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अजीत सिंह: पर्यावरण के प्रति समर्पित 'झोला मैन ऑफ इंडिया' की प्रेरणादायक कहानी

अजीत प्रताप सिंह, जिन्हें 'झोला मैन ऑफ इंडिया' के नाम से जाना जाता है, पर्यावरण संरक्षण के प्रति अपने अनोखे प्रयासों के लिए प्रसिद्ध हैं। उनकी यात्रा 2004 में एक पारिवारिक यात्रा से शुरू हुई, जब उन्होंने उत्तराखंड में प्लास्टिक पर प्रतिबंध देखा। आज, वे अपनी सैलरी का एक हिस्सा खर्च कर हजारों कपड़े के झोले बांटते हैं और लोगों को प्लास्टिक के नुकसान के प्रति जागरूक करते हैं। जानें उनके प्रेरणादायक कार्यों के बारे में और कैसे वे समाज में बदलाव ला रहे हैं।
 

अजीत सिंह की प्रेरणादायक यात्रा

Ajit Singh Inspirational Story

Ajit Singh Inspirational Story

अजीत सिंह की प्रेरणादायक कहानी: "मैं धरती माँ का सबसे छोटा बेटा हूँ, बस इसकी थोड़ी सेवा कर लेता हूँ। अपनी आवश्यकताओं को कम करके, जो लेता हूँ उससे ज़्यादा देता हूँ।" ये शब्द उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले में कार्यरत एक साधारण लेकिन असाधारण सरकारी अधिकारी अजीत प्रताप सिंह के हैं। आज जब पर्यावरण प्रदूषण एक गंभीर समस्या बन चुका है, अजीत प्रताप सिंह अपनी मेहनत और अनोखे प्रयासों से समाज को नई दिशा दे रहे हैं। उन्हें आदरपूर्वक 'झोला मैन ऑफ इंडिया' के नाम से जाना जाता है।


एक यात्रा जिसने सब कुछ बदल दिया

अजीत प्रताप सिंह 1999 से ग्राम विकास अधिकारी (VDO) के रूप में कार्यरत हैं। उनकी इस मुहिम की शुरुआत 2004 में उत्तराखंड की एक पारिवारिक यात्रा के दौरान हुई।

वहाँ उन्होंने देखा कि लोग प्लास्टिक के बजाय कागज़ के थैले का उपयोग कर रहे थे, क्योंकि वहाँ प्लास्टिक पर प्रतिबंध था। इस अनुभव ने उन्हें सोचने पर मजबूर किया कि "क्या ऐसा पूरे भारत में नहीं हो सकता?" इसी से उन्होंने सिंगल-यूज़ प्लास्टिक के खिलाफ लड़ाई शुरू की।


अपनी सैलरी से हजारों झोले बांटते हैं

अजीत का यह अभियान किसी सरकारी फंड या दान पर निर्भर नहीं है। वे हर महीने अपनी सैलरी का लगभग 10% (लगभग 7,000 रुपये) इस नेक कार्य के लिए अलग रखते हैं।

वे कपड़ा व्यापारियों से बचे हुए कपड़े खरीदते हैं और स्थानीय दर्जियों से मजबूत थैले बनवाते हैं। हर महीने वे लगभग 2,000 कपड़े के झोले मुफ्त में बांटते हैं और अब तक 80,000 से अधिक झोले वितरित कर चुके हैं।


15 मिनट का 'पेप टॉक'

अजीत जी किसी को झोला देने से पहले उनसे 15 मिनट का समय मांगते हैं। वे प्लास्टिक के नुकसान के बारे में जागरूक करते हैं और सिंगल-यूज़ प्लास्टिक का उपयोग न करने की शपथ दिलाते हैं।

उनका गणित: "अगर एक व्यक्ति रोज़ 10 प्लास्टिक की थैलियाँ इस्तेमाल करता है, तो वह साल में हजारों थैलियाँ फेंकता है। लेकिन एक कपड़े का झोला 5 साल चलता है, जिससे 18,250 प्लास्टिक बैग्स को बचाया जा सकता है।"


पर्यावरण संरक्षण के अन्य संकल्प

अजीत का पर्यावरण प्रेम केवल झोलों तक सीमित नहीं है। वे अपनी दिनचर्या में भी पर्यावरण का ध्यान रखते हैं:

  • वे अपनी कार को पानी से नहीं धोते, केवल गीले कपड़े से साफ करते हैं।
  • वे अपनी कार में नल की टोटियाँ और औज़ार रखते हैं ताकि सार्वजनिक नलों की मरम्मत कर सकें।
  • शादी समारोहों में आयोजकों से पत्तलों का उपयोग करने की अपील करते हैं।
  • उन्होंने अपनी मृत्यु के बाद देहदान करने का संकल्प लिया है।

2014 में 'स्वच्छ भारत मिशन' की शुरुआत के बाद उनके कार्यों की प्रशंसा की गई। अजीत प्रताप सिंह जैसे लोग समाज के सच्चे 'सुपरहीरो' हैं, जो बिना किसी स्वार्थ के पृथ्वी को बचाने में लगे हैं।


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