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फिल्म 'एक दिन': एक खूबसूरत यात्रा लेकिन भावनाओं में कमी

फिल्म 'एक दिन' एक खूबसूरत यात्रा है जो जापान के बर्फीले नज़ारों को दर्शाती है, लेकिन जज़्बातों की कमी के कारण यह दर्शकों को प्रभावित नहीं कर पाती। कहानी में दिनेश और मीरा के बीच एकतरफा प्यार और याददाश्त की बीमारी का जटिल ताना-बाना है। साई पल्लवी और जुनैद खान की परफॉर्मेंस में ईमानदारी है, लेकिन उनके बीच की केमिस्ट्री कमजोर है। तकनीकी दृष्टि से फिल्म अच्छी है, लेकिन भावनात्मक गहराई की कमी इसे एक साधारण ट्रैवल ब्रोशर में बदल देती है।
 
फिल्म 'एक दिन': एक खूबसूरत यात्रा लेकिन भावनाओं में कमी

कहानी की पृष्ठभूमि

किसी भी प्रेम कहानी की सफलता उसके पात्रों के बीच की 'स्पार्क' और केमिस्ट्री पर निर्भर करती है। निर्देशक सुनील पांडे की फिल्म 'एक दिन' जापान की सुंदरता और बर्फीले दृश्यों को शानदार तरीके से प्रस्तुत करती है, लेकिन जज़्बातों के मामले में यह दर्शकों के दिलों तक पहुँचने में असफल रहती है। जुनैद खान और साई पल्लवी जैसे प्रतिभाशाली कलाकारों के बावजूद, यह फिल्म एक खूबसूरत लेकिन बेजान 'ट्रैवल ब्रोशर' बनकर रह जाती है।


कहानी: याददाश्त की बीमारी और एकतरफा प्यार

फिल्म की कहानी दिनेश (जुनैद खान) के इर्द-गिर्द घूमती है, जो नोएडा की एक आईटी कंपनी में काम करने वाला अंतर्मुखी युवक है। वह अपनी सहकर्मी मीरा (साई पल्लवी) से चुपचाप प्यार करता है। कहानी में मोड़ तब आता है जब ऑफिस ट्रिप के दौरान मीरा को TGA (Transient Global Amnesia) नामक बीमारी का पता चलता है।


इस स्थिति में मीरा की याददाश्त एक दिन के बाद मिट जाती है। दिनेश जापानी देवताओं से प्रार्थना करता है कि मीरा उसे प्यार करे—भले ही केवल एक दिन के लिए। उसकी मुराद पूरी होती है, लेकिन एक दर्दनाक शर्त के साथ कि अगली सुबह मीरा को कुछ भी याद नहीं रहेगा।


एक दिन: परफॉर्मेंस

परफॉर्मेंस के मामले में, साई पल्लवी अपने हिंदी डेब्यू में पूरी ईमानदारी से काम करती हैं। शांत क्षणों में उनकी मासूमियत और भावनात्मक गहराई फिल्म के सबसे मजबूत पहलुओं में से एक बनकर उभरती है। वह मीरा के किरदार में जान डालने की कोशिश करती हैं, लेकिन स्क्रिप्ट उन्हें एक आज़ाद महिला के बजाय एक बेबस किरदार के रूप में अधिक दिखाती है।


जुनैद खान अपनी पिछली परफॉर्मेंस की तुलना में अधिक संयमित नजर आते हैं। दिनेश के रूप में उनकी सादगी स्पष्ट है, लेकिन एक अभिनेता के रूप में, उनमें वह स्क्रीन प्रेज़ेंस की कमी है जो दर्शकों को पूरी तरह से बांध सके। संयम प्रभावी हो सकता है, लेकिन यहाँ यह फिल्म की गति को धीमा कर देता है। कुणाल कपूर एक छोटे लेकिन प्रभावशाली कैमियो में नजर आते हैं, हालाँकि उनके पास करने के लिए ज्यादा कुछ नहीं है।


फिल्म की सबसे बड़ी कमी जुनेद और साई पल्लवी के बीच की केमिस्ट्री की कमी है। किसी भी मोड़ पर दर्शकों को यह महसूस नहीं होता कि वे एक-दूसरे से प्यार करते हैं। उनका संबंध इतना फीका लगता है कि कभी-कभी वे रोमांटिक पार्टनर के बजाय दूर के जान-पहचान वाले लगते हैं। उस चिंगारी के बिना, दर्शकों के लिए कहानी से जुड़ना मुश्किल हो जाता है।


एक दिन: डायरेक्शन और तकनीकी पहलू

सुनील पांडे का निर्देशन तकनीकी रूप से तो ठीक है, लेकिन भावनात्मक रूप से कमजोर है। वह जापान की सुंदरता को स्क्रीन पर दिखाने में सफल रहते हैं। सिनेमैटोग्राफी फिल्म की सबसे बड़ी ताकत है। होक्काइडो की बर्फ़ से ढकी सड़कें, सर्दियों की हल्की रोशनी और पोस्टकार्ड जैसे फ्रेम फिल्म को एक ट्रैवल ब्रोशर जैसा बनाते हैं।


संगीत की बात करें तो, अरिजीत सिंह का एक गाना सुनने में अच्छा लगता है, लेकिन फिल्म खत्म होते ही आसानी से भुला दिया जाता है। एडिटिंग भी खास प्रभावी नहीं है, और फिल्म की गति कभी-कभी इतनी धीमी हो जाती है कि यह दर्शकों के धैर्य की परीक्षा लेती है। फिल्म की रिलीज़ का समय भी इसके खिलाफ जाता है; अप्रैल की गर्मी के बजाय यह सर्दियों या वैलेंटाइन डे के आस-पास रिलीज़ होती तो ज्यादा सही रहता।


एक दिन: डायरेक्शन का नज़रिया

यह फिल्म थाई फिल्म 'वन डे' का आधिकारिक रीमेक है, लेकिन यह कहानी को भारतीय संवेदनाओं के अनुसार पूरी तरह से ढाल नहीं पाती, जिससे यह ओरिजिनल नहीं लगती। डायरेक्टर दिनेश को एक 'प्यारा nerd' बनाने की कोशिश करते हैं, लेकिन वह अंततः अपनी ही दुनिया में खोया हुआ एक किरदार बनकर रह जाता है। फिल्म निस्वार्थ प्रेम का विचार पेश करने की कोशिश करती है, लेकिन उस संदेश को मज़बूती देने के लिए आवश्यक गहराई इसमें नहीं है।


एक दिन: फैसला

'एक दिन' एक ऐसी फिल्म है जिसके इरादे तो अच्छे हैं, लेकिन परिणाम उम्मीद से कमजोर हैं। यह बॉलीवुड के पुराने 'साफ़-सुथरे रोमांस' वाले अंदाज़ को वापस लाने की कोशिश करती है, जो आज के गंभीर कंटेंट के बीच ताज़गी भरा हो सकता था, लेकिन इसमें जान की कमी है। जापान के खूबसूरत दृश्यों, साई पल्लवी के आकर्षण और शानदार सिनेमैटोग्राफी के बावजूद, यह फिल्म अपनी धीमी गति और मुख्य किरदारों के बीच केमिस्ट्री की कमी के कारण कमजोर पड़ जाती है। यह एक ऐसी कहानी है जो बिना कोई गहरी छाप छोड़े आती है और चली जाती है—ठीक वैसे ही, जैसे फिल्म की हीरोइन, जो अगले ही दिन सब कुछ भूल जाती है।


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