क्या Gen Z वाकई पानी की बर्बादी कर रही है? जानें इस दिलचस्प सर्वे के निष्कर्ष!
Gen Z और पानी की बर्बादी: एक नया सर्वे
Gen Z Water Waste Explained in Hindi
Gen Z Water Waste Explained in HindiGen Z Water Waste Explained: जलवायु परिवर्तन के प्रति सबसे अधिक चिंतित युवा पीढ़ी, अपने दैनिक जीवन में पानी बचाने के मामले में उतनी सजग नहीं है। इंग्लैंड और वेल्स में चलाए जा रहे 'लेट्स सेव वॉटर' अभियान के तहत हाल ही में किए गए एक सर्वे में यह सामने आया है कि 18 से 29 वर्ष के जेन-जी के 52 प्रतिशत सदस्य कम से कम 10 मिनट तक शॉवर लेते हैं। यह आंकड़ा अन्य आयु समूहों की तुलना में सबसे अधिक है। इस सर्वे में दो हजार से अधिक प्रतिभागियों को शामिल किया गया था। अध्ययन का उद्देश्य विभिन्न पीढ़ियों के पानी के उपयोग और बचत की आदतों को समझना था। परिणाम एक दिलचस्प विरोधाभास को उजागर करते हैं। जलवायु संकट के प्रति युवा वर्ग की चिंता अधिक है, लेकिन पानी के उपयोग में वे कई मामलों में अधिक खर्चीले साबित हो रहे हैं।
शॉवर की अवधि में जो अंतर सामने आया है, वह विशेष रूप से ध्यान देने योग्य है। सर्वे के अनुसार, 18 से 29 वर्ष के 52 प्रतिशत लोगों ने बताया कि उनका शॉवर कम से कम 10 मिनट तक चलता है। 30 से 45 वर्ष के मिलेनियल्स में यह आंकड़ा लगभग 39 प्रतिशत है। 46 से 61 वर्ष के जेन-एक्स में यह अनुपात करीब 28 प्रतिशत है, जबकि 62 से 80 वर्ष के बेबी बूमर्स में यह केवल 16 प्रतिशत है। इसका मतलब है कि उम्र बढ़ने के साथ शॉवर लेने की प्रवृत्ति कम होती जाती है। सर्वे में यह भी पाया गया कि महिलाओं में लंबे शॉवर लेने की प्रवृत्ति पुरुषों की तुलना में अधिक है। लगभग 27 प्रतिशत महिलाएं रोजाना 10 मिनट से अधिक शॉवर लेने की बात कहती हैं, जबकि पुरुषों में यह आंकड़ा 19 प्रतिशत है।
एक सामान्य शॉवर में प्रति मिनट पानी की खपत उसके उपकरण और पानी के दबाव पर निर्भर करती है। अभियान से जुड़े आंकड़ों के अनुसार, सामान्य शॉवर में लगभग 10 से 15 लीटर पानी प्रति मिनट खर्च हो सकता है। इस हिसाब से 10 मिनट का शॉवर लगभग 100 से 150 लीटर पानी बर्बाद कर सकता है। यह जरूरी नहीं है कि हर व्यक्ति हर बार इतनी ही मात्रा में पानी खर्च करे, क्योंकि कम पानी वाले शॉवर उपकरणों से खपत को काफी कम किया जा सकता है। इसलिए पानी बचाने वाले शॉवर उपकरण और कम समय तक शॉवर लेना दोनों ही महत्वपूर्ण उपाय माने जाते हैं। 'लेट्स सेव वॉटर' अभियान चार मिनट के शॉवर को व्यवहारिक लक्ष्य के रूप में सुझाता है। इस अभियान के अनुसार, चार मिनट में लगभग 50 लीटर पानी खर्च होता है, जो लंबे शॉवर की तुलना में काफी कम है।
पानी की बर्बादी का प्रभाव केवल जल भंडार तक सीमित नहीं है। घरों में पानी पहुंचाने, उसे साफ करने, पंप करने और विशेष रूप से गर्म पानी तैयार करने में ऊर्जा की खपत होती है। इसलिए पानी की मांग में कमी से ऊर्जा की खपत और उससे जुड़े उत्सर्जन में भी कमी लाई जा सकती है। यही कारण है कि जल संरक्षण अब केवल सूखे या पानी की कमी से संबंधित मुद्दा नहीं है, बल्कि इसे जलवायु परिवर्तन और ऊर्जा खपत से भी जोड़ा जा रहा है। इंग्लैंड और वेल्स में पानी की उपलब्धता पर बढ़ते दबाव के पीछे जलवायु परिवर्तन, जनसंख्या वृद्धि और पानी की बढ़ती मांग जैसे प्रमुख कारण शामिल हैं।
सर्वे का एक और महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि लोगों को अपनी वास्तविक पानी की खपत का सही अंदाजा नहीं है। 'लेट्स सेव वॉटर' अभियान के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, औसत व्यक्ति मानता है कि वह रोजाना लगभग 30 लीटर पानी का उपयोग करता है, जबकि वास्तविक खपत लगभग 140 लीटर प्रतिदिन है। इसका मतलब है कि लोग अपनी खपत को लगभग पांच गुना कम आंक रहे हैं। यह अंतर इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि जब किसी व्यक्ति को अपनी वास्तविक खपत का पता नहीं होता, तो उसके लिए यह समझना मुश्किल हो जाता है कि पानी बचाने के लिए किस आदत में बदलाव करना सबसे प्रभावी होगा। अभियान के अनुसार, इंग्लैंड में प्रति व्यक्ति रोजाना लगभग 28 लीटर पानी की बचत और वेल्स में लगभग 38 लीटर की बचत का लक्ष्य भविष्य की मांग को संभालने में मदद कर सकता है।
पानी की कमी का मुद्दा इंग्लैंड में इसलिए भी गंभीर होता जा रहा है क्योंकि देश में पानी की मांग और उपलब्धता के बीच का अंतर बढ़ने का अनुमान है। 'लेट्स सेव वॉटर' अभियान के अनुसार, यदि पानी के उपयोग की मौजूदा प्रवृत्ति जारी रहती है, तो 2055 तक इंग्लैंड में प्रतिदिन पांच अरब लीटर अतिरिक्त पानी की कमी हो सकती है। यह अभियान मई 2026 में शुरू किया गया था और इसे जल नियामक संस्था ऑफवाट और पानी की कंपनियों के समर्थन से चलाया जा रहा है। इसका उद्देश्य लोगों को यह समझाना है कि पानी एक असीमित संसाधन नहीं है और रोजमर्रा की छोटी आदतों में बदलाव से सामूहिक रूप से बड़ी बचत हो सकती है।
दिलचस्प बात यह है कि पानी की अधिक खपत केवल लंबे शॉवर तक सीमित नहीं है। इसी सर्वे में युवा पीढ़ी के कुछ अन्य व्यवहार भी सामने आए हैं। जेन-जी के लगभग 24 प्रतिशत लोगों ने बहुत कम कपड़ों के साथ वॉशिंग मशीन चलाने की बात कही। मिलेनियल्स में नहाने के लिए शॉवर की जगह टब का उपयोग करने और बर्तन डिशवॉशर में डालने से पहले उन्हें पानी से धोने की प्रवृत्ति अधिक पाई गई। दूसरी ओर, पुरानी पीढ़ी के लोग भी पानी बचाने के मामले में पूरी तरह आदर्श नहीं हैं। उदाहरण के लिए, बेबी बूमर्स में 45 प्रतिशत लोगों ने बताया कि वे पानी का तापमान सही होने तक नल खुला छोड़ देते हैं। इससे स्पष्ट है कि पानी की बर्बादी किसी एक पीढ़ी की समस्या नहीं है, बल्कि विभिन्न पीढ़ियों में इसके तरीके अलग हैं।
जलवायु परिवर्तन के प्रति जेन-जी की चिंता और पानी के उपयोग की इन आदतों के बीच का अंतर पर्यावरण विशेषज्ञों द्वारा व्यवहार और सुविधा के बीच की दूरी के रूप में देखा जाता है। किसी समस्या को लेकर चिंतित होना और उसके अनुसार रोजमर्रा की आदतें बदलना दो अलग बातें हैं। पर्यावरण के प्रति जागरूक व्यक्ति भी लंबा शॉवर ले सकता है, कम कपड़ों के साथ वॉशिंग मशीन चला सकता है या नल खुला छोड़ सकता है। यही कारण है कि केवल जागरूकता अभियान पर्याप्त नहीं होते। लोगों को ऐसे सरल उपाय भी बताने पड़ते हैं जिनमें सुविधा बहुत कम प्रभावित हो और बचत आसानी से समझ में आए। पानी बचाने के अभियान में इसी कारण चार मिनट का शॉवर, दांत साफ करते समय नल बंद करना, रिसते नल और शौचालय की मरम्मत करना तथा वॉशिंग मशीन को पूरी क्षमता के साथ चलाना जैसे उपाय सुझाए जा रहे हैं।
इंग्लैंड और वेल्स में पानी की समस्या को केवल गर्मी और सूखे से जोड़ना भी अधूरा दृष्टिकोण है। 'लेट्स सेव वॉटर' के अनुसार, बदलती जलवायु के कारण सर्दियों में बारिश का स्वरूप और गर्मियों में सूखे की अवधि दोनों प्रभावित हो रहे हैं। इससे जलाशयों, नदियों और भूजल पर दबाव बढ़ सकता है। अभियान से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि पानी की उपलब्धता को सुरक्षित रखने के लिए केवल नए जलाशय बनाना या पाइपलाइन व्यवस्था में सुधार करना पर्याप्त नहीं होगा। मांग को नियंत्रित करना भी आवश्यक है। पानी की कंपनियां रिसाव कम करने और बुनियादी ढांचे में निवेश कर रही हैं, लेकिन घरों में होने वाली खपत को कम किए बिना भविष्य की मांग को संभालना कठिन होगा।
पानी बचाने का सबसे सीधा तरीका लंबे शॉवर को छोटा करना है। 'लेट्स सेव वॉटर' के अनुसार, चार मिनट का शॉवर एक व्यावहारिक लक्ष्य है। इसके अलावा, दांत साफ करते समय नल बंद करने से भी बड़ी मात्रा में पानी बचाया जा सकता है। एक खुला नल प्रति मिनट नौ लीटर तक पानी बहा सकता है। रिसता हुआ नल साल भर में पांच हजार लीटर से अधिक पानी बर्बाद कर सकता है, जबकि रिसता हुआ शौचालय प्रतिदिन दो सौ से चार सौ लीटर तक पानी गंवा सकता है। इसलिए पानी बचाने की चर्चा केवल नहाने तक सीमित रखने के बजाय घर में पानी के उपयोग के सभी स्थानों को शामिल करना आवश्यक है।
इस सर्वे का असली संदेश जेन-जी को 'पानी बर्बाद करने वाली पीढ़ी' घोषित करना नहीं है। आंकड़े केवल यह बताते हैं कि युवा लोगों में लंबे शॉवर की प्रवृत्ति अन्य आयु वर्गों की तुलना में अधिक है। पानी की बर्बादी हर पीढ़ी में मौजूद है और उसका रूप अलग-अलग है। इसलिए जल संकट का समाधान किसी एक उम्र के लोगों को दोष देने से नहीं, बल्कि ऐसी आदतों को बदलने से निकलेगा जिनसे बिना जरूरत पानी बहता है। जलवायु परिवर्तन के दौर में पानी की हर बचत का महत्व इसलिए बढ़ गया है क्योंकि पानी बचाने का अर्थ केवल भविष्य के लिए पानी बचाना नहीं, बल्कि उसे साफ करने, पंप करने और गर्म करने में लगने वाली ऊर्जा को भी कम करना है। जेन-जी के सर्वे से सामने आया विरोधाभास इसी बड़ी चुनौती की याद दिलाता है कि पर्यावरण के प्रति चिंता को वास्तविक जीवन की आदतों में बदलना अब पहले से कहीं अधिक जरूरी है।
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