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अजीत सिंह: कैसे एक सरकारी अधिकारी ने पर्यावरण के लिए बनाई नई मिसाल?

अजीत सिंह, जो 'झोला मैन ऑफ इंडिया' के नाम से जाने जाते हैं, ने पर्यावरण संरक्षण के लिए एक अनोखी मुहिम शुरू की है। उनकी प्रेरणादायक कहानी में शामिल है, कैसे उन्होंने अपनी सैलरी का एक हिस्सा कपड़े के झोलों के लिए समर्पित किया और लोगों को प्लास्टिक के नुकसान के प्रति जागरूक किया। जानें उनके अनूठे प्रयास और संकल्प, जो हमें सिखाते हैं कि छोटे बदलाव भी बड़े प्रभाव डाल सकते हैं।
 

अजीत सिंह की प्रेरणादायक कहानी

Ajit Singh Inspirational Story

Ajit Singh Inspirational Story

अजीत सिंह की प्रेरणादायक कहानी: "मैं धरती माँ का सबसे छोटा बेटा हूँ, बस इसकी थोड़ी सेवा कर लेता हूँ। अपनी आवश्यकताओं को कम करके, जो लेता हूँ उससे ज़्यादा देता हूँ।" ये शब्द उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले में कार्यरत एक साधारण लेकिन असाधारण सरकारी अधिकारी अजीत प्रताप सिंह के हैं। आज जब पर्यावरण प्रदूषण एक गंभीर समस्या बन चुका है, अजीत प्रताप सिंह अपनी निष्ठा और अनोखे प्रयासों से समाज को नई दिशा दे रहे हैं। उन्हें 'झोला मैन ऑफ इंडिया' के नाम से भी जाना जाता है।


एक यात्रा, जिसने बदल दी ज़िंदगी

अजीत प्रताप सिंह ने वर्ष 1999 से ग्राम विकास अधिकारी (VDO) के रूप में कार्य करना शुरू किया। उनकी इस मुहिम की शुरुआत 2004 में उत्तराखंड की एक पारिवारिक यात्रा के दौरान हुई। वहां उन्होंने देखा कि लोग प्लास्टिक के बजाय कागज़ के थैले का उपयोग कर रहे थे, क्योंकि वहां प्लास्टिक पर प्रतिबंध था। इस अनुभव ने उन्हें प्रेरित किया कि "ऐसा पूरे भारत में क्यों नहीं हो सकता?" और यहीं से उन्होंने सिंगल-यूज़ प्लास्टिक के खिलाफ लड़ाई शुरू की।


अपनी सैलरी से बाँटते हैं हज़ारों कपड़े के झोले

अजीत का यह अभियान किसी सरकारी फंड या दान पर निर्भर नहीं है। वे हर महीने अपनी सैलरी का लगभग 10% (लगभग 7,000 रुपये) इस नेक कार्य के लिए अलग रखते हैं। वे कपड़ा व्यापारियों से बचे हुए कपड़ों को लागत मूल्य पर खरीदते हैं। इसके बाद, स्थानीय दर्जियों से इन कपड़ों के मजबूत थैले तैयार करवाते हैं। हर महीने वे लगभग 2,000 कपड़े के झोले मुफ्त में बांटते हैं और अब तक 80,000 से अधिक झोले वितरित कर चुके हैं।


15 मिनट का 'पेप टॉक' और अनूठा गणित

अजीत जी किसी को झोला देने से पहले उनसे 15 मिनट का समय मांगते हैं। वे उन्हें प्लास्टिक के नुकसान के बारे में जागरूक करते हैं और सिंगल-यूज़ प्लास्टिक का उपयोग न करने की शपथ दिलाते हैं। उनका एक सरल गणित है जो लोगों पर गहरा प्रभाव डालता है: "अगर एक व्यक्ति रोज़ औसतन 10 प्लास्टिक की थैलियों का इस्तेमाल करता है, तो वह साल में हजारों थैलियाँ कचरे में फेंकता है। लेकिन कपड़े का एक झोला लगभग 5 साल चलता है, जिससे एक व्यक्ति 5 साल में करीब 18,250 प्लास्टिक बैग्स को पर्यावरण में जाने से रोक सकता है।"


पर्यावरण संरक्षण के अन्य अनोखे संकल्प

अजीत का पर्यावरण प्रेम केवल कपड़े के झोलों तक सीमित नहीं है। वे अपनी दिनचर्या में भी पर्यावरण को प्राथमिकता देते हैं। उदाहरण के लिए, उन्होंने अपनी कार को पिछले 20 वर्षों में कभी पानी से नहीं धोया। इसके अलावा, वे अपनी कार में नल की टोटियाँ और औज़ार रखते हैं ताकि वे सार्वजनिक नलों की मरम्मत कर सकें। वे शादी समारोहों में आयोजकों से अनुरोध करते हैं कि वे प्लास्टिक के बर्तनों के बजाय पत्तलों का उपयोग करें। उन्होंने लखनऊ के राम मनोहर लोहिया अस्पताल को अपनी मृत्यु के बाद देहदान करने का संकल्प लिया है।


समाज के लिए एक सच्चा सुपरहीरो

अजीत प्रताप सिंह का कार्य 'स्वच्छ भारत मिशन' के बाद भी सराहा गया है। वे बिना किसी तामझाम के पृथ्वी को बचाने में लगे हैं। उनका जीवन हमें सिखाता है कि अगर हर नागरिक अपने स्तर पर एक छोटा सा बदलाव लाए, तो हम आने वाली पीढ़ियों को एक सुरक्षित और स्वच्छ धरती सौंप सकते हैं।


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