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क्यों 31 जुलाई को हमेशा के लिए खामोश हो गईं मोहम्मद रफी की सुरों की दुनिया?

31 जुलाई का दिन भारतीय संगीत के महान गायक मोहम्मद रफी के निधन का दिन है। जानें उनके जीवन की अनकही कहानियाँ, उनके संगीत में योगदान और कैसे उन्होंने भारतीय सिनेमा में अपनी अमिट छाप छोड़ी। रफी की आवाज आज भी लोगों के दिलों में बसी हुई है।
 

मोहम्मद रफी: एक अमर संगीतकार की कहानी


नई दिल्ली, 30 जुलाई। 31 जुलाई का दिन केवल एक तारीख नहीं है, बल्कि यह वह दिन है जब भारतीय संगीत की एक महान आवाज हमेशा के लिए खामोश हो गई। मोहम्मद रफी जैसे कलाकार कभी नहीं जाते; वे अपने गानों के माध्यम से हमेशा जीवित रहते हैं। आज भी जब 'चौदहवीं का चांद हो', 'बहारों फूल बरसाओ' या 'क्या हुआ तेरा वादा' जैसे गाने सुनाई देते हैं, तो ऐसा लगता है जैसे वह हमारे बीच हैं।


मोहम्मद रफी का जन्म 24 दिसंबर 1924 को पंजाब के कोटला सुल्तान सिंह गांव में हुआ। उस समय किसी ने नहीं सोचा था कि यह बच्चा भारतीय संगीत का सबसे बड़ा सितारा बनेगा।


रफी साहब की जिंदगी का एक दिलचस्प किस्सा उनके बचपन से जुड़ा है। उनके बड़े भाई की नाई की दुकान थी, जहां रफी अक्सर बैठा करते थे। एक फकीर रोज वहां से गुजरता था, जो गाते हुए भिक्षा मांगता था। उसकी आवाज का जादू ऐसा था कि रफी उसके पीछे-पीछे चल पड़ते। घर लौटकर वह उसकी आवाज की नकल करते। धीरे-धीरे लोगों को रफी की आवाज पसंद आने लगी। उनके बड़े भाई ने उनकी संगीत में रुचि को देखते हुए उन्हें उस्ताद अब्दुल वाहिद खान के पास संगीत शिक्षा लेने के लिए भेजा।


एक बार लाहौर में ऑल इंडिया रेडियो पर कुन्दन लाल सहगल का शो था। रफी और उनके भाई भी वहां गए थे। जब लाइट चली गई, तो सहगल ने गाने से मना कर दिया। रफी के भाई ने उनसे गाने की रिक्वेस्ट की। 13 साल के रफी ने पहली बार स्टेज पर गाया, और वहां मौजूद संगीतकार श्याम सुंदर ने उन्हें अपनी पंजाबी फिल्म 'गुल बलोच' में गाने का मौका दिया।


इसके बाद रफी मुंबई आए और संगीतकार नौशाद ने उन्हें हिंदी फिल्मों में गाने का अवसर दिया। फिल्म 'अनमोल घड़ी' के गाने 'तेरा खिलौना टूटा' से रफी को पहली बार पहचान मिली। इसके बाद उनकी सफलता का सिलसिला शुरू हुआ।


1950 और 1960 का दशक मोहम्मद रफी का स्वर्णिम काल माना जाता है। उन्होंने कई दिग्गज संगीतकारों के साथ काम किया और उनकी आवाज कई सुपरस्टार्स की पहचान बन गई।


रफी साहब केवल एक महान गायक नहीं थे, बल्कि एक विनम्र और दरियादिल इंसान भी थे। उन्होंने कई नए संगीतकारों के लिए कम मेहनताना लिया और कई बार बिना फीस के भी गाने गाए।


अपने चार दशक लंबे करियर में, मोहम्मद रफी ने हजारों गाने गाए। हिंदी के अलावा उन्होंने कई अन्य भाषाओं में भी गाया। उन्हें छह फिल्मफेयर पुरस्कार और भारत सरकार का पद्मश्री सम्मान भी मिला।


31 जुलाई 1980 को दिल का दौरा पड़ने से मोहम्मद रफी का निधन हो गया।


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