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क्या हैं बांधवगढ़ में हाथियों की मौत के पीछे के असली कारण? जानें इस नए खतरे के बारे में!

बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व में हाथियों की सामूहिक मौत ने एक नए खतरे को उजागर किया है। फफूंद से उत्पन्न होने वाले जहरीले रासायनिक यौगिक, जिन्हें माइकोटॉक्सिन कहा जाता है, भूखे हाथियों के लिए जानलेवा साबित हो सकते हैं। वैज्ञानिकों के एक अध्ययन में इस खतरे का गंभीर उदाहरण पेश किया गया है, जिसमें बताया गया है कि कैसे फफूंद से संक्रमित फसलें हाथियों की मौत का कारण बन सकती हैं। जानें इस मुद्दे के पीछे के कारण और संभावित समाधान।
 

बांधवगढ़ में हाथियों की मौत का नया खतरा

Bandhavgarh Elephant Deaths

Bandhavgarh Elephant Deaths

देहरादून। देश के जंगली हाथियों के लिए एक नया खतरा उभर रहा है, जो अब तक वन्यजीव संरक्षण की चुनौतियों में शामिल नहीं था। जंगलों के किनारे उगाई जाने वाली फसलों में फफूंद के कारण उत्पन्न होने वाले जहरीले रासायनिक यौगिक, जिन्हें 'माइकोटॉक्सिन' कहा जाता है, भूखे हाथियों के लिए जानलेवा साबित हो सकते हैं। भारतीय वन्यजीव संस्थान, पर्यावरण मंत्रालय और प्रोजेक्ट एलीफेंट से जुड़े वैज्ञानिकों के एक अध्ययन में बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व में अक्टूबर 2024 में एक ही झुंड के 10 हाथियों की मौत को इस खतरे का गंभीर उदाहरण बताया गया है। अध्ययन में फफूंद से संक्रमित कोदो की फसल और उससे बने साइक्लोपियाजोनिक एसिड (CPA) को सामूहिक मौत का मुख्य कारण बताया गया है।


बांधवगढ़ में हाथियों की सामूहिक मौत

यह घटना 29 से 31 अक्टूबर 2024 के बीच मध्य प्रदेश के बांधवगढ़ टाइगर रिजर्व में हुई थी। 13 हाथियों का एक झुंड खेतों में गया, जहां 29 अक्टूबर को चार हाथी मृत पाए गए और छह अन्य बीमार थे। उपचार के बावजूद, 30 और 31 अक्टूबर को चार और दो हाथियों की मौत हो गई। मरने वाले हाथियों में नौ मादा और एक नर था। केंद्र सरकार ने वन्यजीव अपराध नियंत्रण ब्यूरो को जांच का आदेश दिया।


जांच में सामने आए तथ्य

शुरुआत में यह संदेह था कि हाथियों को जानबूझकर जहर दिया गया था, लेकिन पोस्टमार्टम और विषविज्ञान जांच ने स्थिति को स्पष्ट किया। सभी हाथियों के पेट में अधपचा कोदो पाया गया। भारतीय पशुचिकित्सा अनुसंधान संस्थान की जांच में सामान्य कीटनाशकों और भारी धातुओं का कोई प्रमाण नहीं मिला, लेकिन CPA की उपस्थिति ने फफूंद संक्रमित कोदो की ओर ध्यान केंद्रित किया।


वैज्ञानिक अध्ययन की पुष्टि

2026 में प्रकाशित अध्ययन ने इस घटना की वैज्ञानिक कड़ी को मजबूत किया। 'Journal of Wildlife Science' में प्रकाशित अध्ययन में पोस्टमार्टम, ऊतक परीक्षण और फसल के नमूनों का विश्लेषण किया गया। हाथियों में फेफड़ों में सूजन, यकृत ऊतकों का क्षय और आंतरिक रक्तस्राव पाया गया। अध्ययन में CPA की मात्रा हाथियों के पेट में 1,23,165 भाग प्रति अरब तक दर्ज की गई।


फफूंद का खतरा

यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि कोदो अपने आप में हाथियों के लिए जहरीला नहीं है। समस्या तब उत्पन्न होती है जब फफूंद विकसित होती है। इसलिए, 'कोदो खाने से हाथियों की मौत' कहना अधूरी व्याख्या होगी। असली खतरा फफूंद से संक्रमित कोदो है, जो हाथियों के लिए जानलेवा हो सकता है।


जलवायु परिवर्तन का प्रभाव

फफूंद और माइकोटॉक्सिन बनने की प्रक्रिया मौसम से जुड़ी होती है। लंबे समय तक नमी और बारिश फफूंद के विकास के लिए अनुकूल होती है। वैज्ञानिकों ने इस खतरे को जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना है।


मानव-हाथी संघर्ष

हाथियों का प्राकृतिक आवास जब छोटे हिस्सों में बंटता है, तो उन्हें भोजन के लिए कृषि भूमि में जाना पड़ता है। बांधवगढ़ में हाथियों की स्थायी उपस्थिति हाल ही में शुरू हुई है, जिससे मानव-हाथी संघर्ष बढ़ा है।


खेतों का आकर्षण

कृषि फसलें हाथियों के लिए एक आकर्षक भोजन स्रोत बन जाती हैं। एक बार जब हाथियों को खेतों का रास्ता पता चल जाता है, तो वे बार-बार वहां लौट सकते हैं।


समाधान की आवश्यकता

हाथियों की निगरानी के साथ-साथ फसलों की निगरानी भी आवश्यक है। किसानों को फफूंद संक्रमित फसल के नष्ट करने के लिए प्रोत्साहित करना होगा।


भारत में हाथियों की संख्या

हालांकि, भारत में हाथियों की संख्या 23,000 बताई जाती है, लेकिन नवीनतम आंकड़े 22,446 हाथियों का अनुमान लगाते हैं।


खतरे की नई सूची

फफूंद से उत्पन्न माइकोटॉक्सिन अब हाथियों की अप्राकृतिक मौतों के नए कारणों में शामिल हो गया है। यह वन्यजीव प्रबंधन के लिए एक चेतावनी बन गया है।


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