भारतीय शास्त्रीय नृत्य की रानी: मृणालिनी साराभाई की अनकही कहानी
भारतीय नृत्य की महान हस्ती
मुंबई, 10 मई। भारतीय शास्त्रीय नृत्य की दुनिया में मृणालिनी साराभाई का नाम एक विशेष स्थान रखता है। उन्होंने भरतनाट्यम और कथकली जैसी नृत्य शैलियों को एक नई पहचान दी और भारतीय संस्कृति को वैश्विक मंचों पर प्रस्तुत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
मृणालिनी ने अपने बचपन में ही विभिन्न नृत्य शैलियों का अध्ययन करना शुरू कर दिया था। यह जानकर हैरानी होती है कि उन्होंने छोटी उम्र में पश्चिमी नृत्य की 'डालक्रोज' तकनीक भी सीखी, जो उस समय भारतीय कलाकारों के लिए एक दुर्लभ अवसर था।
उनका जन्म 11 मई 1918 को केरल में हुआ। उनके पिता, एस. स्वामीनाथन, मद्रास हाईकोर्ट के एक प्रसिद्ध वकील थे, जबकि उनकी मां, अम्मू स्वामीनाथन, एक प्रमुख समाजसेवी और स्वतंत्रता सेनानी थीं। मृणालिनी ने एक ऐसे परिवार में परवरिश पाई, जहां शिक्षा, कला और देश सेवा को अत्यधिक महत्व दिया जाता था। उनकी बड़ी बहन लक्ष्मी सहगल भी आजाद हिंद फौज की एक प्रमुख सदस्य थीं।
मृणालिनी का बचपन स्विट्जरलैंड में बीता, जहां उन्होंने पहली बार नृत्य की गहराइयों को समझा। वहां उन्होंने 'डालक्रोज' तकनीक सीखी, जो पश्चिमी नृत्य और शरीर की लय को समझने का एक अनूठा तरीका है। उस समय भारत के बहुत कम कलाकारों को इस तरह की विदेशी कला सीखने का अवसर मिला। इस तकनीक ने उनके नृत्य में एक नई ऊर्जा और अभिव्यक्ति को जन्म दिया।
इसके बाद, मृणालिनी ने गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर के शांतिनिकेतन में अध्ययन किया, जहां उनके भारतीय शास्त्रीय नृत्य के प्रति रुचि और बढ़ी। बाद में, उन्होंने अमेरिका में अमेरिकन एकेडमी ऑफ ड्रामेटिक आर्ट्स से प्रशिक्षण लिया। हालांकि, उनका दिल हमेशा भारतीय संस्कृति और शास्त्रीय नृत्य में ही बसा रहा।
भारत लौटने के बाद, उन्होंने भरतनाट्यम की शिक्षा गुरु मीनाक्षी सुंदरम पिल्लई से ली और कथकली का प्रशिक्षण गुरु कुंचू कुरुप से प्राप्त किया। धीरे-धीरे, वह देश की प्रमुख शास्त्रीय नृत्यांगनाओं में से एक बन गईं।
साल 1942 में, मृणालिनी ने प्रसिद्ध वैज्ञानिक विक्रम साराभाई से विवाह किया। उनकी बेटी मल्लिका साराभाई ने भी नृत्य और थिएटर में अपनी पहचान बनाई।
मृणालिनी साराभाई ने 1948 में अहमदाबाद में 'दर्पण एकेडमी ऑफ परफॉर्मिंग आर्ट्स' की स्थापना की, जिसके माध्यम से उन्होंने हजारों छात्रों को भरतनाट्यम, कथकली, संगीत, नाटक और कठपुतली कला की शिक्षा दी। कहा जाता है कि उन्होंने अपने जीवन में 18,000 से अधिक छात्रों को प्रशिक्षित किया और 300 से अधिक डांस ड्रामा प्रस्तुत किए।
वह केवल एक नृत्यांगना नहीं थीं, बल्कि एक लेखिका और समाजसेवी भी थीं। उन्होंने कई किताबें, कविताएं और बच्चों की कहानियां लिखीं। उन्हें 1965 में पद्मश्री और 1992 में पद्मभूषण जैसे पुरस्कार मिले। इसके अलावा, उन्हें संगीत नाटक अकादमी फैलोशिप सहित कई अन्य पुरस्कार भी प्राप्त हुए।
21 जनवरी 2016 को मृणालिनी साराभाई ने इस दुनिया को अलविदा कहा।
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