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क्या आपके बच्चे में दिख रहे हैं ये संकेत? जानें आत्महत्या रोकथाम दिवस पर महत्वपूर्ण बातें

विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस पर, यह जानना आवश्यक है कि बच्चों में मानसिक स्वास्थ्य संकट के संकेत क्या होते हैं। यदि आपका बच्चा अचानक चुप रहने लगे या दोस्तों से दूरी बना ले, तो इसे नजरअंदाज न करें। मनोचिकित्सकों का कहना है कि बच्चों की समस्याएं हमेशा स्पष्ट नहीं होतीं। इस लेख में, हम आत्महत्या रोकथाम के लिए आवश्यक संवाद और परिवार की भूमिका पर चर्चा करेंगे। जानें कि कैसे आप अपने बच्चे की मानसिक स्थिति को समझ सकते हैं और उन्हें सही मदद प्रदान कर सकते हैं।
 

बच्चों में मानसिक स्वास्थ्य के संकेत

World Suicide Prevention Day 2026

World Suicide Prevention Day 2026

लखनऊ। यदि आपका बच्चा अचानक चुप रहने लगे, दोस्तों और परिवार से दूरी बना ले, जिन गतिविधियों में पहले रुचि थी, उनसे हट जाए, नींद और खाने की आदतों में बदलाव आए, पढ़ाई में गिरावट दिखाए या बार-बार निराशा की बातें करे, तो इसे केवल उम्र का बदलाव या अनुशासनहीनता समझकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। ये संकेत किसी मानसिक या भावनात्मक संकट का संकेत हो सकते हैं। विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस पर मनोचिकित्सकों की चेतावनी है कि बच्चों और किशोरों की समस्याएं हमेशा शब्दों में नहीं आतीं। कई बच्चे अपनी समस्याओं को बताने के बजाय खुद में सिमट जाते हैं।


विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस का महत्व

हर साल 10 सितंबर को विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस मनाया जाता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन और इंटरनेशनल एसोसिएशन फॉर सुसाइड प्रिवेंशन के अनुसार, 2024 से 2026 तक इसका वैश्विक विषय ‘Changing the Narrative on Suicide’ है, जिसका उद्देश्य आत्महत्या के प्रति समाज की सोच और संवाद को बदलना है। 2026 इस तीन वर्षीय अभियान का अंतिम वर्ष है, जिसका विशेष आह्वान ‘Start the Conversation’ है। इसका लक्ष्य आत्महत्या से जुड़े कलंक और गलत धारणाओं को कम करना है, ताकि संकट में फंसे व्यक्ति को अपनी समस्याएं साझा करने में संकोच न हो।


लखनऊ में आत्महत्या के आंकड़े

लखनऊ के आंकड़े मानसिक स्वास्थ्य और आत्महत्या रोकथाम की आवश्यकता को दर्शाते हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार, 2023 में आत्महत्या से 218 मौतें हुईं, जो 2024 में बढ़कर 389 हो गईं। यह एक वर्ष में लगभग 78 प्रतिशत की वृद्धि है। हालांकि, यह आंकड़ा बच्चों या किशोरों का नहीं है। यह कहना भी गलत होगा कि लखनऊ में आत्महत्या से मरने वालों में सबसे बड़ा वर्ग 15 से 29 वर्ष का था, जब तक कि आयु-वार आधिकारिक विवरण उपलब्ध न हो।


आत्महत्या के कारणों की जटिलता

बच्चों और किशोरों के संदर्भ में यह समझना महत्वपूर्ण है कि आत्महत्या अक्सर किसी एक घटना का परिणाम नहीं होती। परीक्षा में अपेक्षित अंक न आना, पढ़ाई का दबाव, साथियों द्वारा प्रताड़ना, पारिवारिक संघर्ष, ऑनलाइन समय बिताना, साइबर उत्पीड़न, आर्थिक समस्याएं, या पहले से मौजूद मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं—इनमें से कोई भी या कई कारण मिलकर किसी बच्चे के मानसिक संकट को बढ़ा सकते हैं।


परिवार की भूमिका

बलरामपुर अस्पताल के मनोचिकित्सक डॉ. सौरभ अहलावत के अनुसार, बच्चों के व्यवहार में अचानक बदलाव पर परिवार को ध्यान देना चाहिए। यदि बच्चा चुप रहने लगे, पहले पसंदीदा गतिविधियों में रुचि खो दे, या नींद और भूख में बदलाव आए, तो उससे बिना आरोप लगाए बातचीत करनी चाहिए। इसका मतलब यह नहीं कि हर बच्चा आत्महत्या के खतरे में है, लेकिन यह संकेत हो सकता है कि उसे मदद की आवश्यकता है।


मनोवैज्ञानिक सहायता की आवश्यकता

केजीएमयू के मनोचिकित्सक डॉ. अमित सिंह के अनुसार, अवसाद और अन्य मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं के साथ शारीरिक बीमारियां भी मानसिक संकट को बढ़ा सकती हैं। यदि बच्चा कहता है कि वह जीना नहीं चाहता या खुद को नुकसान पहुंचाने की बात करता है, तो इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए। ऐसे में बच्चे को अकेला न छोड़ना और तुरंत पेशेवर सहायता लेना आवश्यक है।


बच्चों में मानसिक संकट की पहचान

बच्चों में मानसिक संकट पहचानने की जिम्मेदारी केवल माता-पिता की नहीं है। शिक्षक, विद्यालय परामर्शदाता और मित्र भी कई बार वे बदलाव देख सकते हैं जिन्हें परिवार नहीं देख पाता। यदि बच्चा अचानक स्कूल जाने से डरने लगे, अंक गिरने लगे, या दोस्तों से कटने लगे, तो परिवार और विद्यालय के बीच संवाद होना चाहिए।


डिजिटल सुरक्षा और भावनात्मक भरोसा

ऑनलाइन जीवन के मामले में समाधान केवल मोबाइल छीन लेना नहीं है। अभिभावकों को यह जानना चाहिए कि बच्चा किन खेलों और मंचों का उपयोग कर रहा है। बच्चों के लिए भुगतान सीमा, पासवर्ड और अभिभावकीय नियंत्रण जैसी सुरक्षा व्यवस्था उपयोगी हो सकती है। लेकिन निगरानी इतनी आक्रामक नहीं होनी चाहिए कि बच्चा परिवार से बात करना बंद कर दे।


आत्महत्या रोकथाम के लिए संवाद

विश्व आत्महत्या रोकथाम दिवस 2026 का ‘बातचीत शुरू करें’ संदेश इसी बिंदु पर सबसे प्रासंगिक हो जाता है। किसी बच्चे से यह पूछना कि वह कैसा महसूस कर रहा है, उसकी परेशानी को सुनना और जरूरत पड़ने पर पेशेवर सहायता तक पहुंचाना महत्वपूर्ण है। मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं को कमजोरी या अनुशासनहीनता मानना सहायता लेने में सबसे बड़ी बाधा हो सकती है।


आपातकालीन सहायता

यदि कोई बच्चा या युवा खुद को नुकसान पहुंचाने की बात कर रहा हो, तो उसे अकेला न छोड़ें और बात को गोपनीय रखने का वादा न करें। किसी जिम्मेदार वयस्क और मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ की सहायता लें। भारत सरकार की 24 घंटे उपलब्ध टेली-मानस मानसिक स्वास्थ्य सेवा 14416 या 1800-89-14416 पर संपर्क किया जा सकता है।


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