कथक सम्राट बिरजू महाराज: जानिए उनके नाम के पीछे की दिलचस्प कहानी
कथक के महानायक का परिचय
नई दिल्ली, 3 फरवरी। पंडित बिरजू महाराज एक ऐसी शख्सियत हैं जिन्होंने कथक नृत्य को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई। उनका जन्म 4 फरवरी 1938 को लखनऊ, उत्तर प्रदेश के कालका बिंदादिन घराने में हुआ। उन्होंने नृत्य नाटिकाओं जैसे गोवर्धन लीला, माखन चोरी, मालती माधव, कुमार संभव और फाग बहार में भगवान कृष्ण की लीलाओं को कथक के माध्यम से खूबसूरती से प्रस्तुत किया।
बिरजू महाराज का असली नाम बृजमोहन नाथ मिश्रा था, लेकिन उन्हें प्यार से 'बिरजू महाराज' कहा जाता है। इस नाम के पीछे एक दिलचस्प कहानी है, जिसे उन्होंने एक इंटरव्यू में साझा किया। उन्होंने बताया कि उनका जन्म लखनऊ के लफ्फिन हॉस्पिटल में हुआ था, जहां उस समय केवल लड़कियों का जन्म हो रहा था। जब वे एकमात्र लड़के के रूप में पैदा हुए, तो पड़ोसियों ने खुशी में कहा, "अरे, बृज के मोहन आए हैं। गोपियों के बीच एकमात्र कृष्ण।" इसीलिए उनका नाम बृजमोहन रखा गया।
समय के साथ 'बृजमोहन' नाम को प्यार से 'बिरजू' में बदल दिया गया। उन्होंने कहा, "राम राजा बने, शिव तप करते रहे, लेकिन गोपियों के साथ रास रचाने वाला तो बस एक ही था, कृष्ण। इसलिए मेरा नाम भी बृज का मोहन पड़ा।"
बिरजू महाराज का जन्म लखनऊ के प्रसिद्ध कालका बिंदादिन घराने में हुआ। उनके पिता अच्छन महाराज, चाचा शंभू महाराज और लछू महाराज सभी महान कथक नर्तक थे। मात्र तीन साल की उम्र में ही उनकी प्रतिभा का आभास होने लगा, लेकिन नौ साल की उम्र में उनके पिता का निधन हो गया। इसके बाद उनके चाचा शंभू और लछू महाराज ने उन्हें प्रशिक्षित किया।
बिरजू महाराज ने कथक को केवल नृत्य नहीं, बल्कि भाव, अभिनय और कहानी कहने की कला में भी परिवर्तित किया। उन्होंने 'गोवर्धन लीला', 'माखन चोरी', 'मालती माधव', 'कुमार संभव' और 'फाग बहार' जैसी नृत्य नाटिकाएं तैयार कीं। वह भगवान कृष्ण के अनन्य भक्त थे और अपनी कला के माध्यम से कृष्ण की लीलाओं को जीवंत कर देते थे।
कम लोग जानते हैं कि उनका सिनेमा जगत से भी गहरा संबंध था। उन्होंने 'शतरंज के खिलाड़ी' (सत्यजीत रे), 'दिल तो पागल है', 'देवदास', 'गदर' और 'विश्वरूपम' जैसी फिल्मों में नृत्य निर्देशन किया। 'विश्वरूपम' के लिए उन्हें 2012 में सर्वश्रेष्ठ नृत्य निर्देशन का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार भी मिला।
उनकी प्रतिभा को कई सम्मानों से नवाजा गया, जिसमें 1986 में भारत सरकार द्वारा दिया गया पद्म विभूषण, संगीत नाटक अकादमी अवॉर्ड, कालिदास सम्मान और लता मंगेशकर पुरस्कार शामिल हैं।
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