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बाबा रामदेवजी की जयंती: जानिए क्यों हैं वे ‘पीरों के पीर’?

बाबा रामदेवजी की जयंती 13 सितंबर 2026 को मनाई जाएगी, जो हिंदू और मुस्लिम समुदायों के बीच साझा आस्था का प्रतीक है। राजस्थान के रामदेवरा धाम में लाखों श्रद्धालु हर साल बाबा की समाधि के दर्शन के लिए आते हैं। बाबा रामदेवजी का जन्म, उनके चमत्कार, और सामाजिक समानता का संदेश उनकी महानता को दर्शाता है। जानें इस विशेष अवसर पर रामदेवरा मेले की खासियतें और श्रद्धालुओं की भक्ति का माहौल।
 

बाबा रामदेवजी की जयंती का महत्व

Ramdev Jayanti 2026: Why Baba Ramdevji Is Called ‘Peeron Ke Peer’

Ramdev Jayanti 2026: Why Baba Ramdevji Is Called ‘Peeron Ke Peer’


रामदेव जयंती 2026: भारत की संस्कृति में सर्वधर्म समभाव की गहरी जड़ें हैं। यही कारण है कि यहां अनेक कहानियां और उदाहरण मिलते हैं, जहां आस्था का दायरा धर्म से परे मानवता और भाईचारे तक फैला हुआ है। राजस्थान के रामदेवरा धाम की कथा भी इसी तरह की एक मिसाल है। यहां हिंदू बाबा रामदेवजी को भगवान श्रीकृष्ण का अवतार मानते हैं, जबकि मुस्लिम समुदाय उन्हें रामसा पीर या रामापीर के नाम से पूजता है। मक्का से आए पांच पीरों की कथा आज भी उनकी आध्यात्मिक शक्ति और सर्वधर्म समभाव का प्रतीक है। हर वर्ष रामदेव जयंती और रामदेवरा मेले के दौरान लाखों श्रद्धालु बाबा की समाधि के दर्शन के लिए आते हैं। रामदेवरा केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि हिंदू-मुस्लिम एकता और सामाजिक समरसता का एक महत्वपूर्ण केंद्र है। इस वर्ष बाबा रामदेवजी की जयंती 13 सितंबर 2026 को मनाई जाएगी। जयंती के अवसर पर रामदेवरा में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ रही है और भादवा मेले का माहौल भक्तिमय हो गया है।


बाबा रामदेवजी का जन्म और उनके चमत्कार

राजस्थान में हुआ था जन्म

लोककथाओं के अनुसार, बाबा रामदेवजी का जन्म विक्रम संवत 1409 में भाद्रपद शुक्ल द्वितीया को राजस्थान के बाड़मेर जिले के उंडू-काश्मीर गांव में हुआ था। उनके पिता राजा अजमलजी तंवर, जो तोमर वंश के राजपूत थे, और माता का नाम मैणादे था। बाबा के जन्म को लेकर कई धार्मिक कथाएं प्रचलित हैं। सबसे प्रसिद्ध मान्यता यह है कि राजा अजमलजी ने संतान प्राप्ति के लिए भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति की थी, जिसके फलस्वरूप द्वारकाधीश ने उन्हें पुत्र का वरदान दिया। इसी कारण हिंदू समाज में बाबा रामदेवजी को भगवान श्रीकृष्ण का अवतार माना जाता है।

बचपन से जुड़े चमत्कार

बाबा रामदेवजी का जीवन चमत्कारों और लोककल्याण की कहानियों से भरा हुआ है। मान्यता है कि उन्होंने बचपन में पोकरण क्षेत्र को भैरव नामक राक्षस के आतंक से मुक्त किया था। उस समय लोग भैरव के डर से अपने घरों से बाहर नहीं निकलते थे। बाबा ने उन्हें इस भय से मुक्त किया और उनके मन में सुरक्षा का विश्वास जगाया। बाबा के जीवन से जुड़े चमत्कारों को राजस्थान की लोकभाषा में ‘पर्चा’ कहा जाता है। उनके 24 प्रमुख पर्चों का उल्लेख लोकमान्यता में मिलता है। उनकी शिक्षाओं में मानव सेवा, धर्म, समानता और जरूरतमंदों की मदद को विशेष महत्व दिया गया है।


समानता का संदेश और रामसा पीर की कथा

जाति-पांत से ऊपर उठकर दिया समानता का संदेश

14वीं शताब्दी में समाज जाति और ऊंच-नीच जैसी कुरीतियों से जूझ रहा था। ऐसे समय में बाबा रामदेवजी ने सभी वर्गों को साथ लेकर चलने का संदेश दिया। उनकी सबसे चर्चित मान्यता में डाली बाई का प्रसंग शामिल है, जो मेघवाल समाज से जुड़ी उनकी शिष्या और बहन मानी जाती हैं। बाबा ने उन्हें अपने करीब स्थान देकर उस समय के सामाजिक भेदभाव के खिलाफ एक मजबूत संदेश दिया। इस कारण समय के साथ बाबा रामदेवजी की आस्था किसी एक जाति या समुदाय तक सीमित नहीं रही।

मक्का से आए पांच पीरों की कथा

बाबा रामदेवजी से जुड़ी एक प्रसिद्ध लोककथा में मक्का से आए पांच पीरों की कहानी है। मान्यता है कि बाबा की आध्यात्मिक शक्ति की परीक्षा लेने के लिए ये पीर उनके पास आए थे। बाबा ने उनका सम्मान करते हुए भोजन के लिए आमंत्रित किया। जब पीरों ने कहा कि उनके बर्तन मक्का में हैं, तो बाबा ने उन्हें वहीं से बुला लिया। इस घटना से प्रभावित होकर पीरों ने माना कि बाबा ‘पीरों के पीर’ हैं।


रामदेवजी की जयंती और मेले का महत्व

हिंदू और मुस्लिम श्रद्धालुओं की साझा आस्था

बाबा रामदेवजी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उनकी आस्था किसी एक धर्म तक सीमित नहीं है। हिंदू श्रद्धालु उन्हें रामदेवजी या भगवान श्रीकृष्ण का अवतार मानते हैं, जबकि मुस्लिम समुदाय उन्हें रामापीर और रामसा पीर के नाम से श्रद्धा देता है। रामदेवरा में यह साझा आस्था आज भी स्पष्ट दिखाई देती है। बाबा की समाधि पर विभिन्न समुदायों के लोग एक साथ पहुंचते हैं और अपनी-अपनी परंपरा के अनुसार श्रद्धा व्यक्त करते हैं।

33 साल की उम्र में ली थी जीवित समाधि

बाबा रामदेवजी ने लगभग 33 वर्ष की आयु में भाद्रपद शुक्ल पक्ष की एकादशी के दिन जीवित समाधि ली थी। उनकी समाधि रामसरोवर के पास मानी जाती है। बाबा की शिष्या डाली बाई की समाधि भी उनके पास स्थित है।


रामदेवरा मेला: श्रद्धालुओं का सैलाब

रामदेवरा मेले की विशेषताएं

बाबा रामदेवजी की जयंती और रामदेवरा मेला राजस्थान की सबसे बड़ी लोक आस्था यात्राओं में से एक है। भाद्रपद शुक्ल द्वितीया से एकादशी तक रामदेवरा धाम में मेले का आयोजन होता है। यहां श्रद्धालुओं की बड़ी संख्या होती है, जो कई किलोमीटर की पदयात्रा करके आते हैं। श्रद्धालु हाथों में पंचरंगी ध्वज लेकर धाम की ओर बढ़ते हैं।

पदयात्रा और भक्ति का माहौल

रामदेवरा की यात्रा में पंचरंगी ध्वज का विशेष महत्व है। श्रद्धालु इसे लेकर बाबा के धाम तक पहुंचते हैं और अपनी मनोकामना पूरी होने पर ध्वज अर्पित करते हैं। मेले के दौरान भजन-कीर्तन और ‘जय बाबे री’ के जयकारे गूंजते हैं।


रामदेवरा में भक्ति का माहौल

भजन और जागरण का आयोजन

मेले के दौरान रामदेवरा धाम में दिन और रात भक्तिमय रहती है। श्रद्धालु समूह बनाकर बाबा रामदेवजी के भजन गाते हैं और देर रात तक उनकी महिमा का गुणगान करते हैं। बाबा को घोड़े पर सवार लोकदेवता के रूप में पूजा जाता है।

राजा गंगासिंह का योगदान

रामदेवरा में बाबा रामदेवजी की समाधि के स्थान पर आज उनका प्रसिद्ध मंदिर स्थित है। राजस्थान के सरकारी दस्तावेजों के अनुसार, वर्तमान मंदिर का निर्माण बीकानेर के महाराजा गंगासिंह ने कराया था।


रामसरोवर का धार्मिक महत्व

रामसरोवर का पवित्र जल

रामदेवरा धाम में रामसरोवर का विशेष धार्मिक महत्व है। लोकमान्यता के अनुसार, इसका जल श्रद्धालुओं के लिए पवित्र माना जाता है। मेले के दौरान बड़ी संख्या में भक्त रामसरोवर पहुंचते हैं।

साझा आस्था का प्रतीक

रामदेवरा की कहानी चमत्कारों और लोककथाओं के साथ-साथ सामाजिक समानता और भाईचारे से भी जुड़ी है। उनकी जयंती पर श्रद्धालुओं का रामदेवरा पहुंचना इस बात का प्रमाण है कि लोकआस्था समय के साथ और मजबूत हुई है।


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