क्या आप जानते हैं शंकर आबाजी भिसे की अनकही कहानी? भारत के 'इंडियन एडिसन' की यात्रा!
शंकर आबाजी भिसे की अनकही कहानी
Shankar Abaji Bhise Story Explained in Hindi
Shankar Abaji Bhise Story Explained in Hindiशंकर आबाजी भिसे की कहानी: भारत के विज्ञान और तकनीकी इतिहास में कुछ ऐसी कहानियाँ हैं, जिनमें सबसे बड़ा प्रश्न प्रतिभा का नहीं, बल्कि उसकी स्मृति का होता है। एक व्यक्ति अपने समय में इतना अद्वितीय कार्य करता है कि उसकी चर्चा विदेशों में होती है, उसे महान आविष्कारकों के साथ जोड़ा जाता है, लेकिन कुछ दशकों बाद उसका नाम लगभग भुला दिया जाता है। शंकर आबाजी भिसे की कहानी कुछ ऐसी ही है। 1867 में बंबई में जन्मे भिसे के पास किसी प्रमुख विश्वविद्यालय से वैज्ञानिक शिक्षा नहीं थी। उन्होंने किताबों और वैज्ञानिक पत्रिकाओं से आत्म-शिक्षा करते हुए प्रयोग किए और आगे चलकर मशीनों, मुद्रण तकनीक, विज्ञापन उपकरणों और अन्य क्षेत्रों में नवाचार किए। उनके नाम के साथ लगभग 200 आविष्कारों और करीब 40 पेटेंटों का उल्लेख मिलता है। अपने समय में अमेरिका और यूरोप में उन्हें 'इंडियन एडिसन' कहा गया। फिर भी आज भारत में बहुत कम लोग उनके नाम से परिचित हैं।
शिक्षा के बिना शुरू हुआ सफर
शंकर आबाजी भिसे का जन्म 29 अप्रैल 1867 को बंबई में हुआ था। आधुनिक दृष्टिकोण से उनके पास उच्च वैज्ञानिक या इंजीनियरिंग शिक्षा नहीं थी, लेकिन मशीनों के कार्य करने के तरीके को समझने की गहरी जिज्ञासा थी। वे वैज्ञानिक पत्रिकाएँ पढ़ते, उनमें प्रकाशित तकनीकी विचारों को समझने का प्रयास करते और फिर अपने स्तर पर प्रयोग करते थे। प्रारंभिक चरण में उन्होंने स्वयं वजन करने वाली मशीन का डिज़ाइन तैयार किया। 1897 में एक प्रतियोगिता में इस डिज़ाइन को पुरस्कार मिला और यहीं से उनके आविष्कारों की चर्चा बंबई से बाहर तक पहुंचने लगी।
भिसोटाइप: मुद्रण की चुनौती का समाधान
भिसे का सबसे महत्वाकांक्षी तकनीकी कार्य मुद्रण के क्षेत्र में सामने आया। उस समय किताबें, समाचार पत्र और अन्य बड़े प्रकाशन तैयार करने के लिए धातु के अक्षरों की आवश्यकता होती थी। अक्षरों को ढालना, उन्हें सही आकार में तैयार करना और फिर छपाई के लिए व्यवस्थित करना एक कठिन और समय लेने वाली प्रक्रिया थी। भिसे ने इसी समस्या को ध्यान में रखते हुए एक मशीन विकसित करने का प्रयास किया, जिसे बाद में 'भिसोटाइप' के नाम से जाना गया। इसके विभिन्न संस्करणों की क्षमता के बारे में ऐतिहासिक स्रोतों में भिन्न आंकड़े मिलते हैं। प्रारंभिक डिज़ाइन के लिए लगभग 1,500 से 2,000 अक्षर प्रति घंटे की क्षमता का उल्लेख मिलता है।
टाटा के साथ साझेदारी और बड़े बाजार का सपना
भिसे के आविष्कारों को व्यावसायिक रूप देने में रतनजी टाटा का सहयोग महत्वपूर्ण था। 1910 में लंदन में टाटा-भिसे इन्वेंशन सिंडिकेट की स्थापना की गई। इसका उद्देश्य भिसे के आविष्कारों को व्यवसाय में बदलना और उन्हें बड़े बाजार तक पहुंचाना था। लेकिन भिसे के सामने परिस्थितियाँ लगातार बदलती रहीं। प्रथम विश्वयुद्ध ने अंतरराष्ट्रीय व्यापार और निवेश के माहौल को प्रभावित किया। इसके बाद उन्होंने अमेरिका का रुख किया, जहां उन्होंने अपनी कंपनी स्थापित की और मुद्रण तथा टाइप-कास्टिंग तकनीक को आगे बढ़ाने का प्रयास किया।
क्या उनकी मशीन को दुनिया ने अपनाया?
भिसे के बारे में लिखते समय सावधानी बरतनी पड़ती है। कई लेखों में यह दावा किया जाता है कि भिसोटाइप को पूरी दुनिया ने अपना लिया और उसने आधुनिक छपाई व्यवस्था को बदल दिया। हालांकि, उपलब्ध ऐतिहासिक सामग्री इस दावे को सीधे तौर पर समर्थन नहीं करती। भिसे की मशीन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चित हुई, उसके पेटेंट हुए, लेकिन इसे दुनिया भर में स्थायी रूप से अपनाई गई तकनीक कहना अतिशयोक्ति होगी।
भिसे की विरासत
शंकर आबाजी भिसे की सबसे बड़ी विरासत शायद किसी एक मशीन में नहीं है। वह उस विश्वास में है जिसने उन्हें यह सोचने का साहस दिया कि भारत का एक व्यक्ति भी ऐसी तकनीक बना सकता है जिसे यूरोप और अमेरिका के औद्योगिक बाजार के सामने रखा जा सके। भिसोटाइप का व्यावसायिक इतिहास जितना जटिल और अधूरा रहा, उनकी आविष्कारशीलता उतनी ही असाधारण थी। उनकी कहानी यह भी समझाती है कि आविष्कार और व्यावसायिक सफलता एक ही चीज नहीं हैं।
.png)