जावेद अख्तर: 80 साल की उम्र में भी क्यों हैं हिंदी सिनेमा के सबसे बड़े संवाद लेखक?
जावेद अख्तर का सिनेमा में योगदान
मुंबई, 17 जनवरी। 70 के दशक में, जब हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में मुख्य हीरो के पोस्टर ही प्रमुखता से दिखाई देते थे, तब जावेद अख्तर ने अपने करियर की एक नई कहानी लिखी। अपने करीबी दोस्त सलीम खान के साथ मिलकर उन्होंने इस क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण स्थान बनाया।
आज, 17 जनवरी को, जावेद अख्तर अपना 80वां जन्मदिन मना रहे हैं। उस समय जब अभिनेत्रियों को कम ही स्थान मिलता था, जावेद और सलीम की लेखनी ने दर्शकों के दिलों में एक खास जगह बनाई। उनके संवादों ने कई प्रमुख अभिनेताओं को पहचान दिलाई, चाहे वह अमिताभ बच्चन हों या गब्बर।
जावेद अख्तर ने सिनेमा में अपने संघर्ष के दिनों को भी याद किया। जब वह मुंबई आए, तो उनके पास न तो रहने की जगह थी और न ही खाने का कोई इंतजाम। लेकिन उन्होंने अपनी मेहनत और प्रतिभा से 1971 में 'अंदाज़' से लेकर 'जंजीर', 'दीवार', और 1975 में आई 'शोले' जैसी फिल्मों में सफलता हासिल की।
जावेद का मानना है कि कहानी, कलाकार, और संवाद एक साथ मिलकर काम करते हैं। अगर इनमें से किसी एक में कमी आ जाए, तो किरदार का अस्तित्व खत्म हो जाता है। उन्होंने 'जंजीर', 'दीवार', 'त्रिशूल', और 'डॉन' जैसी फिल्मों में संवाद लिखे। फिल्म 'जंजीर' का संवाद "जब तक बैठने को ना कहा जाए शराफत से खड़े रहो। ये पुलिस स्टेशन है, तुम्हारे बाप का घर नहीं," और 'डॉन' में "डॉन को पकड़ना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन है," जैसे संवाद आज भी लोगों की जुबान पर हैं।
फिल्म 'शोले' के गब्बर के संवाद भी सलीम-जावेद की जोड़ी की देन हैं। उन्होंने "कितने आदमी थे?" और "जो डर गया, समझो मर गया" जैसे संवाद लिखे। इसके अलावा, अमरीश पुरी का 'मोगैंबो' बनाना भी जावेद की कलम का कमाल है।
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