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फिल्म 'एक्यूज्ड': यौन उत्पीड़न पर एक हल्की लेकिन गंभीर दृष्टि

फिल्म 'एक्यूज्ड' यौन उत्पीड़न के गंभीर मुद्दे को उठाती है, लेकिन इसके ट्रीटमेंट में कमी है। कोंकणा सेन शर्मा और प्रतिभा रांटा की बेहतरीन परफॉर्मेंस के बावजूद, फिल्म अपनी पूरी क्षमता को नहीं दिखा पाती। जानें इस फिल्म की कहानी, परफॉर्मेंस और तकनीकी कमियों के बारे में।
 
फिल्म 'एक्यूज्ड': यौन उत्पीड़न पर एक हल्की लेकिन गंभीर दृष्टि

यौन उत्पीड़न का गंभीर मुद्दा

कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न एक ऐसा विषय है जिसे समाज अक्सर बंद कमरों की चर्चा तक सीमित रखना चाहता है। अपनी पहली फिल्म 'डॉक्टर जी' में मेडिकल जगत की विसंगतियों को हल्के-फुल्के अंदाज में पेश करने वाली निर्देशक अनुभूति कश्यप इस बार 'एक्यूज्ड' के जरिए एक बेहद गंभीर और कड़वा सच लेकर आई हैं। 27 फरवरी को नेटफ्लिक्स पर प्रीमियर हुई यह फिल्म समाज के दोहरे मापदंडों को उजागर करने का दावा तो करती है, लेकिन क्या इसकी कहानी में वह धार है जो दर्शक के जहन को झकझोर सके?


फिल्म का परिचय

अनुभूति कश्यप के डायरेक्शन में बनी फिल्म 'एक्यूज्ड', 27 फरवरी को नेटफ्लिक्स पर रिलीज़ हुई। जब भी पर्दे पर कोंकणा सेनशर्मा जैसी दिग्गज अदाकारा और प्रतिभा रांटा जैसी उभरती हुई प्रतिभा एक साथ आती हैं, तो उम्मीदें आसमान पर होती हैं। यह फिल्म यौन उत्पीड़न जैसे संवेदनशील मुद्दे की जटिल परतों को खोलने की कोशिश करती है।


कहानी का बैकग्राउंड

कहानी डॉ. गीतिका सेन (कोंकणा सेनशर्मा) के इर्द-गिर्द घूमती है, जो लंदन के एक प्रमुख हॉस्पिटल में कार्यरत हैं। गीतिका एक प्रसिद्ध गायनेकोलॉजिस्ट हैं, और उनकी शादी डॉ. मीरा (प्रतिभा रांटा) से हुई है, जो एक पीडियाट्रिशियन हैं। यह जोड़ा एक आदर्श और खुशहाल जीवन जी रहा है और जल्द ही एक बच्चा गोद लेने की योजना बना रहा है। लेकिन एक सुबह, हॉस्पिटल के HR डिपार्टमेंट को मिला एक गुमनाम ईमेल उनकी जिंदगी को बदल देता है।


कहानी में मोड़

ईमेल में डॉ. गीतिका पर यौन उत्पीड़न का आरोप लगाया गया है। इसमें कहा गया है कि भेजने वाला उनके कार्यों का शिकार हुआ है। रातों-रात, गीतिका, जो जानें बचाने और इज़्ज़त कमाने के लिए जानी जाती थी, उसे एक अपराधी के रूप में देखा जाने लगता है। जैसे-जैसे जांच शुरू होती है, शिकायतें सामने आने लगती हैं और मामला व्यक्तिगत रिश्तों तक पहुँच जाता है।


फिल्म का ट्रीटमेंट

फिल्म 'एक्यूज्ड' के साथ सबसे बड़ी समस्या इसका ट्रीटमेंट है। यह एक ऐसे विषय को उठाती है जिसमें गहराई की बहुत गुंजाइश थी, लेकिन आगे बढ़ने के बजाय, ऐसा लगता है कि यह पीछे हट रही है। जब आप यौन उत्पीड़न जैसे गंभीर मुद्दे पर फिल्म बनाते हैं, तो दर्शक गहरे मनोवैज्ञानिक दबाव और सामाजिक कलंक की खोज की उम्मीद करते हैं। हालाँकि, यहाँ कहानी ऊपरी स्तर पर ही रहती है।


कहानी की गति

लंदन की सेटिंग और एक हाई-प्रोफाइल हॉस्पिटल बैकग्राउंड के बावजूद, कहानी एक थ्रिलर ड्रामा में आवश्यक तात्कालिकता या तनाव पैदा करने में असफल रहती है। फिल्म में कई ऐसे क्षण हैं जो बहुत प्रभावशाली हो सकते थे, लेकिन उन्हें पूरी तरह से विकसित नहीं किया गया है। ऐसा लगता है जैसे निर्देशक ने जटिल मानव व्यवहार को दिखाने के बजाय एक सुरक्षित रास्ता चुना है।


कहानी का रहस्य

दूसरे भाग में, जब पूर्व पत्रकार जयदीप भार्गव (मशहूर अमरोही) जांच की जिम्मेदारी लेते हैं, तो फिल्म एक रहस्य की ओर मुड़ जाती है। यहां से, टोन लड़खड़ाने लगता है। जब मीरा अपनी पत्नी का सच जानने के लिए एक प्राइवेट इन्वेस्टिगेटर को हायर करती हैं, तो स्क्रीनप्ले सस्पेंस के बजाय बिखरा हुआ लगने लगता है।


परफॉर्मेंस

अगर 'एक्यूज्ड' देखने लायक है, तो इसका बड़ा कारण इसके लीड एक्टर्स की परफॉर्मेंस है। कोंकणा सेन शर्मा ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि उन्हें सबसे अच्छी एक्ट्रेस में से एक क्यों माना जाता है। डॉ. गीतिका सेन के रूप में, उन्होंने एक ऐसी महिला का रोल किया है जो अंदर से टूट रही है, जबकि बाहर से शांत रहने की कोशिश कर रही है। उनके एक्सप्रेशन और चुप्पी अक्सर शब्दों से ज़्यादा असरदार होती है।


डायरेक्शन और तकनीकी कमियां

अनुभूति कश्यप का विज़न स्पष्ट है, लेकिन स्क्रीनप्ले में तालमेल की कमी फिल्म को कमजोर करती है। टोन बहुत ज़्यादा दबा हुआ है, जो दर्शकों को कैरेक्टर्स के साथ इमोशनल कनेक्शन बनाने से रोकता है। क्लाइमेक्स और असली गुनहगार का खुलासा भी एवरेज लगता है।


अंतिम निष्कर्ष

'एक्यूज्ड' में पोटेंशियल की कोई कमी नहीं थी। मज़बूत कास्ट, एक गंभीर विषय और नेटफ्लिक्स जैसे प्लेटफॉर्म के साथ, यह फिर भी अपनी पूरी क्षमता दिखाने में असफल रहती है। फिल्म न तो एक दिलचस्प सामाजिक ड्रामा बनती है और न ही एक दिलचस्प रहस्य।


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