कुंदन लाल सहगल: भारतीय सिनेमा के पहले सुपरस्टार की अनकही कहानी
कुंदन लाल सहगल का संगीत सफर
मुंबई, 17 जनवरी। कुंदन लाल सहगल को भारतीय सिनेमा का पहला 'सुपरस्टार' माना जाता है। कहा जाता है कि उनकी उपस्थिति से ही फिल्में हिट हो जाती थीं। जब हम संगीत की 'मेलोडी' की बात करते हैं, तो सहगल का नाम सबसे पहले आता है।
11 अप्रैल 1904 को जम्मू के नवा शहर में जन्मे कुंदन के परिवार में संगीत की कोई परंपरा नहीं थी। उनके पिता एक तहसीलदार थे, लेकिन मां केसर बाई के भजनों ने उनके भीतर संगीत के प्रति रुचि जगाई। सहगल की शिक्षा किसी उस्ताद के पास नहीं, बल्कि सूफी संतों की दरगाहों और रामलीला के मंचों पर हुई।
कम ही लोग जानते हैं कि फिल्मों में आने से पहले केएल सहगल ने रेलवे में टाइमकीपर और बाद में टाइपराइटर बेचने वाले सेल्समैन के रूप में भी काम किया। इस नौकरी ने उन्हें भारत के विभिन्न हिस्सों की यात्रा करने का अवसर दिया, जिससे उन्होंने कई भाषाओं और सुरों को सीखा।
1930 का दशक भारतीय सिनेमा में 'बोलती फिल्मों' का युग था। सहगल कोलकाता पहुंचे और 'न्यू थिएटर्स' के बीएन सरकार ने उनकी आवाज की पहचान की। उनकी शुरुआत 'सहगल कश्मीरी' नाम से हुई, लेकिन 1935 में आई फिल्म 'देवदास' ने उन्हें अमर बना दिया।
शरत चंद्र चट्टोपाध्याय के 'देवदास' को सहगल ने अपनी आवाज और अभिनय से जीवंत किया। 'बालम आए बसो मोरे मन में' जैसे गाने उन्हें हर घर में पहचान दिलाने में सफल रहे। उस समय लोग ग्रामोफोन रिकॉर्ड्स केवल इसलिए खरीदते थे क्योंकि उन पर सहगल का नाम होता था।
केएल सहगल की आवाज में एक अनोखी 'नोजल टोन' थी। जब शास्त्रीय संगीत के महान उस्ताद फैयाज खान ने उन्हें गाते सुना, तो वे दंग रह गए।
सहगल ने मिर्जा गालिब की गजलों को जो आत्मा दी, वह आज भी अद्वितीय है। 'नुक्ताचीं है गमे-दिल' और 'आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक' सुनकर ऐसा लगता है जैसे गालिब ने ये शब्द सहगल के लिए ही लिखे थे।
कुंदन लाल सहगल की एक और खासियत उनकी शराब की लत थी। वह अक्सर रिकॉर्डिंग से पहले शराब मांगते थे, जिसे वह 'काली पांच' कहते थे। दिग्गज संगीतकार नौशाद ने उन्हें बिना शराब के 'जब दिल ही टूट गया' गाने के लिए राजी किया। सहगल ने महसूस किया कि उनकी आवाज बिना नशे के कहीं अधिक स्पष्ट और भावुक थी।
दुर्भाग्य से, यह समझने में बहुत देर हो गई। शराब ने उनके लिवर को नुकसान पहुंचा दिया था। 18 जनवरी 1947 को, जब देश स्वतंत्रता की ओर बढ़ रहा था, यह सुरों का सम्राट हमें छोड़कर चला गया।
लता मंगेशकर ने केएल सहगल को अपना गुरु माना। किशोर कुमार ने उनके गीतों को किसी फिल्म में 'रीमेक' करने से इसलिए मना किया क्योंकि वह उन्हें 'गुरु' मानते थे।
आज भी जालंधर का 'केएल सहगल मेमोरियल हॉल' उनकी यादों को संजोए हुए है। कुंदन लाल सहगल एक ऐसे कलाकार थे जिन्होंने सादगी में महानता को खोजा। उन्होंने गजल को महफिलों से निकालकर आम लोगों तक पहुंचाया। जब भी पुरानी यादों का जिक्र होता है, सहगल की आवाज कानों में रस घोल देती है, 'दुख के अब दिन बीतत नाही...'
.png)