Movie prime

सेक्स टॉयज का इतिहास: क्या यह मानसिक विकार है या सिर्फ़ आनंद का साधन?

सेक्स टॉयज का इतिहास और उनकी कानूनी स्थिति पर एक गहन दृष्टि। क्या ये मानसिक विकार का संकेत हैं या सिर्फ़ आनंद का साधन? जानें इसके पीछे का विज्ञान, मनोविज्ञान और वैश्विक उद्योग का आकार। इस लेख में हम सेक्स टॉयज के विकास, उनके उपयोग और समाज में उनकी स्वीकृति के बारे में चर्चा करेंगे।
 

सेक्स टॉयज का इतिहास

Sex Toys History Science India Explained in Hindi 

Sex Toys History Science India Explained in Hindi

सेक्स टॉयज का इतिहास: लगभग 28,000 साल पहले जर्मनी की एक गुफा में एक व्यक्ति ने पत्थर के टुकड़े को घिसकर चिकना किया। वैज्ञानिक इस पर बहस कर रहे हैं कि यह एक औज़ार था, पूजा की वस्तु या कुछ और। यह विषय पुराना है और समाज की बेचैनी भी उतनी ही पुरानी है। यूनान के नाटकों में इस पर मज़ाक किया गया, कामसूत्र में इसका उल्लेख है, और मध्यकालीन यूरोप में इस पर सज़ा का प्रावधान था। 19वीं सदी में एक कहानी उभरी कि डॉक्टरों ने 'हिस्टीरिया' का इलाज करते हुए वाइब्रेटर का आविष्कार किया, लेकिन 2018 में इतिहासकारों ने इस पर ठोस सबूत नहीं पाए।

सेक्स टॉयज अब अरबों डॉलर की वैश्विक उद्योग बन चुके हैं, फिर भी कई लोग इस पर चर्चा करने से कतराते हैं। भारत, जो कामशास्त्र की परंपरा का वारिस है, में इसकी कानूनी स्थिति अभी भी अस्पष्ट है। क्या सेक्स टॉयज का उपयोग किसी विकृति या मानसिक विकार का संकेत है? आइए इसके इतिहास, मनोविज्ञान और विज्ञान के शोधों के साथ-साथ भारत और दुनिया की कानूनी स्थिति पर नज़र डालते हैं।


सेक्स टॉय क्या है, और इतनी बहस क्यों?

सरल शब्दों में, सेक्स टॉय वह उपकरण है जो यौन आनंद या अनुभव को बढ़ाने के लिए बनाया गया है। यह विषय जितना वर्जित माना जाता है, इसका इतिहास उतना ही पुराना है। इसमें चिकित्सा, कानून, धर्म, कला, मनोविज्ञान और तकनीक सभी का समावेश है, इसलिए इसे केवल मनोरंजन की कहानी कहना अधूरा होगा।


पाषाण युग: गुफा से मिला रहस्यमयी पत्थर

जर्मनी की होहले फ़ेल्स गुफा में 2005 में एक चिकना और तराशा हुआ सिल्टस्टोन का टुकड़ा मिला, जो लगभग 28,000 साल पुराना है। कई पुरातत्वविद इसे सबसे पुराने यौन-संबंधी औज़ारों में मानते हैं, लेकिन सभी विद्वान इस पर सहमत नहीं हैं। कुछ इसे धार्मिक या प्रतीकात्मक वस्तु मानते हैं।


प्राचीन ग्रीस और भारत

यूनानी भाषा में चमड़े या लकड़ी से बनी वस्तु को 'ऑलिस्बोस' कहा जाता था। यह फूलदानों की चित्रकारी में दिखाई देती है और नाटककार अरिस्टोफ़ेनीज़ के नाटक 'लिसिस्ट्राटा' में इसका मज़ाकिया उल्लेख है। भारत में वात्स्यायन का 'कामसूत्र' केवल आसनों की किताब नहीं है, बल्कि जीवन जीने की कला का ग्रंथ है।


जापान और चीन: एदो काल की रंगीन दुनिया

जापान के एदो काल (1603-1868) में 'हरिगाटा' बनाए जाते थे, जो कछुए के खोल, लकड़ी या सींग से तैयार होते थे। 'शुंगा' नाम की प्रसिद्ध जापानी कला-शैली में इनके चित्र मिलते हैं। चीन में भी हाथीदांत, लाख और लकड़ी की ऐसी वस्तुओं का उल्लेख मिलता है।


मध्यकालीन यूरोप: पाबंदी और पर्दा

मध्यकालीन यूरोप में चर्च का नियंत्रण कड़ा था, और उस समय की 'पश्चाताप-संहिताओं' में इन वस्तुओं के इस्तेमाल पर सज़ा का प्रावधान था। यह दर्शाता है कि जिस चीज़ पर दंड का प्रावधान किया गया हो, वह ज़रूर मौजूद रही होगी।


19वीं सदी: वाइब्रेटर का जन्म और 'हिस्टीरिया' की गुत्थी

19वीं सदी में महिलाओं की थकान और चिड़चिड़ेपन का निदान 'हिस्टीरिया' के रूप में किया जाता था। 1880 के दशक में ब्रिटिश डॉक्टर जोसेफ़ मॉर्टिमर ग्रैनविल ने बिजली से चलने वाला उपकरण पेटेंट कराया। हालांकि, 2018 में इतिहासकारों ने इस दावे के ठोस प्रमाण नहीं पाए।


20वीं सदी: पाबंदी से विज्ञान तक

1873 के 'कॉम्स्टॉक कानून' ने अश्लील समझी जाने वाली वस्तुओं के डाक से भेजे जाने पर रोक लगाई। 1953 में अल्फ्रेड किन्से की रिपोर्ट में लगभग 62% अमेरिकी महिलाओं ने कभी न कभी स्व-उत्तेजना की बात मानी।


21वीं सदी: "वेलनेस" का नया चेहरा

2003 में स्वीडिश ब्रांड 'Lelo' जैसी कंपनियों ने इन्हें स्टाइलिश और मेडिकल-ग्रेड सिलिकॉन वाले उत्पादों में बदला। 'Fifty Shades of Grey' (2011) पुस्तक और कोविड लॉकडाउन (2020) के दौरान इनकी बिक्री में उछाल आया।


आँकड़े क्या कहते हैं?

अमेरिका के नेशनल सर्वे ऑफ़ सेक्शुअल हेल्थ एंड बिहेवियर (2009) के अनुसार, 18 से 60 साल की लगभग 1,000 महिलाओं में से 52% ने जीवन में कभी वाइब्रेटर का उपयोग किया।


विज्ञान: शरीर और दिमाग में असल में क्या होता है?

जननांग क्षेत्र की त्वचा में स्पर्श और कंपन पहचानने वाले कई तरह के संवेदी रिसेप्टर होते हैं। वाइब्रेटर का उपयोग करते समय, संवेदी संकेत रीढ़ की हड्डी से दिमाग तक पहुँचते हैं।


मनोविज्ञान: शर्म, आत्म-ज्ञान और रिश्ते

समाजशास्त्री जॉन गैग्नन और विलियम साइमन का 'सेक्शुअल स्क्रिप्ट सिद्धांत' कहता है कि हम यौन व्यवहार को समाज, परिवार, मीडिया और संस्कृति से सीखी स्क्रिप्ट से सीखते हैं।


सबसे बड़ा सवाल: क्या यह मानसिक विकार है?

सीधा जवाब है: नहीं। मानसिक रोगों के प्रमुख वर्गीकरण किसी व्यवहार को विकार नहीं मानते हैं।


कितना बड़ा है यह उद्योग?

Global Market Insights के अनुसार, 2025 में वैश्विक बाज़ार लगभग 46 अरब डॉलर का होगा।


दुनिया में कानूनी स्थिति: कहाँ वैध, कहाँ पाबंदी?

अधिकतर पश्चिमी देशों में वयस्कों के लिए सेक्स टॉयज़ की बिक्री और इस्तेमाल कानूनी है। हालांकि, कुछ देशों में सख्त धार्मिक या नैतिक कानूनों के कारण पाबंदियाँ हैं।


भारत में कानूनी स्थिति

भारत में सेक्स टॉयज़ की स्थिति कानूनी 'ग्रे एरिया' में है। यहाँ किसी ख़ास कानून ने इनके निर्माण, आयात, विपणन या बिक्री पर स्पष्ट रोक नहीं लगाई है।


OTT