कौन हैं मंगलेश डबराल? जानें हिंदी कविता के इस दिग्गज की अनकही बातें
मंगलेश डबराल: हिंदी कविता के अनमोल रत्न
नई दिल्ली, 15 मई। हिंदी साहित्य के क्षेत्र में मंगलेश डबराल एक महत्वपूर्ण नाम हैं, जिनकी कविताएं पाठकों को एक नई दुनिया में ले जाती हैं। उनकी सरलता और विनम्रता के साथ, उन्होंने अपनी रचनाओं में मानवीय भावनाओं को गहराई से व्यक्त किया है।
मंगलेश डबराल का जन्म 16 मई 1948 को उत्तराखंड के टिहरी गढ़वाल जिले के काफलपानी गांव में हुआ। बाद में, वे दिल्ली आए और प्रतिपक्ष जैसे पत्रिकाओं में कार्य किया।
वे आधुनिक हिंदी कविता के उन प्रमुख कवियों में से एक हैं, जिन्होंने कविता में नए अनुभव और संवेदनाओं का समावेश किया। उनकी रचनाओं में देशज महक के साथ मानवता के भावनात्मक पहलुओं को खूबसूरती से चित्रित किया गया है। उनके कविता संग्रहों में 'पहाड़ पर लालटेन', 'घर का रास्ता', 'हम जो देखते हैं' और 'आवाज भी एक जगह है' शामिल हैं। इसके अतिरिक्त, उन्होंने राजस्थान के शिक्षक कवियों की कविताओं का संकलन 'रेत घड़ी' का संपादन भी किया।
मंगलेश डबराल विश्व साहित्य के महान कवियों जैसे पाब्लो नेरुदा और एर्नेस्टो कार्डिनल के अनुवादक भी रहे हैं। इसके अलावा, उन्होंने हरमन हेस के उपन्यास 'सिद्धार्थ' और बांग्ला लेखक नवारो भट्टाचार्य के संग्रह का सह-अनुवाद भी किया।
एक साक्षात्कार में, डबराल ने कहा था कि कविता लिखने के बाद रचनाकार का अनुभव समाप्त हो जाता है और रचना का जीवन आरंभ होता है। उन्होंने रघुवीर सहाय के कथन को सही ठहराया कि 'कविता हुई नहीं कि मरी'। पत्रकारिता और कविता के बीच के संबंध पर उन्होंने कहा कि पत्रकारिता उन्हें शोर देती है, जबकि कविता उस शोर को संगीत में बदलने का प्रयास करती है।
मंगलेश डबराल नागार्जुन को अपना आदर्श मानते थे और उन संघर्षरत लोगों को श्रद्धांजलि देते रहे हैं जो अपने रास्ते में गिर पड़े लेकिन प्रयास करते रहे। उनकी कविताएं पाखंड, धूर्तता और सामाजिक अन्याय के खिलाफ भी आवाज उठाती हैं। मितभाषी और अपने सिद्धांतों में दृढ़, मंगलेश डबराल हिंदी साहित्य की उस परंपरा को आगे बढ़ाते हैं, जिसमें कविता समाज और मानवता की सच्चाई को बिना शोर के व्यक्त करती है।
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