कौन हैं नटराज रामकृष्ण? भारतीय शास्त्रीय नृत्य के इस दिग्गज की कहानी
नटराज रामकृष्ण का अद्वितीय सफर
नई दिल्ली, 6 जून। नागपुर के भव्य राजदरबार में एक 18 वर्षीय युवक की नृत्य प्रस्तुति ने सभी को मंत्रमुग्ध कर दिया। उसकी थाप और भाव-भंगिमाओं में एक जादुई आकर्षण था, जिसने वहां उपस्थित सभी दर्शकों को प्रभावित किया। इस अद्वितीय प्रदर्शन के बाद, मराठा शासक ने उसे 'नटराज' की उपाधि दी, जो आगे चलकर उसकी पहचान बन गई। यह युवक कोई और नहीं, बल्कि नटराज रामकृष्ण थे, जिन्होंने भारतीय शास्त्रीय नृत्य के इतिहास को एक नई दिशा दी।
रामकृष्ण का जन्म 21 मार्च 1923 को एक तेलुगु परिवार में हुआ। उनकी माता का नाम दमयंती देवी वीणा था, जबकि पिता राममोहन राव ने नृत्य को लेकर रूढ़िवादी दृष्टिकोण अपनाया। जब रामकृष्ण केवल 3 वर्ष के थे, तब उनकी माता का निधन हो गया। मद्रास के रामकृष्ण मठ और महात्मा गांधी के साबरमती आश्रम की सादगी में बड़े हुए रामकृष्ण को उनके बड़े भाई श्याम सुंदर ने कला के प्रति प्रेरित किया।
उन्होंने मीनाक्षी सुंदरम पिल्लई से भरतनाट्यम की बारीकियां सीखी और नायडुपेटा राजम्मा से मंदिर नृत्य की जीवंतता को समझा। वेदांतम लक्ष्मीनारायण शास्त्री ने उन्हें कुचिपुड़ी की नाट्यशास्त्र में पारंगत किया, जबकि सुखदेव कार्तक और रायगढ़ के उस्तादों ने कथक की लयबद्धता सिखाई। चंपा बाई के मार्गदर्शन में उन्होंने हिंदुस्तानी ठुमरी के माध्यम से अभिनय में भावों की गहराई को समझा।
ब्रिटिश औपनिवेशिक काल और 'एंटी-नॉट आंदोलन' ने आंध्र प्रदेश की पारंपरिक देवदासी नृत्य शैलियों को हाशिए पर धकेल दिया। रामकृष्ण ने इस लुप्तप्राय धरोहर को बचाने के लिए दो दशकों तक शोध किया और इसे 'आंध्र नाट्यम' के रूप में पुनर्गठित किया। उन्होंने इसे तीन श्रेणियों में वर्गीकृत किया: आगम नर्तनम, आस्थान नर्तनम, और प्रबंध नर्तनम।
इस पुनरुद्धार के दौरान उन्हें एक अजीब लैंगिक सामाजिक संकट का सामना करना पड़ा। कुलीन परिवारों की लड़कियां इस कला को सीखने से हिचक रही थीं, इसलिए रामकृष्ण ने अपने पुरुष शिष्यों को स्त्री-पात्रों के अभिनय में प्रशिक्षित किया।
काकतीय राजवंश के समय, सैनिक भगवान शिव के समक्ष 'पेरिनी शिवतांडवम' नृत्य करते थे। साम्राज्य के पतन के साथ यह नृत्य इतिहास में खो गया। डॉ. रामकृष्ण ने वारंगल के 'रामप्पा मंदिर' की मूर्तियों और काकतीय सेनापति जयप सेनानी द्वारा रचित 'नृत्य रत्नावली' के श्लोकों का अध्ययन कर पेरिनी के शारीरिक व्याकरण को पुनर्गठित किया।
रामकृष्ण केवल एक नर्तक नहीं, बल्कि एक महान शिक्षाविद् भी थे। उन्होंने 45 से अधिक पुस्तकें लिखीं, जिनमें 'दक्षिणात्युल नाट्यकला चरित्र' को 1968 में राज्य सरकार द्वारा पुरस्कृत किया गया। उन्होंने विश्वविद्यालयों में आंध्र नाट्यम के पाठ्यक्रम शुरू करवाए। कला के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए उन्हें 1991 में राजा-लक्ष्मी पुरस्कार, 1992 में पद्मश्री, और 2010 में 'संगीत नाटक अकादमी फेलोशिप' से सम्मानित किया गया।
7 जून 2011 को हैदराबाद में इस महान विभूति ने अंतिम सांस ली।
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