इंडेंचर्ड लेबर: भारतीय इतिहास की एक अनकही दास्तान
भारतीय इतिहास की एक काली छाया
Indentured Labour | Indian History भारतीय इतिहास | ब्रिटिश साम्राज्य | नई गुलामी | Newstrack Hindi
Indentured Labour | Indian History भारतीय इतिहास | ब्रिटिश साम्राज्य | नई गुलामी | Newstrack Hindiभारतीय इतिहास: 1834 का वर्ष। कलकत्ता के घाट पर कुछ गरीब भारतीय एक जहाज़ पर चढ़ते हैं। उनके हाथ में एक ऐसा काग़ज़ है जिसे वे पढ़ नहीं सकते, और उस पर उनके अँगूठे का निशान है। उन्हें बताया गया है कि पाँच साल की मेहनत के बाद वे पैसे लेकर वापस लौटेंगे। इनमें से कई कभी लौटे ही नहीं। इस काग़ज़ को अंग्रेज़ी में 'एग्रीमेंट' कहा गया, जबकि मज़दूरों की ज़बान में यह 'गिरमिट' बन गया, और वे खुद गिरमिटिया कहलाने लगे। यही है इंडेंचर्ड लेबर की कहानी: एक ऐसी प्रथा जिसे कानून ने 'क़रार' कहा, लेकिन आलोचकों ने इसे नई गुलामी करार दिया।
इंडेंचर्ड लेबर की परिभाषा
इंडेंचर्ड लेबर (indentured labor) एक ऐसी व्यवस्था है जिसमें कोई व्यक्ति निश्चित वर्षों के लिए एक नियोक्ता के लिए काम करने का लिखित अनुबंध करता है। इसके बदले में उसे यात्रा का खर्च, भोजन, आवास और मामूली वेतन मिलता है। 'इंडेंचर' शब्द पुराने अनुबंधों से आया है, जो एक ही काग़ज़ पर लिखे जाते थे और दोनों पक्षों के हिस्से को मिलाने के लिए काटे जाते थे। यह समझौता सैद्धांतिक रूप से स्वैच्छिक था, लेकिन वास्तव में मज़दूरों को अक्सर धोखे से बहलाया जाता था।
इस प्रथा की शुरुआत
यह प्रणाली भारतीयों से पहले की है। 17वीं सदी में यूरोप के गरीब लोग, जो अमेरिका जाने का किराया नहीं चुका सकते थे, चार से सात साल की मेहनत के बदले अपना जहाज़-खर्च बंधक रखकर अमेरिका के उपनिवेशों में पहुँचते थे। जब वहाँ अफ़्रीकी दासों से सस्ते श्रम मिलने लगे, तब यूरोपीय इंडेंचर की संख्या घटने लगी।
भारत में इंडेंचर्ड लेबर का आगाज़
ब्रिटिश साम्राज्य में दासता के ख़ात्मे के बाद, 1834 में दासता-उन्मूलन कानून लागू हुआ। इसके बाद बाग़ान मालिकों ने सस्ते मज़दूरों की कमी महसूस की। मॉरीशस के बाग़ान-मालिकों ने इसी समय 39 अनुबंधित भारतीयों को लाने की व्यवस्था की, जिससे भारतीय इंडेंचर का सिलसिला शुरू हुआ। भारत में अकाल, भारी लगान और कर्ज़ ने लोगों को रोज़गार के हर वादे पर भरोसा करने को मजबूर कर दिया।
यात्रा का अनुभव
यात्रा हफ़्तों या महीनों तक चलती थी। कैरिबियन के रास्ते अफ़्रीका का चक्कर काटकर पहुँचने में 1844 के बाद लगभग 20 हफ़्ते लगते थे। जहाज़ों में भीड़, बीमारियाँ और मौतें आम थीं। इस सफ़र में एक अनोखा रिश्ता बना: एक ही जहाज़ पर आए लोग आपस में जहाज़ी भाई और बहन कहलाते थे।
बाग़ान में जीवन
मज़दूरों को आमतौर पर पाँच साल के अनुबंध पर रखा जाता था। उन्हें गन्ने के खेतों में सुबह से शाम तक काम करना पड़ता था और बाग़ान छोड़ने के लिए पास की आवश्यकता होती थी। अनुबंध में अनुपस्थित रहने या भाग जाने पर सज़ाएँ होती थीं।
कितने लोग प्रभावित हुए?
1834 से 1917 के बीच इस प्रथा ने 13 लाख से अधिक भारतीयों को नई जगहों पर बसाया। मॉरीशस सबसे बड़ा गंतव्य रहा, जहाँ 1834 से 1910 के बीच लगभग 4.5 लाख भारतीय पहुँचे।
विरोध की आवाज़ें
इस प्रथा के खिलाफ भारत में आवाज़ें उठती रहीं। गोपाल कृष्ण गोखले ने 1912 में इसे बंद करने का प्रस्ताव रखा। महात्मा गांधी ने दक्षिण अफ़्रीका में इसके खिलाफ आंदोलन चलाया। जनदबाव बढ़ा और ब्रिटिश साम्राज्य ने 10 मार्च 1917 को इस प्रथा के लिए भर्ती पर रोक लगा दी।
जो लौट नहीं पाए
ज़्यादातर गिरमिटिया वापस नहीं लौटे। उन्होंने नए समाज बनाए और भारतीय संस्कृति के कई पहलुओं को अपने साथ ले गए।
क्या यह प्रथा समाप्त हो गई है?
कानूनी रूप से गिरमिट प्रथा समाप्त हो चुकी है, लेकिन इसके मूल तत्व आज भी कई जगह मौजूद हैं। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के अनुसार, 2021 में 2.76 करोड़ लोग जबरन मज़दूरी में थे।
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