क्या पलाश चौधरी ने प्राथमिक शिक्षा में तकनीक का नया आयाम स्थापित किया?
कोलकाता में शिक्षक पलाश चौधरी का अनोखा प्रयोग
National Teacher Award 2026
National Teacher Award 2026कोलकाता। प्रौद्योगिकी के प्रति आकर्षण रखने वाले पलाश चौधरी ने इंजीनियर बनने का सपना देखा था, लेकिन पारिवारिक और आर्थिक बाधाओं ने उन्हें शिक्षक बना दिया। उन्होंने अपने विद्यालय में तकनीक का उपयोग इस तरह किया कि एक साधारण प्राथमिक विद्यालय की पढ़ाई और प्रबंधन में बदलाव आया। पश्चिम बंगाल के पूर्व बर्द्धमान जिले के श्री रामकृष्ण शारदा विद्यापीठ प्राथमिक विद्यालय के प्रधान शिक्षक पलाश ने उपस्थिति, कक्षा की दिनचर्या, गृहकार्य, परीक्षा और बच्चों की शैक्षणिक प्रगति को डिजिटल रूप से जोड़कर स्कूल और अभिभावकों के बीच की दूरी को कम किया। इस नवाचार के लिए उन्हें 2026 का राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार मिला।
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने 5 सितंबर को शिक्षक दिवस पर नई दिल्ली में आयोजित समारोह में पुरस्कार प्रदान किए। इस पुरस्कार के तहत शिक्षक को योग्यता प्रमाणपत्र, रजत पदक और 50,000 रुपये की नकद राशि दी जाती है। पलाश चौधरी को पहले भी उनके कार्य के लिए पहचान मिली है, जैसे कि 2016 में जिले के सर्वश्रेष्ठ प्रधान शिक्षक का पुरस्कार और 2022 में पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा ‘शिक्षा रत्न’ पुरस्कार।
पलाश ने 2011 में श्री रामकृष्ण शारदा विद्यापीठ प्राथमिक विद्यालय के प्रधान शिक्षक का पद संभाला। उन्होंने 2014 के आसपास अपने प्रयोग की दिशा को स्पष्ट किया। कर्नाटक, तमिलनाडु और उत्तराखंड में तकनीक के उपयोग को देखकर उन्हें लगा कि पश्चिम बंगाल के प्राथमिक विद्यालय में भी ऐसा प्रयोग किया जा सकता है। उनके पास बड़े संसाधन नहीं थे, लेकिन उन्होंने उपलब्ध साधनों का उपयोग करके धीरे-धीरे स्कूल की व्यवस्था को डिजिटल बनाया।
इस प्रयोग का मुख्य हिस्सा एक मोबाइल एप्लिकेशन था, जिससे विद्यालय और अभिभावकों के बीच सूचनाओं का आदान-प्रदान संभव हुआ। यदि कोई बच्चा स्कूल नहीं आता, तो उस दिन की पढ़ाई की जानकारी उसे दी जा सकती है। हर बच्चे की शैक्षणिक प्रगति का रिकॉर्ड एप पर रखा जाता है और नियमित रूप से अपडेट किया जाता है। गृहकार्य, परीक्षा और मूल्यांकन की जानकारी भी इसी माध्यम से उपलब्ध कराई जाती है।
इस व्यवस्था का महत्व केवल मोबाइल एप के उपयोग तक सीमित नहीं है। यह अभिभावकों को बच्चे की वास्तविक शैक्षणिक स्थिति की जानकारी नियमित रूप से देती है, जिससे वे शिक्षा प्रक्रिया में सक्रिय भागीदार बन सकते हैं। पलाश की व्यवस्था ने अनुपस्थिति के कारण पढ़ाई में होने वाले अंतर को भी कम किया है।
पलाश चौधरी के प्रयासों के परिणामस्वरूप विद्यालय में विद्यार्थियों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। हालांकि, इस दावे को और मजबूत करने के लिए पहले और वर्तमान नामांकन का तुलनात्मक आंकड़ा होना आवश्यक है।
इस प्रयोग को शिक्षा में तकनीक के उपयोग का एक महत्वपूर्ण उदाहरण माना जा सकता है, लेकिन इसके साथ कुछ सावधानियां भी जरूरी हैं। बच्चों की व्यक्तिगत जानकारी की सुरक्षा सुनिश्चित करना आवश्यक है।
पलाश चौधरी की कहानी यह दर्शाती है कि आर्थिक बाधाओं ने उनके तकनीकी कौशल को समाप्त नहीं किया। उन्होंने इंजीनियरिंग को पेशा नहीं बनाया, लेकिन तकनीकी सोच को अध्यापन से जोड़ दिया। उनका प्रयोग यह सवाल उठाता है कि क्या सरकारी विद्यालयों का डिजिटलीकरण केवल तकनीकी उपकरणों तक सीमित रहेगा या यह शिक्षा प्रक्रिया को समझने और अभिभावकों को जोड़ने में सहायक होगा।
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