क्या है वॉयनिच मैनुस्क्रिप्ट का रहस्य? जानें इस अद्भुत पांडुलिपि के बारे में
वॉयनिच मैनुस्क्रिप्ट का रहस्य
Voynich Manuscript Mystery Voynich Manuscript in Hindi
Voynich Manuscript Mystery Voynich Manuscript in Hindiवॉयनिच मैनुस्क्रिप्ट: दुनिया में कई प्राचीन पांडुलिपियाँ हैं जिनकी भाषा जटिल है, कुछ पन्ने क्षतिग्रस्त हैं या जिनका ऐतिहासिक संदर्भ अस्पष्ट है। लेकिन एक ऐसी किताब है जिसमें लगभग 234 पन्ने आज भी मौजूद हैं। इसके अक्षर स्पष्ट हैं, चित्र रंगीन हैं, और पूरी पांडुलिपि इंटरनेट पर उच्च गुणवत्ता में उपलब्ध है। फिर भी, लगभग पांच सौ साल बाद, हम यह नहीं जान पाते कि इसमें क्या लिखा है।
इस पांडुलिपि को ‘वॉयनिच मैनुस्क्रिप्ट’ कहा जाता है। वर्तमान में यह अमेरिका की येल यूनिवर्सिटी की बाइनेकी दुर्लभ पुस्तक एवं पांडुलिपि लाइब्रेरी में ‘MS 408’ के नाम से सुरक्षित है। इसमें एक ऐसी लिपि है जिसकी पहचान अब तक नहीं हो पाई है। इसके पन्नों पर अजीब पौधों के चित्र हैं, जिनमें से कई को किसी ज्ञात वनस्पति से नहीं जोड़ा जा सका है। कहीं राशिचक्र और खगोलीय आकृतियाँ हैं, तो कहीं नलियों और तरल से भरे पात्रों के बीच नग्न स्त्री आकृतियाँ हैं। आज भी येल इसे एक ऐसी पांडुलिपि मानता है जिसका पाठ नहीं पढ़ा जा सका है।
सबसे दिलचस्प बात यह है कि यह कोई आधुनिक नकली किताब नहीं लगती। वैज्ञानिक परीक्षणों ने इसके चर्मपत्र को पंद्रहवीं सदी का बताया है। स्याही और रंगों के भौतिक परीक्षणों में भी कोई आधुनिक सामग्री नहीं मिली। 2009 में किए गए विस्तृत परीक्षणों में वैज्ञानिकों ने स्याही, रंग और पांडुलिपि की भौतिक संरचना का अध्ययन किया था। इन परीक्षणों ने आधुनिक जालसाजी की संभावना को खारिज कर दिया। यहीं से वॉयनिच का असली रहस्य शुरू होता है। किताब हमारे सामने है, लेकिन उसकी आवाज कहीं खो गई है।
वॉयनिच नाम का origen
इस पुस्तक के लेखक का नाम वॉयनिच नहीं था। असली लेखक आज भी अज्ञात है। इसका आधुनिक नाम पोलिश-अमेरिकी दुर्लभ पुस्तक विक्रेता ‘विल्फ्रिड वॉयनिच’ के नाम पर पड़ा, जिन्होंने 1912 में रोम के पास फ्रास्काती स्थित एक जेसुइट कॉलेज से इसे खरीदा था। वॉयनिच को विश्वास था कि उनके हाथ कोई महत्वपूर्ण और शायद गुप्त ग्रंथ लगा है। उन्होंने इसे समझने के लिए विद्वानों और कूटलेख विशेषज्ञों की मदद ली, लेकिन जिस किताब ने उन्हें परेशान किया, वह उनसे लगभग पांच सौ साल पहले लिखी जा चुकी थी। वॉयनिच की मृत्यु के बाद पांडुलिपि उनकी पत्नी एथेल के पास गई। इसके बाद यह ऐनी निल और फिर दुर्लभ पुस्तकों के व्यापारी एच. पी. क्राउस तक पहुँची। 1969 में क्राउस ने इसे येल की बाइनेकी लाइब्रेरी को दे दिया। तब से यह वहीं सुरक्षित है। मूल पांडुलिपि की नाजुक स्थिति के कारण उस तक पहुँच सीमित है, लेकिन येल ने इसके उच्च गुणवत्ता वाले डिजिटल चित्र उपलब्ध करा रखे हैं। इसलिए आज दुनिया भर के शोधकर्ता इसके हर पन्ने को देख सकते हैं। समस्या सिर्फ इतनी है कि पन्ने दिखते हैं, शब्द नहीं समझ आते।
पांडुलिपि की उम्र
इसकी उम्र को लेकर लंबे समय तक कई अनुमान लगाए जाते रहे। वैज्ञानिक परीक्षणों ने रहस्य का एक हिस्सा साफ कर दिया। पांडुलिपि जिस चर्मपत्र पर लिखी गई है, उसके कार्बन परीक्षण ने उसे पंद्रहवीं सदी के शुरुआती दशकों से जोड़ा है। येल भी इसे भौतिक परीक्षणों के आधार पर पंद्रहवीं सदी की पांडुलिपि मानता है। लेकिन यहां एक जरूरी वैज्ञानिक सावधानी है। कार्बन परीक्षण चर्मपत्र की उम्र बताता है, उस पर लिखे गए शब्दों की तारीख सीधे नहीं बताता। सिद्धांत रूप में पुराने चर्मपत्र पर बाद में भी लिखा जा सकता है। फिर भी जब चर्मपत्र के साथ स्याही, रंग, लिखावट और पांडुलिपि की पूरी भौतिक संरचना को देखा जाता है तो इसे आधुनिक समय में बनाई गई नकली वस्तु मानने का कोई मजबूत आधार नहीं मिलता। इसलिए असली सवाल यह नहीं है कि क्या वॉयनिच मैनुस्क्रिप्ट सचमुच पुरानी है? बड़ा सवाल यह है कि पंद्रहवीं सदी में इसे किसने लिखा और क्यों लिखा?
पन्नों पर क्या है?
अगर लिखावट पढ़ी नहीं जा सकती तो चित्र कम-से-कम यह संकेत दे सकते हैं कि किताब किस विषय पर है। येल पांडुलिपि के चित्रों के आधार पर इसके हिस्सों को मोटे तौर पर वनस्पति, खगोल और ज्योतिष, स्नान या शरीर से जुड़े चित्र, ब्रह्मांडीय आकृतियाँ, औषधीय पौधे और जड़ें तथा अंत में छोटे-छोटे नुस्खे जैसे पाठ वाले भागों में देखता है। सबसे बड़ा हिस्सा वनस्पति जैसा दिखाई देता है। बड़े-बड़े पौधे बनाए गए हैं और उनके आसपास उसी रहस्यमय लिपि में कुछ लिखा है। लेकिन यहां भी रहस्य कम नहीं होता। बहुत से पौधे किसी ज्ञात वनस्पति से सीधे मेल नहीं खाते। कहीं जड़ किसी एक पौधे जैसी है, लेकिन पत्तियाँ दूसरी प्रजाति की लगती हैं और फूल किसी तीसरे पौधे जैसा दिखाई देता है। इससे कई संभावनाएँ पैदा होती हैं। हो सकता है कि चित्रकार वास्तविक पौधों को बहुत खराब तरीके से चित्रित कर रहा हो। हो सकता है अलग-अलग पौधों के गुणों को मिलाकर चित्र बनाए गए हों। यह भी संभव है कि वे वास्तविक पौधों के प्रतीकात्मक चित्र हों जिनका अर्थ उस समय के पाठक समझते थे। लेकिन इनमें से किसी संभावना को अभी निर्णायक रूप से सिद्ध नहीं किया जा सका है।
राशिचक्र और खगोलीय चित्र
पांडुलिपि में सूर्य, चंद्रमा, तारे और राशिचक्र जैसी आकृतियाँ भी दिखाई देती हैं। कुछ पन्नों पर बड़े गोल चित्र हैं जिनमें राशि चिह्नों से मिलती-जुलती आकृतियाँ दिखाई देती हैं। इससे अनुमान लगाया गया कि पुस्तक का संबंध ज्योतिष, खगोल, चिकित्सा या इन तीनों के किसी मध्ययुगीन मिश्रण से हो सकता है। उस समय यूरोप में चिकित्सा और ज्योतिष का संबंध आज की तुलना में कहीं अधिक सामान्य था। शरीर, बीमारी, मौसम, ग्रहों और औषधियों को एक ही ज्ञान व्यवस्था के हिस्से के रूप में देखने की परंपरा मौजूद थी। लेकिन केवल चित्र देखकर किताब का विषय तय नहीं किया जा सकता। जब तक उसके साथ लिखे शब्दों का अर्थ नहीं पता चलता, हर ऐसी व्याख्या अनुमान ही रहेगी।
नग्न स्त्रियों के चित्र
वॉयनिच मैनुस्क्रिप्ट के सबसे प्रसिद्ध और सबसे विचित्र पन्नों में छोटी-छोटी नग्न स्त्री आकृतियाँ दिखाई देती हैं। वे हरे रंग के तरल जैसे पदार्थ में स्नान करती नजर आती हैं और विचित्र नलियों, पात्रों तथा गोल संरचनाओं से जुड़ी हुई हैं। यही चित्र इस पांडुलिपि को लेकर सबसे ज्यादा कल्पनाओं का कारण बने हैं। किसी ने इन्हें स्त्री-रोग चिकित्सा से जोड़ा, किसी ने प्रजनन तंत्र से, किसी ने औषधीय स्नान से और किसी ने मानव शरीर के भीतर मौजूद द्रवों या अंगों के प्रतीक के रूप में देखा। कुछ व्याख्याओं में इन्हें मध्ययुगीन स्वास्थ्य चिकित्सा से भी जोड़ा गया। लेकिन इनमें से कोई व्याख्या निर्णायक रूप से साबित नहीं हुई है। येल इन्हें अधिक सावधानी से स्नान या ‘बाल्नियोलॉजी’, यानी औषधीय स्नान से संबंधित चित्रों के रूप में वर्गीकृत करता है। लेकिन चित्र बनाने वाले व्यक्ति की भाषा और उसका उद्देश्य हमारे सामने नहीं है।
क्या यह गुप्त भाषा में है?
यही सबसे बड़ा सवाल है। पांडुलिपि के अक्षर किसी ज्ञात सामान्य यूरोपीय वर्णमाला से मेल नहीं खाते। शोधकर्ताओं ने सुविधा के लिए इसके चिह्नों को अलग-अलग संकेतों में बांटकर उनका लिप्यंतरण तैयार किया है, ताकि कंप्यूटर और भाषाविज्ञान की मदद से उनका अध्ययन किया जा सके। लेकिन यहां एक बुनियादी समस्या है। हम यह भी निश्चित रूप से नहीं जानते कि जिसे हम एक अक्षर मान रहे हैं, वह वास्तव में अक्षर ही है या कोई ध्वनि, पूरा शब्द या किसी कूट प्रणाली का संकेत। इसके बावजूद पाठ पूरी तरह बेतरतीब भी नहीं दिखाई देता। कुछ चिह्नों के समूह बार-बार आते हैं। कुछ शब्द खास जगहों पर ज्यादा दिखाई देते हैं। पंक्तियों और अनुच्छेदों में एक संरचना नजर आती है। शब्दों की लंबाई और दोहराव में भी कुछ नियमितता दिखाई देती है।
क्या महान कूटलेख विशेषज्ञ भी इसे नहीं पढ़ पाए?
बीसवीं और इक्कीसवीं सदी में भाषाविदों, गणितज्ञों, इतिहासकारों और कूटलेख विशेषज्ञों ने इस पर काम किया है। बाद में कंप्यूटर विश्लेषण और कृत्रिम बुद्धिमत्ता का इस्तेमाल भी शुरू हुआ। फिर भी ऐसा कोई अनुवाद सामने नहीं आया जिसे स्वतंत्र विशेषज्ञ पांडुलिपि के बड़े हिस्से पर लगातार लागू कर सकें और स्वीकार कर सकें। लगभग हर कुछ साल में खबर आती है कि किसी शोधकर्ता ने वॉयनिच मैनुस्क्रिप्ट का रहस्य सुलझा लिया है। कभी इसे हिब्रू बताया जाता है, कभी पुरानी तुर्की भाषा, कभी किसी रोमांस भाषा का रूप, कभी लैटिन का कूट रूप और कभी किसी गुप्त चिकित्सा परंपरा की भाषा। समस्या यह है कि दो-चार शब्दों का संभावित अर्थ निकाल लेना अनुवाद नहीं होता। किसी समाधान को गंभीरता से स्वीकार करने के लिए उसे पूरे पाठ पर लगातार काम करना होगा। उसे शब्दों और वाक्यों की संरचना समझानी होगी, चित्रों से उसका संबंध दिखाना होगा और सबसे महत्वपूर्ण बात यह होगी कि दूसरे विशेषज्ञ भी उसी पद्धति से स्वतंत्र रूप से वही अर्थ निकाल सकें।
क्या इसे रोजर बेकन ने लिखा था?
यह वॉयनिच मैनुस्क्रिप्ट से जुड़ी सबसे पुरानी लोकप्रिय धारणाओं में से एक है। पांडुलिपि कभी पवित्र रोमन सम्राट रूडोल्फ द्वितीय के पास रही थी। माना जाता है कि उन्होंने इसे 600 स्वर्ण डुकाट में खरीदा था। उस समय उनके सामने यह दावा रखा गया था कि यह अंग्रेज दार्शनिक और विद्वान रोजर बेकन की रचना हो सकती है। लेकिन आधुनिक अध्ययन इस संबंध को प्रमाणित नहीं करते। येल भी रोजर बेकन से इसके संबंध को अटकल मानता है। सबसे बड़ी समस्या समय की है। रोजर बेकन तेरहवीं सदी के व्यक्ति थे, जबकि चर्मपत्र के वैज्ञानिक परीक्षण पांडुलिपि को पंद्रहवीं सदी की ओर ले जाते हैं। इसी तरह अंग्रेज गणितज्ञ और रहस्यवादी जॉन डी का नाम भी इसके इतिहास से जोड़ा गया है। लेकिन उनके साथ पांडुलिपि के संबंध को लेकर भी ठोस प्रमाण नहीं हैं।
इसके इतिहास में कौन दिखाई देता है?
वॉयनिच मैनुस्क्रिप्ट का शुरुआती इतिहास पूरी तरह अंधेरे में नहीं है। इसके इतिहास में कुछ ऐसे नाम हैं जिनके साथ इसके संबंध के प्रमाण अपेक्षाकृत मजबूत हैं। येल के अनुसार इसके शुरुआती पुष्ट प्रमुख मालिकों में सम्राट रूडोल्फ द्वितीय का नाम आता है। इसके बाद यह फार्मासिस्ट और विद्वान जैकबस होर्चिकी डी टेपेनेक से जुड़ी। फिर यह जॉर्जियस बार्शियस के पास पहुँची। बार्शियस स्वयं इसे समझ नहीं सके। उन्होंने प्रसिद्ध जेसुइट विद्वान अथानासियस किर्चर से मदद मांगी। बार्शियस की मृत्यु के बाद पांडुलिपि जोहान्स मार्कस मार्सी के पास गई।
क्या इसे एक ही व्यक्ति ने लिखा था?
लंबे समय तक स्वाभाविक रूप से यही माना जाता रहा कि किसी एक रहस्यमय लेखक ने पूरी किताब लिखी होगी। लेकिन हस्तलेखन के आधुनिक अध्ययन ने इस कहानी को और दिलचस्प बना दिया है। मध्ययुगीन पांडुलिपि विशेषज्ञ लिसा फेगिन डेविस ने डिजिटल और पुरालेखीय अध्ययन के आधार पर निष्कर्ष निकाला कि इसमें संभवतः पांच अलग-अलग लेखकों या लिपिकारों के हाथ पहचाने जा सकते हैं। येल ने भी उनके शोध को विशेष रूप से रेखांकित किया है। अगर यह निष्कर्ष सही है तो यह मानना मुश्किल हो जाता है कि किसी एक सनकी व्यक्ति ने अकेले बैठकर अर्थहीन अक्षरों की एक विशाल किताब तैयार कर दी। पांच लोग अगर एक ही लेखन प्रणाली में काम कर रहे थे तो संभव है कि उस प्रणाली की उन्हें साझा समझ थी। अगर पांच लोग इसे लिखना जानते थे तो वह ज्ञान पूरी तरह गायब कैसे हो गया?
क्या यह महिलाओं की चिकित्सा से जुड़ी किताब हो सकती है?
नग्न स्त्री आकृतियों, औषधीय पौधों और ज्योतिषीय संकेतों को देखते हुए यह सिद्धांत लंबे समय से आकर्षक रहा है कि पांडुलिपि स्त्री स्वास्थ्य, गर्भधारण, प्रसव, स्नान चिकित्सा या औषधीय इलाज से जुड़ी हो सकती है। मध्ययुगीन यूरोप में स्वास्थ्य से जुड़ी पुस्तकों में पौधों, शरीर, ज्योतिष और उपचार संबंधी जानकारी का मिश्रण असामान्य नहीं था। इसलिए यह संभावना ऐतिहासिक रूप से असंभव नहीं है। जब तक पाठ पढ़ा नहीं जाता, चित्रों के आधार पर पुस्तक का विषय तय करना अनुमान ही रहेगा।
क्या यह कीमिया की किताब है?
कीमिया का सिद्धांत भी काफी लोकप्रिय है। मध्ययुगीन और पुनर्जागरण काल में कीमिया, औषधि निर्माण, ज्योतिष और प्राकृतिक दर्शन कई बार एक-दूसरे से जुड़े हुए थे। वॉयनिच मैनुस्क्रिप्ट में जड़ी-बूटियाँ, पात्र, नलियाँ और ब्रह्मांडीय आकृतियाँ देखकर कीमिया का अनुमान लगाना इसलिए स्वाभाविक है। लेकिन पुस्तक में ऐसे स्पष्ट और निर्विवाद प्रतीक नहीं हैं जिनके आधार पर इसे निश्चित रूप से पारंपरिक कीमियाई ग्रंथ कहा जा सके। इसलिए इसे ‘गुप्त कीमिया की किताब’ कहना एक दिलचस्प कहानी जरूर है, लेकिन अभी स्थापित तथ्य नहीं।
क्या यह एक बड़ा मजाक या धोखा हो सकता है?
संभव है कि किसी व्यक्ति या समूह ने ऐसी किताब बनाई हो जिसका वास्तव में कोई अर्थ न हो। शायद किसी धनी संरक्षक को प्रभावित करने के लिए, शायद किसी दुर्लभ प्राचीन ग्रंथ के रूप में बेचने के लिए या शायद सिर्फ इसलिए कि रहस्यमय ज्ञान की अपनी कीमत होती है। रूडोल्फ द्वितीय द्वारा कथित 600 स्वर्ण डुकाट में इसे खरीदने की कहानी इस सिद्धांत को और रोचक बनाती है। लेकिन यहां फिर एक मुश्किल सामने आती है। करीब 234 पन्नों की यह पांडुलिपि साधारण मजाक के लिए बहुत बड़ा काम है। चर्मपत्र, रंग, चित्र, व्यवस्थित लेखन और संभवतः कई लिपिकारों का इस्तेमाल हुआ। अगर यह धोखा था तो इसे तैयार करने में काफी मेहनत लगी होगी। फिर इतना बड़ा धोखा किसने, किसके लिए और किस उद्देश्य से बनाया?
क्या यह किसी भूली हुई भाषा में लिखी गई है?
इतिहास में कई भाषाएँ और बोलियाँ खत्म हो चुकी हैं। लेकिन अगर वॉयनिच किसी सामान्य प्राकृतिक भाषा में लिखी गई है तो उसकी लिपि इतनी अलग क्यों है? आसपास के किसी दूसरे दस्तावेज में यही लेखन प्रणाली क्यों नहीं मिलती? एक संभावना यह हो सकती है कि मूल भाषा जानी-पहचानी हो लेकिन उसे जानबूझकर बदली हुई लिपि या कूट प्रणाली में लिखा गया हो। दूसरी संभावना यह है कि यह किसी छोटे समुदाय की निजी लेखन प्रणाली रही हो। तीसरी संभावना यह है कि यह भाषा जैसा दिखने वाला कृत्रिम पाठ हो। फिलहाल इनमें से किसी संभावना के पक्ष में इतना मजबूत प्रमाण नहीं है कि बाकी को खारिज किया जा सके।
एआई इसे क्यों नहीं पढ़ पाती?
आज यह सवाल सबसे स्वाभाविक है। जब एआई कई भाषाओं के बीच अनुवाद कर सकती है तो वॉयनिच मैनुस्क्रिप्ट क्यों नहीं? जवाब है कि सामान्य अनुवाद में मशीन के पास दोनों भाषाओं के बीच तुलना करने के लिए बहुत बड़ा आधार होता है। उसे पता होता है कि एक भाषा का कौन-सा शब्द दूसरी भाषा के किस अर्थ से जुड़ा है। वॉयनिच में ऐसी कोई मदद उपलब्ध नहीं है। हम यह भी नहीं जानते कि उसके चिह्न अक्षर हैं या कुछ और। हमें भाषा का नाम नहीं पता। शब्द कहाँ खत्म होते हैं, यह पूरी तरह निश्चित नहीं है। ध्वनि व्यवस्था का पता नहीं है। और सबसे बड़ी बात, यह भी पूरी तरह साबित नहीं हुआ कि पाठ वास्तव में किसी प्राकृतिक भाषा का पाठ है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता पैटर्न खोज सकती है। वह यह बता सकती है कि कौन-से चिह्न एक साथ आते हैं, कौन-से शब्द किस पृष्ठ पर ज्यादा दिखाई देते हैं, अलग-अलग लेखकों की लिखावट कहाँ बदलती है और किन हिस्सों में समान संरचना है। अगर किसी अज्ञात प्रतीक के सामने हमारे पास उसका कोई ज्ञात अर्थ ही नहीं है तो मशीन भी संभावनाओं की एक बहुत बड़ी दुनिया में फंस सकती है। यही कारण है कि कंप्यूटर और कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने शोध को आगे बढ़ाया है, लेकिन अभी तक रहस्य को हल नहीं किया है।
सबसे बड़ी भूल क्या होगी?
वॉयनिच मैनुस्क्रिप्ट के रहस्य को देखकर सबसे बड़ी गलती यह होगी कि हम मान लें कि रहस्यमय चीज का संबंध जरूर किसी अलौकिक घटना से होगा। इसके साथ एलियन, खोई हुई सभ्यता, भविष्य से आई किताब, जादुई चिकित्सा और गुप्त ब्रह्मांडीय ज्ञान जैसी अनगिनत कहानियाँ जुड़ी हुई हैं। लेकिन इनमें से किसी के लिए विश्वसनीय प्रमाण मौजूद नहीं है। हमें जितना पता है, वह कहीं ज्यादा साधारण और इसलिए कहीं ज्यादा दिलचस्प है। यह एक वास्तविक पुरानी पांडुलिपि है। यह पंद्रहवीं सदी के यूरोपीय वातावरण से जुड़ी दिखाई देती है। इसमें व्यवस्थित पाठ है। इसमें चित्र हैं। इसके इतिहास में कई वास्तविक विद्वान और संग्रहकर्ता दिखाई देते हैं। कई पीढ़ियों ने इसे समझने की कोशिश की है। और फिर भी हम नहीं जानते कि इसमें लिखा क्या है।
क्या भविष्य में इसे पढ़ा जा सकता है?
इतिहास में ऐसी कई लिपियाँ रही हैं जिन्हें लंबे समय तक कोई नहीं पढ़ पाया और बाद में किसी एक महत्वपूर्ण खोज ने पूरा खेल बदल दिया। मिस्र की चित्रलिपि को समझने में रोसेटा स्टोन निर्णायक साबित हुआ। मायसीनी सभ्यता की लीनियर बी लिपि को बीसवीं सदी में माइकल वेंट्रिस ने पढ़ा। माया लेखन को भी लंबे शोध के बाद धीरे-धीरे समझा गया। वॉयनिच की समस्या शायद इससे भी कठिन है, क्योंकि हमारे पास कोई ज्ञात समानांतर पाठ नहीं है। भाषा निश्चित नहीं है। लेखक का पता नहीं है और इस लिपि का दूसरा निर्विवाद उदाहरण भी सामने नहीं आया है। फिर भी आधुनिक संगणकीय विश्लेषण, हस्तलेखन अध्ययन, पदार्थ विज्ञान, मध्ययुगीन इतिहास, भाषाविज्ञान और कृत्रिम बुद्धिमत्ता मिलकर संभावनाओं को धीरे-धीरे सीमित कर सकते हैं। हो सकता है निर्णायक सुराग किताब के भीतर से ही न मिले। यूरोप के किसी पुराने अभिलेखागार में किसी दिन उसी लिपि में लिखा कोई छोटा दस्तावेज मिल सकता है। किसी पुराने पत्र में लेखक का नाम मिल सकता है। किसी अन्य ज्ञात भाषा के साथ इसका समानांतर पाठ सामने आ सकता है। और ऐसी एक खोज पांच सौ साल पुराने इस रहस्य को अचानक बदल सकती है।
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