बीआर चोपड़ा की 'साधना': जब फिल्म इंडस्ट्री ने कहा था ये फिल्म नहीं चलेगी!
बीआर चोपड़ा का योगदान
मुंबई, 22 अप्रैल। बलदेव राज चोपड़ा, जिन्हें बीआर चोपड़ा के नाम से जाना जाता है, भारतीय सिनेमा के उन महान फिल्म निर्माताओं में से एक हैं, जिन्होंने मनोरंजन के साथ-साथ गंभीर सामाजिक मुद्दों को भी उठाया। उनका पूरा करियर सामाजिक मुद्दों, सार्थक कहानियों और साहसिक विषयों से भरा रहा। भले ही वे अब हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी फिल्में और टीवी सीरियल 'महाभारत' आज भी दर्शकों के दिलों में जीवित हैं।
बीआर चोपड़ा का जन्म 22 अप्रैल 1914 को लाहौर (अविभाजित भारत) में हुआ। उन्होंने लाहौर विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में एमए किया और फिल्म समीक्षाएं लिखने के साथ-साथ कहानियां भी लिखी।
1955 में, उन्होंने अपना प्रोडक्शन हाउस 'बीआर फिल्म्स' की स्थापना की। उनकी फिल्मों में हमेशा सामाजिक संदेश होते थे। 'नया दौर' (1957) में दिलीप कुमार और वैजयंतीमाला के साथ उन्होंने मजदूर-पूंजीपति संघर्ष को दर्शाया। 'गुमराह', 'कानून', 'हमराज', 'निकाह', और 'कर्म' जैसी फिल्मों ने दर्शकों को सोचने पर मजबूर किया। उनकी अंतिम फिल्म 'भूतनाथ' थी। 1998 में, उन्हें भारतीय सिनेमा का सर्वोच्च सम्मान दादासाहेब फाल्के अवार्ड प्राप्त हुआ।
1958 में रिलीज हुई बीआर चोपड़ा की फिल्म 'साधना' उनके साहस और साधना का प्रतीक है। यह फिल्म एक वेश्या की जिंदगी और उसके पुनर्वास पर आधारित थी। मुख्य किरदार चंपा (वैजयंतीमाला) एक वेश्या है, जो कॉलेज के लेक्चरर मोहन (सुनील दत्त) से प्यार करती है। फिल्म ने समाज में वेश्याओं के प्रति सोच और उन्हें मुख्यधारा में लाने का मुद्दा उठाया। फिल्म की घोषणा होते ही इंडस्ट्री में हड़कंप मच गया। डिस्ट्रीब्यूटर्स ने चोपड़ा को पत्र लिखकर कहा, “आप क्या कर रहे हैं? हम सब मर जाएंगे।”
चोपड़ा ने एक इंटरव्यू में बताया कि कई लोगों ने उन्हें समझाया कि वेश्या की कहानी पर पहले भी फिल्में बनी हैं और वे सभी असफल रही हैं। एक डिस्ट्रीब्यूटर ने सीधा सवाल किया, “चार फिल्में फ्लॉप हो चुकी हैं, आपको क्या लगता है ये चलेगी?” चोपड़ा ने शांतिपूर्वक उत्तर दिया, “जब मैंने अपनी पहली फिल्म बनाई थी, तब भी मुझे नहीं पता था कि वो चलेगी या नहीं। मुझे कहानी पसंद आई, इसलिए बनाई। यह भी अच्छी लगी, इसलिए बना रहा हूं।”
मूल कहानी में अंत अलग था, जिसमें वेश्या मंदिर में उपदेश सुनकर बदल जाती थी, लेकिन चोपड़ा ने इसे सामाजिक दृष्टिकोण से खत्म करने वाला माना। उन्होंने लेखक पंडित मुखराम शर्मा से कहा कि अंत ऐसा होना चाहिए जिसमें मां अपनी बेटी का हाथ पकड़कर कहे, “तुम इस घर में बहू बनकर आई थी, वेश्या बनकर बाहर नहीं जा सकती।” यही अंत रखा गया।
फिल्म के रिलीज होने पर मराठा मंदिर में महिलाओं की भीड़ लग जाती थी। इंटरवल के दौरान जब चोपड़ा ऊपर जाते, तो वे आंसू नहीं रोक पाते। फिल्म ने वेश्या की कहानी को न केवल दिखाया बल्कि उसे सम्मान और पुनर्वास का संदेश भी दिया। 'औरत ने जनम दिया मर्दों को' गीत आज भी प्रासंगिक है।
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