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क्या छत्तीसगढ़ की प्रेम कहानी 'सहिया' को सेंसर बोर्ड से मिलेगी मंजूरी? जानें संजय शर्मा का पक्ष

फिल्म 'सहिया' के निर्माता संजय शर्मा ने सेंसर बोर्ड पर नक्सलवाद के आरोपों को गलत ठहराया है। उन्होंने कहा कि यह फिल्म एक प्रेम कहानी है जो हिंसा के खिलाफ है। संजय ने बताया कि फिल्म की शूटिंग छत्तीसगढ़ के वास्तविक स्थानों पर की गई है, जिससे इसे विवादों का सामना करना पड़ा। यदि रिव्यू कमेटी फिल्म को मंजूरी नहीं देती है, तो वह कानूनी कार्रवाई करने के लिए तैयार हैं। जानें इस मामले में और क्या कहा संजय शर्मा ने।
 

संजय शर्मा की फिल्म 'सहिया' को सेंसर सर्टिफिकेट की चुनौती

मुंबई, 31 अगस्त। फिल्म 'सहिया' के निर्माता संजय शर्मा इन दिनों अपनी फिल्म को सेंसर सर्टिफिकेट दिलाने में कठिनाइयों का सामना कर रहे हैं। यह फिल्म छत्तीसगढ़ के जंगलों और आदिवासी समुदाय के बीच एक प्रेम कहानी को दर्शाती है, लेकिन संजय शर्मा का कहना है कि सीबीएफसी ने इसे नक्सलवाद से जोड़कर पास करने में रुकावट डाली है।


उन्होंने अपनी नाराजगी व्यक्त करते हुए कहा कि फिल्म में नक्सलवाद का कोई समर्थन नहीं किया गया है, बल्कि यह पूरी तरह से हिंसा के खिलाफ है। यदि रिव्यू कमेटी फिल्म को मंजूरी नहीं देती है, तो वह कानूनी कार्रवाई करने का मन बना चुके हैं और उन्हें विश्वास है कि अदालत फिल्म को देखेगी और इसे पास करेगी।


संजय शर्मा ने कहा, 'सहिया' वास्तव में एक सुंदर प्रेम कहानी है, जो नक्सलवाद और पुलिस के बीच संघर्ष में फंसे एक आदिवासी की प्रेम कहानी को दर्शाती है। फिल्म का उद्देश्य नक्सलवाद को दिखाना नहीं है, बल्कि यह बताना है कि हिंसा किसी समस्या का समाधान नहीं है।


उन्होंने बताया कि फिल्म की शूटिंग छत्तीसगढ़ के वास्तविक स्थानों पर की गई है ताकि कहानी वास्तविक लगे। उनका मानना है कि यही लोकेशन फिल्म के लिए समस्या बन गई है। अगर कोई फिल्म निर्माता आदिवासी क्षेत्रों में जाकर वहां की संस्कृति को समझते हुए फिल्म बनाता है, तो उसे प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।


संजय शर्मा ने सेंसर बोर्ड के एक वरिष्ठ अधिकारी के साथ हुई बातचीत का जिक्र करते हुए कहा कि अधिकारी ने कहा कि यदि फिल्म की शूटिंग उत्तर प्रदेश में होती, तो वह इसे तुरंत सर्टिफिकेट दे देते। यह सुनकर वह हैरान रह गए।


उन्होंने रिव्यू कमेटी की प्रक्रिया में हुई देरी पर भी सवाल उठाए। उनका कहना है कि उनकी फिल्म को रिव्यू कमेटी के सामने पांच दिनों के भीतर दिखाया जाना था, लेकिन यह लगभग 21 दिनों बाद देखी गई।


संजय शर्मा ने कहा कि रिव्यू कमेटी ने स्पष्ट रूप से नहीं बताया कि फिल्म का कौन सा सीन नक्सलवाद से प्रेरित है। जब बोर्ड किसी विशेष सीन की पहचान नहीं कर पा रहा, तो पूरी फिल्म को रोकना कैसे उचित हो सकता है? उन्हें लगता है कि बोर्ड ने पहले से ही तय कर लिया था कि फिल्म को अनुमति नहीं दी जानी है।


फिल्म के कंटेंट के बारे में उन्होंने कहा कि उन्होंने जानबूझकर गरीब और आम आदमी के दृष्टिकोण को कहानी में शामिल किया है। फिल्म यह दिखाने का प्रयास करती है कि एक गरीब व्यक्ति किस तरह सिस्टम के बीच फंसता है।


उन्होंने बताया कि फिल्म के संगीत को भी इसी सोच के तहत तैयार किया गया है। फिल्म का संदेश हिंसा से दूर रहने और प्यार को चुनने का है।


अब संजय शर्मा रिव्यू कमेटी के निर्णय का इंतजार कर रहे हैं। यदि कमेटी फिल्म को सर्टिफिकेट देती है, तो मामला वहीं समाप्त हो जाएगा, लेकिन यदि फिर से रोक दिया जाता है, तो वह कोर्ट जाने के लिए तैयार हैं।


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