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सेक्सटॉर्शन: अनजान वीडियो कॉल से कैसे बचें और क्या करें?

सेक्सटॉर्शन एक गंभीर साइबर अपराध है, जिसमें अनजान वीडियो कॉल के माध्यम से लोगों को ब्लैकमेल किया जाता है। इस लेख में जानें कि कैसे आप ऐसे धोखाधड़ी से बच सकते हैं और यदि आप शिकार बन गए हैं तो क्या कदम उठाने चाहिए। जानें कि अपराधी किस तरह से आपके व्यक्तिगत डेटा का उपयोग कर सकते हैं और आपको किस प्रकार की धमकियाँ दे सकते हैं। यह जानकारी आपको सुरक्षित रहने में मदद करेगी।
 

सेक्सटॉर्शन वीडियो कॉल से बचने के उपाय

Sextortion Video Call Alert India Explained | Sextortion Scam Kya Hai | Sextortion Se Kaise Bache 

Sextortion Video Call Alert India Explained | Sextortion Scam Kya Hai | Sextortion Se Kaise Bache

सेक्सटॉर्शन वीडियो कॉल से कैसे बचें: जब फोन की घंटी बजती है, तो सामने एक अनजान व्यक्ति का वीडियो कॉल आता है। यह बातचीत कभी फेसबुक या इंस्टाग्राम पर दोस्ती से शुरू होती है, कभी व्हाट्सऐप या डेटिंग ऐप पर। कुछ समय बाद, बातचीत में नजदीकी बढ़ती है और फिर निजी वीडियो कॉल का प्रस्ताव दिया जाता है। कॉल के दौरान, सामने वाला व्यक्ति अश्लील बातचीत या हरकतों की ओर ले जाने की कोशिश करता है। पीड़ित को यह नहीं पता होता कि दूसरी ओर से वीडियो रिकॉर्ड किया जा रहा है या पहले से तैयार वीडियो चलाया जा रहा है।

कॉल खत्म होने के कुछ ही मिनटों बाद, पीड़ित को उसी व्यक्ति की तस्वीर, स्क्रीनशॉट या वीडियो भेजा जाता है। इसके साथ ही परिवार, दोस्तों और सहकर्मियों की सूची के स्क्रीनशॉट भी हो सकते हैं। फिर संदेश आता है कि पैसे भेजें, नहीं तो यह वीडियो सबको भेज दिया जाएगा। इस तरह, सामान्य ऑनलाइन बातचीत एक संगठित अपराध में बदल जाती है।

भारत सरकार का राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल ऑनलाइन सेक्सटॉर्शन को एक ऐसी स्थिति बताता है जिसमें किसी व्यक्ति की निजी सामग्री को फैलाने की धमकी देकर उससे यौन सामग्री या पैसे मांगे जाते हैं। सरकारी पोर्टल यह भी चेतावनी देता है कि वीडियो कॉल को दूसरी तरफ का व्यक्ति रिकॉर्ड कर सकता है और निजी सामग्री को बाद में साझा किया जा सकता है।

लेकिन सेक्सटॉर्शन को केवल अश्लील वीडियो बनाकर ब्लैकमेल करना समझना इसकी असली ताकत को नहीं समझना है। इस अपराध का सबसे बड़ा हथियार कैमरा नहीं, बल्कि व्यक्ति की सामाजिक पहचान का डर है। अपराधी व्यक्ति को बंधक नहीं बनाता, बल्कि उसकी सामाजिक पहचान को बंधक बनाने की कोशिश करता है। यही कारण है कि दो मिनट की वीडियो कॉल किसी व्यक्ति को महीनों तक डर, आर्थिक नुकसान और मानसिक तनाव में रख सकती है।


क्या हर बार सामने वाला व्यक्ति सच में आपसे बात कर रहा है?

सेक्सटॉर्शन हर बार एक ही तरीके से नहीं होता। कई बार अपराधी नकली सोशल मीडिया खाता बनाते हैं, कभी चोरी या हैक किए गए असली खातों का उपयोग करते हैं। अंतरराष्ट्रीय जांचों में ऐसे संगठित मामलों का पता चला है, जहां अपराधियों ने खरीदे या हैक किए गए सोशल मीडिया खातों के जरिए युवतियों की पहचान बनाकर लोगों से संपर्क किया। अमेरिकी जांच एजेंसी एफबीआई ने भी ऐसे मामलों की जानकारी दी है।

इसलिए वीडियो स्क्रीन पर किसी का चेहरा दिखाई देना इस बात का प्रमाण नहीं है कि सामने वही व्यक्ति लाइव बात कर रहा है। रिकॉर्ड किए गए वीडियो, संपादन और एआई से बनाए गए नकली वीडियो ने यह खतरा और बढ़ा दिया है। अपराधी के पास पीड़ित का असली अंतरंग वीडियो होना भी जरूरी नहीं है। कई बार उसे सिर्फ इतना विश्वास पैदा करना होता है कि उसके पास ऐसी सामग्री है जिसे परिवार या परिचित असली मान सकते हैं। सेक्सटॉर्शन में अपराधी को हमेशा सच नहीं चाहिए, उसे विश्वसनीय डर चाहिए।


अपराधियों को आपके रिश्तेदारों के नाम कैसे मिलते हैं?

इसके लिए हर बार कोई बड़ा साइबर हमला या रहस्यमय हैकिंग जरूरी नहीं होती। हम खुद सोशल मीडिया पर अपनी जिंदगी का काफी हिस्सा खुला छोड़ देते हैं, जैसे पूरा नाम, तस्वीरें, शहर, नौकरी, कॉलेज, परिवार के साथ फोटो, दोस्तों के नाम, विवाह की तस्वीरें, जन्मदिन की शुभकामनाएं और कभी-कभी फोन नंबर तक। अपराधी किसी व्यक्ति की सार्वजनिक जानकारी देखकर इतना पता लगा सकता है कि धमकी को विश्वसनीय कैसे बनाया जाए।

इसीलिए ‘इंटरनेट पर डाल दूंगा’ से ज्यादा असरदार धमकी होती है - ‘आपकी पत्नी को भेज रहा हूं’, ‘आपके ऑफिस के लोगों को भेज दूंगा’ या ‘आपके परिवार की पूरी सूची मेरे पास है।’ अपराधी पूरे इंटरनेट को निशाना नहीं बनाता, बल्कि पीड़ित की अपनी सामाजिक दुनिया को उसके खिलाफ इस्तेमाल करता है। यही बात इस अपराध के आर्थिक गणित को भी समझाती है। अपराधी को हर पीड़ित पर कई दिनों तक काम करने की जरूरत नहीं होती। अगर बड़ी संख्या में लोगों से संपर्क किया जाए और उनमें से कुछ लोग डरकर पैसे दे दें तो यह धंधा अपराधियों के लिए फायदे का सौदा बन सकता है।


क्यों तुरंत पैसे मांगे जाते हैं?

क्योंकि अपराधी नहीं चाहता कि पीड़ित को सोचने का समय मिले। अचानक निजी वीडियो सामने आने और साथ में पैसे भेजने की धमकी मिलने पर व्यक्ति शांत होकर यह हिसाब नहीं लगाता कि अपराधी के पास वास्तव में क्या जानकारी है। उसका दिमाग पहले संभावित बदनामी और परिवार की प्रतिक्रिया की कल्पना करता है। अपराधी इसी घबराहट का फायदा उठाता है।

कभी वह रिश्तेदारों की सूची भेजता है, कभी कोई स्क्रीनशॉट दिखाता है और कभी उलटी गिनती शुरू कर देता है। उसका मकसद पीड़ित को इतना व्यस्त और डरा देना होता है कि वह किसी भरोसेमंद व्यक्ति से बात न कर पाए, पुलिस से संपर्क न करे और यह न सोच पाए कि अपराधी वास्तव में क्या कर सकता है। इसलिए ऐसी स्थिति में पहली जरूरत है कि अपराधी की बनाई हुई जल्दबाजी को तोड़ा जाए और घबराहट में कोई फैसला न लिया जाए।


पहली मांग छोटी क्यों होती है?

कई मामलों में पहली मांग इतनी रखी जाती है कि पीड़ित को लगे, इतने पैसे देकर मामला खत्म कर देता हूं। वह सोच सकता है कि कुछ हजार या कुछ दस हजार रुपये देकर वीडियो मिटवा देगा और जिंदगी सामान्य हो जाएगी। लेकिन भुगतान अपराधी को एक बेहद महत्वपूर्ण जानकारी भी देता है कि यह व्यक्ति डर चुका है और पैसे देने को तैयार है।

इसके बाद दूसरी मांग आ सकती है और फिर तीसरी। कभी वीडियो हटाने के नाम पर, कभी किसी दूसरे व्यक्ति को पैसे देने के नाम पर और कभी किसी कथित अधिकारी की फीस के नाम पर। रकम लगातार बढ़ सकती है। कानून लागू करने वाली एजेंसियां चेतावनी देती हैं कि पैसे देने से सामग्री के न फैलने की कोई गारंटी नहीं होती। एफबीआई के अनुसार ऐसे मामले भी सामने आए हैं जिनमें पीड़ित के पैसे देने के बाद भी सामग्री साझा की गई। इसका मतलब यह नहीं कि हर अपराधी निश्चित रूप से वीडियो सबको भेज देगा, लेकिन यह जरूर समझना चाहिए कि पैसे देने के बदले पीड़ित के पास कोई भरोसेमंद गारंटी नहीं होती। वह किसी समझौते पर हस्ताक्षर नहीं कर रहा, बल्कि ऐसे व्यक्ति को पैसा दे रहा है जिसकी कमाई ही धमकी जारी रखने पर निर्भर है।


नकली पुलिस या साइबर अधिकारी क्यों सामने आते हैं?

कुछ मामलों में सेक्सटॉर्शन के बाद ठगी की दूसरी परत शुरू हो जाती है। पहले एक व्यक्ति निजी वीडियो के नाम पर डराता है और फिर दूसरा फोन आता है। सामने वाला खुद को पुलिस, साइबर अधिकारी या किसी इंटरनेट मंच का अधिकारी बताकर नया डर पैदा कर सकता है। हर सेक्सटॉर्शन गिरोह ऐसा करे, यह जरूरी नहीं है, लेकिन भारत में अधिकारियों की पहचान का झूठा इस्तेमाल करके लोगों से पैसे वसूलने के मामले सामने आते रहे हैं।

भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र ने दूसरे साइबर ठगी के मामलों में भी चेतावनी दी है कि अपराधी पुलिस, सीबीआई, नारकोटिक्स विभाग, आरबीआई और प्रवर्तन निदेशालय जैसी संस्थाओं के अधिकारी बनकर लोगों को डराते हैं। सेक्सटॉर्शन में यह तरीका और खतरनाक हो सकता है, क्योंकि पीड़ित पहले ही शर्म और डर में होता है। कोई व्यक्ति वर्दी वाली तस्वीर लगाकर कह सकता है कि आपके खिलाफ अश्लीलता की शिकायत आई है और मामला खत्म करने के लिए पैसे देने होंगे। डरा हुआ व्यक्ति असली पुलिस से संपर्क करने के बजाय इसी नकली अधिकारी को पैसा देने लग सकता है। इसलिए किसी भी अधिकारी की पहचान स्वतंत्र तरीके से जांचना जरूरी है। सिर्फ प्रोफाइल फोटो, वीडियो कॉल या फोन पर कही गई बात को सबूत नहीं माना जा सकता।


लोग पुलिस के पास क्यों नहीं जाते?

यहीं सेक्सटॉर्शन दूसरे साइबर अपराधों से अलग हो जाता है। अगर किसी के बैंक खाते से एक लाख रुपये चोरी हो जाएं तो वह आसानी से परिवार से कह सकता है कि उसके साथ धोखाधड़ी हुई है। लेकिन सेक्सटॉर्शन में पीड़ित को लगता है कि शिकायत करते समय उसे पहले यह बताना पड़ेगा कि वीडियो बना कैसे। यही अपराधी की सबसे बड़ी ताकत है, शर्म।

पीड़ित सोचता है कि पुलिस क्या सोचेगी, पत्नी या पति क्या सोचेंगे, माता-पिता को पता चला तो क्या होगा, बच्चों को पता चला तो क्या होगा या ऑफिस में बात फैल गई तो उसकी इज्जत का क्या होगा। यही डर उसे चुप करा देता है। सेक्सटॉर्शन पर किए गए एक अध्ययन में जिन लोगों ने घटना किसी को नहीं बताई, उनमें 84 प्रतिशत ने परिवार या दोस्तों को न बताने की वजह शर्म या संकोच बताई। 64 प्रतिशत ने कहा कि यही भावना पुलिस तक जाने में भी बाधा बनी और 52 प्रतिशत ने इसे इंटरनेट मंच पर शिकायत न करने की वजह बताया। यह अध्ययन एक खास समूह पर आधारित था, इसलिए इसके आंकड़ों को भारत की पूरी आबादी पर सीधे लागू नहीं किया जा सकता, लेकिन यह साफ दिखाता है कि सेक्सटॉर्शन में चुप्पी अपराधी के लिए कितनी उपयोगी होती है। एफबीआई भी पीड़ितों में डर, शर्म, अकेलेपन और निराशा को शिकायत न करने के महत्वपूर्ण कारणों में गिनती है।


सबसे बड़ी मानसिक भूल, ‘गलती मेरी थी’

पीड़ित अक्सर खुद को ही कटघरे में खड़ा कर लेता है। वह सोचता है, ‘मैंने कॉल क्यों उठाई?’, ‘मैंने कैमरा क्यों खोला?’ या ‘मैंने उससे बात क्यों की?’ ऐसे सवाल स्वाभाविक हैं, लेकिन दो बातें अलग-अलग हैं। किसी व्यक्ति का निजी ऑनलाइन व्यवहार एक बात है और उस सामग्री का इस्तेमाल करके उससे पैसे वसूलने या उसे धमकाने की कोशिश दूसरी बात है।

राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल ऑनलाइन सेक्सटॉर्शन को साइबर अपराध की श्रेणी में रखता है। इसलिए पीड़ित को खुद को अपराधी समझने के बजाय यह समझना जरूरी है कि अपराध वह व्यक्ति कर रहा है जो डराकर वसूली कर रहा है। अगर पीड़ित खुद को ही दोषी मानता रहेगा तो अपराधी को वही चीज मिल जाएगी जिसकी उसे सबसे ज्यादा जरूरत है, चुप्पी।


अपराधी वीडियो फैलाना चाहता है या सिर्फ पैसे?

आर्थिक सेक्सटॉर्शन में आम तौर पर मुख्य लक्ष्य पैसा होता है और वीडियो दबाव बनाने का साधन होता है। अगर अपराधी तुरंत वीडियो सबको भेज दे तो कई मामलों में उसकी सौदेबाजी की ताकत कम हो सकती है, क्योंकि जिस चीज का डर दिखाकर पैसा मांगा जा रहा था, वह हो चुकी। इसलिए धमकी खुद उसके लिए बहुत मूल्यवान होती है।

लेकिन इसका यह मतलब बिल्कुल नहीं कि अपराधी कभी वीडियो भेजते नहीं। कुछ मामलों में पैसे देने के बाद भी सामग्री साझा की गई है। इसलिए पीड़ित को न तो अपराधी की हर धमकी को निश्चित भविष्य मानना चाहिए और न यह मान लेना चाहिए कि वह केवल झूठ बोल रहा है। सही रास्ता है कि सबूत सुरक्षित किए जाएं, घबराकर भुगतान न किया जाए और कानून लागू करने वाली एजेंसियों तथा संबंधित इंटरनेट मंच को सूचना दी जाए।


अगर ऐसी कॉल हो चुकी है तो सबसे पहले क्या करें?

सबसे जरूरी बात है कि घबराकर लगातार सौदेबाजी न करें और सबूत न मिटाएं। डर के कारण पूरी बातचीत, प्रोफाइल या भुगतान की जानकारी मिटा देना स्वाभाविक लग सकता है, लेकिन यही चीजें आगे की जांच में काम आ सकती हैं। धमकी वाले संदेशों के स्क्रीनशॉट, फोन नंबर, उपयोगकर्ता नाम, प्रोफाइल का लिंक, कॉल की जानकारी, वीडियो या तस्वीरें जहां सुरक्षित और कानूनी रूप से संभव हो, भुगतान से जुड़े विवरण, यूपीआई या बैंक खाते की जानकारी और लेनदेन संख्या सुरक्षित रखें। एफबीआई भी पीड़ितों को संदेश और प्रोफाइल जैसी जानकारी सुरक्षित रखने की सलाह देती है, क्योंकि इससे अपराधी की पहचान और जांच में मदद मिल सकती है।


अगर पैसा भेज दिया है

भारत में वित्तीय साइबर धोखाधड़ी की सूचना 1930 पर तुरंत दें और राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल पर शिकायत दर्ज करें। यहां समय बहुत महत्वपूर्ण है। डिजिटल भुगतान के बाद पैसा दूसरे खातों में आगे भेजा जा सकता है। जितनी जल्दी सूचना दी जाए, उतनी जल्दी संबंधित व्यवस्था को लेनदेन का पता लगाने और उपलब्ध स्थिति में रकम रोकने की कोशिश का मौका मिलता है। लेकिन 1930 पर शिकायत करने का मतलब पैसे की वापसी की गारंटी नहीं है। अगर तत्काल शारीरिक खतरा या कोई दूसरी आपात स्थिति हो तो 112 पर संपर्क किया जा सकता है।


अगर वीडियो वास्तव में भेज दिया गया हो तो?

इसका मतलब यह नहीं कि सब खत्म हो गया। अपराधी चाहता है कि इस स्थिति में पीड़ित पूरी तरह टूट जाए, लेकिन सामग्री के प्रसार को रोकने या सीमित करने के लिए संबंधित सोशल मीडिया मंच की शिकायत व्यवस्था का इस्तेमाल किया जा सकता है। अपराधी के खाते की शिकायत की जा सकती है और पुलिस या साइबर सेल को यह बताया जा सकता है कि सामग्री कहां भेजी गई या अपलोड की गई है। किसी खाते को बंद या ब्लॉक करने से पहले जरूरी सबूत सुरक्षित कर लेना बेहतर है।

अगर वीडियो नकली या कृत्रिम बुद्धिमत्ता से बनाया गया है तब भी धमकी को हल्का नहीं समझना चाहिए। यह सोचकर चुप न रहें कि वीडियो असली नहीं है, इसलिए पुलिस क्या करेगी। ब्लैकमेल की ताकत सिर्फ वीडियो के असली होने में नहीं होती, उसकी ताकत धमकी और वसूली की कोशिश में होती है।


अगर पीड़ित नाबालिग हो तो मामला और गंभीर है

वित्तीय सेक्सटॉर्शन में किशोरों को भी निशाना बनाया गया है। एफबीआई ने ऐसे मामलों को लेकर गंभीर चेतावनी दी है और इनके मानसिक प्रभाव के बेहद खतरनाक होने की बात कही है। ऐसी स्थिति में माता-पिता की पहली प्रतिक्रिया डांटने, फोन छीनने या यह पूछने की नहीं होनी चाहिए कि ‘तुमने ऐसा किया ही क्यों?’ पहले बच्चे की सुरक्षा सुनिश्चित करें, फिर सबूत सुरक्षित करें और संबंधित एजेंसियों को सूचना दें। जितना ज्यादा डर और शर्म बढ़ेगा, अपराधी की पकड़ उतनी ही मजबूत होगी।


सेक्सटॉर्शन में असली हमला इंसान के मन पर होता है

इस पूरे अपराध को समझने का सबसे आसान तरीका यही है कि तकनीक अक्सर सिर्फ रास्ता होती है और असली हमला मन पर किया जाता है। पहले आकर्षण और भरोसा पैदा किया जाता है, फिर निजी बातचीत या वीडियो का इस्तेमाल होता है। इसके बाद परिवार और बदनामी का डर दिखाया जाता है, तुरंत पैसे भेजने का दबाव बनाया जाता है और आखिर में कहा जाता है कि किसी को मत बताना।

यही आखिरी बात अपराधी का सबसे बड़ा हथियार है। जिस क्षण पीड़ित किसी भरोसेमंद व्यक्ति को बताता है, सबूत सुरक्षित करता है और आधिकारिक शिकायत करता है, अपराधी की मनोवैज्ञानिक पकड़ कमजोर होने लगती है। इसलिए सेक्सटॉर्शन के खिलाफ संदेश सिर्फ इतना नहीं होना चाहिए कि अनजान वीडियो कॉल मत उठाइए। सावधानी जरूरी है, लेकिन इंटरनेट इस्तेमाल करने वाला कोई भी व्यक्ति धोखे का शिकार हो सकता है।

सबसे जरूरी बात यह है कि अगर किसी का निजी वीडियो अपराधी के हाथ लग भी गया है तो उसकी प्रतिष्ठा का फैसला अपराधी नहीं करता। पीड़ित को खुद को दोषी मानकर चुप नहीं होना चाहिए। क्योंकि इस पूरे धंधे का आधार एक ही अनुमान पर टिका है कि पीड़ित पैसे खोना तो स्वीकार कर लेगा, लेकिन किसी को बताएगा नहीं।

जिस दिन पीड़ित को परिवार, दोस्तों और पुलिस से मदद मांगने में उतनी शर्म नहीं होगी जितनी अपराधी चाहता है, उस दिन सेक्सटॉर्शन गिरोहों का सबसे बड़ा हथियार, चुप्पी, उनके हाथ से निकल जाएगा।


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