Movie prime

क्या है 'इक्कीस' की कहानी? एक युवा सैनिक की देशभक्ति की अनकही दास्तान

फिल्म 'इक्कीस' एक अनोखी दृष्टिकोण से युद्ध की कहानी पेश करती है, जिसमें 21 वर्षीय सेकंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल की जिंदगी को दर्शाया गया है। निर्देशक श्रीराम राघवन की यह फिल्म युद्ध को केवल जीत-हार के नजरिए से नहीं, बल्कि इंसान की भावनाओं के संदर्भ में देखती है। इसमें अगस्त्य नंदा, धर्मेंद्र और जयदीप अहलावत जैसे कलाकारों ने बेहतरीन अभिनय किया है। जानें इस फिल्म की गहराई और भावनात्मक पहलुओं के बारे में।
 
क्या है 'इक्कीस' की कहानी? एक युवा सैनिक की देशभक्ति की अनकही दास्तान

फिल्म 'इक्कीस' का परिचय




मुंबई, 1 जनवरी। निर्देशक श्रीराम राघवन की नई फिल्म 'इक्कीस' एक अनोखी दृष्टिकोण से युद्ध की कहानी पेश करती है। इसमें मुख्य भूमिकाओं में अगस्त्य नंदा, धर्मेंद्र, जयदीप अहलावत और सिमर भाटिया हैं। फिल्म की अवधि 143 मिनट है और इसे 4.5 स्टार की रेटिंग मिली है।


जब भी भारतीय सिनेमा में युद्ध पर आधारित फिल्में बनती हैं, वे अक्सर जोश और ऊंची आवाज वाली देशभक्ति तक सीमित रह जाती हैं। लेकिन 'इक्कीस' इस धारणा को तोड़ती है। यह फिल्म युद्ध को केवल जीत-हार के नजरिए से नहीं, बल्कि इंसान की भावनाओं और उसके पीछे छूटे जीवन के संदर्भ में देखती है। यह सेकंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल के जीवन पर आधारित है और दर्शकों को सोचने पर मजबूर करती है।


कहानी की गहराई

'इक्कीस' की कहानी दो समय कालों में चलती है, जो इसे एक साधारण बायोपिक से कहीं अधिक गहराई प्रदान करती है। पहला समय दिसंबर 1971 का है, जब भारत-पाक युद्ध के दौरान बसंतर की लड़ाई लड़ी जा रही थी। इस हिस्से में 21 वर्षीय अरुण खेत्रपाल को दिखाया गया है, जो एक टैंक रेजिमेंट की जिम्मेदारी संभालते हैं। फिल्म युद्ध दृश्यों को बड़े नाटकीय सीन के रूप में नहीं दिखाती, बल्कि एक युवा अधिकारी के डर और दबाव पर ध्यान केंद्रित करती है।


अगस्त्य नंदा ने अरुण खेत्रपाल का किरदार निभाया है, जिसमें उन्होंने एक सामान्य लेकिन कर्तव्यनिष्ठ युवा अधिकारी के रूप में अपनी भूमिका को निभाया है। उनका आत्मविश्वास और मासूमियत किरदार के साथ स्वाभाविक रूप से मेल खाता है।


भावनात्मक गहराई

फिल्म की दूसरी टाइमलाइन 2001 में सेट है, जहां अरुण के पिता ब्रिगेडियर एम. एल. खेत्रपाल का किरदार दिवंगत अभिनेता धर्मेंद्र निभाते हैं। इस हिस्से में बेटे की शहादत की यादें उनके भीतर जीवित हैं। उनकी मुलाकात पाकिस्तानी ब्रिगेडियर ख्वाजा मोहम्मद नसीर से होती है, जिसमें जयदीप अहलावत हैं। यह हिस्सा दो सैनिकों के बीच सरल संवाद के रूप में प्रस्तुत किया गया है।


जयदीप अहलावत का अभिनय इस फिल्म का एक मजबूत पक्ष है। उनका किरदार शांत और समझदार है, जो युद्ध की कीमत को गहराई से समझता है।


तकनीकी उत्कृष्टता

'इक्कीस' तकनीकी रूप से भी एक उत्कृष्ट फिल्म है। वीएफएक्स का उपयोग सीमित लेकिन प्रभावी है। टैंक युद्ध के दृश्य वास्तविक लगते हैं, जहां शोर से ज्यादा भारीपन और डर महसूस होता है। फिल्म का बैकग्राउंड म्यूजिक और डायलॉग भी सादगी को बनाए रखते हैं।


निर्देशक श्रीराम राघवन ने खामोशी और रुकावटों को कहानी का हिस्सा बनाया है। लेखन मजबूत है और दोनों टाइमलाइन सहज रूप से जुड़ती हैं।


निष्कर्ष

'इक्कीस' एक ऐसी फिल्म है जो युद्ध को जीत की कहानी नहीं, बल्कि इंसानियत की कहानी के रूप में देखती है। यह फिल्म सैनिकों की शहादत को सम्मान देती है।


OTT