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दुर्गा खोटे: भारतीय सिनेमा की पहली महिला सितारे की अनकही कहानी

दुर्गा खोटे, भारतीय सिनेमा की एक प्रतिष्ठित अभिनेत्री, ने अपने करियर में 200 से अधिक फिल्मों में काम किया। उनकी आत्मकथा में समाज की नाराजगी का सामना करने की कहानी है। जानें कैसे उन्होंने पारंपरिक सीमाओं को तोड़कर सिनेमा में अपनी पहचान बनाई और कई पुरस्कार जीते।
 

दुर्गा खोटे का अद्वितीय सफर

मुंबई, 21 सितंबर। दुर्गा खोटे का नाम भारतीय सिनेमा के उस युग से जुड़ा है, जब महिलाओं के लिए फिल्म उद्योग में कदम रखना एक चुनौतीपूर्ण कार्य था। उन्होंने न केवल इस क्षेत्र में कदम रखा, बल्कि अपने पांच दशकों के करियर में लगभग 200 फिल्मों में अभिनय किया और हिंदी-मराठी सिनेमा की एक प्रतिष्ठित अभिनेत्री बन गईं।


उनकी आत्मकथा 'मी दुर्गा खोटे' में एक दिलचस्प घटना का जिक्र है, जिसमें उन्हें एक फिल्म के रिलीज के बाद समाज की नाराजगी का सामना करना पड़ा।


दुर्गा खोटे का जन्म 14 जनवरी 1905 को मुंबई में हुआ, जहां उनका असली नाम वीटा लाड था। बचपन में, वह अपने पिता के साथ नाटक देखने जाती थीं, जिससे उनके मन में अभिनय और थिएटर के प्रति रुचि जागृत हुई। कम उम्र में, उन्होंने विश्वनाथ खोटे से विवाह किया और दो बेटों की मां बनीं, लेकिन 21 वर्ष की आयु में विधवा हो गईं। उस समय, उनके सामने अपने बच्चों की देखभाल की चुनौती थी और उन्हें आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होना था।


इसी कारण, उन्होंने फिल्म उद्योग में कदम रखने का निर्णय लिया, जो उस समय पारंपरिक परिवारों की महिलाओं के लिए एक बड़ा कदम था।


दुर्गा का फिल्मी करियर 1931 में 'फरेबी जाल' से शुरू हुआ, लेकिन यह फिल्म दर्शकों को प्रभावित नहीं कर पाई। फिल्म की नकारात्मक प्रतिक्रिया ने दुर्गा पर भी असर डाला।


उनकी आत्मकथा के अनुसार, लाड और खोटे परिवार समाज में प्रतिष्ठित माने जाते थे, और फिल्म में उनके काम को लेकर पहले से ही चर्चाएं चल रही थीं। फिल्म की असफलता के बाद, उन्हें महाराष्ट्रीयन समाज के एक हिस्से की नाराजगी का सामना करना पड़ा, जिससे उनके लिए घर से बाहर निकलना भी कठिन हो गया।


हालांकि, दुर्गा खोटे के करियर को असली पहचान 1932 में 'अयोध्येचा राजा' में तारामती के किरदार से मिली। यह फिल्म मराठी सिनेमा की महत्वपूर्ण कृतियों में से एक मानी जाती है। इसके बाद, उन्होंने 'माया मच्छिंद्र', 'अमर ज्योति', 'भारत मिलाप', 'सीता' और 'पृथ्वी वल्लभ' जैसी कई सफल फिल्मों में काम किया।


'मुगल-ए-आजम' में जोधाबाई, 'भरत मिलाप' में कैकेयी, 'बिदाई', 'बावर्ची', 'बॉबी', 'अभिमान' और 'करज' जैसी फिल्मों में उनके निभाए गए किरदार आज भी दर्शकों के दिलों में बसे हुए हैं। 'बिदाई' के लिए उन्हें फिल्मफेयर बेस्ट सपोर्टिंग एक्ट्रेस अवॉर्ड से नवाजा गया। इसके अलावा, 1968 में उन्हें पद्मश्री और 1983 में दादा साहेब फाल्के अवॉर्ड से सम्मानित किया गया।


दुर्गा खोटे ने केवल अभिनय तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि 1937 में 'साथी' फिल्म का निर्माण और निर्देशन भी किया। इसके बाद के वर्षों में, उन्होंने विज्ञापनों, डॉक्यूमेंट्री और टीवी प्रोजेक्ट्स पर भी काम किया। उनकी अंतिम फिल्म 'दौलत के दुश्मन' 1983 में रिलीज हुई। 22 सितंबर 1991 को, 86 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया।


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