उन्होंने सार्वजनिक रूप से गायन की दुनिया में कदम रखा। आगे चलकर उनकी आवाज़ गज़ल, ठुमरी और दादरा की पहचान बन गई।
शायरी का गहरा अनुभव
बेगम अख्तर की विशेषता केवल उनकी आवाज़ नहीं थी। वह जिस शायरी को गाती थीं, उसे पहले गहराई से महसूस करती थीं। वह शब्दों का चयन सोच-समझकर करती थीं, क्योंकि उनका मानना था कि अगर शायरी गायक के दिल को नहीं छूती, तो वह श्रोताओं के दिलों तक भी नहीं पहुंच सकती।
व्यक्तिगत जीवन की चुनौतियाँ
उनकी जिंदगी में कई उतार-चढ़ाव आए। 1945 में उन्होंने बैरिस्टर इश्तियाक अहमद अब्बासी से विवाह किया। मां के निधन के बाद वह गहरे सदमे में चली गईं और कुछ समय के लिए गायकी से दूर हो गईं। लेकिन पति के प्रोत्साहन से उन्होंने फिर से संगीत की दुनिया में कदम रखा, और उनकी आवाज़ में और भी गहराई आ गई।
गज़ल की अनोखी कहानी
अब बात करते हैं उस गज़ल की जिसने बेगम अख्तर की पहचान को और मजबूत किया- 'ऐ मोहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया।' कहा जाता है कि जब बेगम अख्तर मुंबई से लखनऊ लौट रही थीं, तब रास्ते में एक शायर ने उनसे अपनी लिखी शायरी को गाने की गुजारिश की। उन्होंने उस कागज को संभालकर अपने पर्स में रख लिया। जब ट्रेन भोपाल के पास पहुंची, तो अचानक उन्हें उस शायरी का ख्याल आया। उन्होंने हारमोनियम निकाला और शायरी के लिए सुर तलाशने लगीं। धीरे-धीरे धुन तैयार हुई और वही रचना एक ऐसी गज़ल बन गई, जिसे सुनकर आज भी लोग भावुक हो जाते हैं।
बेगम अख्तर की विरासत
इस गज़ल के अंत में शायर का तखल्लुस 'शकील' आता है। इसके रचनाकार मशहूर शायर शकील बदायूंनी थे। बेगम अख्तर ने उनकी शायरी को जिस तरह अपनी आवाज़ दी, उसने शब्दों को एक नई जिंदगी दी। फिल्म स्टार नाना पाटेकर ने एक बार कहा था कि एक कार्यक्रम में जब बेगम अख्तर ने गज़ल खत्म की, तो दर्शकों की ओर से कोई ताली नहीं बजी। आमतौर पर उनकी प्रस्तुति के बाद जोरदार तालियां गूंजती थीं, लेकिन उस दिन पूरी महफिल में सन्नाटा था। जब किसी ने इसका कारण पूछा, तो बेगम अख्तर ने मुस्कुराते हुए कहा कि इसी सन्नाटे के लिए हम जीते हैं।
अंतिम विदाई
बेगम अख्तर 30 अक्टूबर 1974 को इस दुनिया से विदा हो गईं, लेकिन उनकी आवाज़ आज भी जीवित है। उनकी गज़लें आज भी महफिलों में गूंजती हैं, नए संगीत प्रेमी उन्हें सुनते हैं और पुराने चाहने वाले उनकी आवाज़ में अपना बीता हुआ समय तलाशते हैं।
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