उस्ताद बड़े गुलाम अली खां: भारतीय शास्त्रीय संगीत के अनमोल रत्न
भारतीय संगीत के महानायक
नई दिल्ली, 24 अप्रैल। उस्ताद बड़े गुलाम अली खां, जिनके गाए गीत जैसे 'याद पिया की आए' और 'नैना मोरे तारास गाये' आज भी लोगों के दिलों में बसे हुए हैं, भारतीय शास्त्रीय संगीत के एक अद्वितीय नाम हैं। पटियाला घराने के इस महान गायक ने अपनी आवाज और प्रस्तुति से श्रोताओं पर गहरी छाप छोड़ी। उनका निधन 25 अप्रैल 1968 को हुआ, लेकिन उनके गाने आज भी लोकप्रिय हैं।
संगीत की शुरुआत और परिवार
बड़े गुलाम अली खां का जन्म 2 अप्रैल 1902 को पाकिस्तान के कसूर में हुआ। उनका परिवार संगीत के प्रति समर्पित था, जिसमें उनके पिता अली बख्श खां और चाचा काले खां प्रसिद्ध संगीतज्ञ थे। बचपन से ही उन्हें संगीत की शिक्षा मिली, जिसने उनके करियर की नींव रखी।
संगीत यात्रा
उस्ताद ने अपने जीवन के कई वर्ष लाहौर, बम्बई, कोलकाता और हैदराबाद में बिताए। उनके शिष्य गुलाम अली भी प्रसिद्ध गजल गायक हैं। बड़े गुलाम अली खां ने सारंगी वादक के रूप में अपने करियर की शुरुआत की और बाद में अपने परिवार के संगीतज्ञों से शिक्षा ली।
प्रसिद्धि और योगदान
1919 में लाहौर संगीत सम्मेलन में उनके पहले सार्वजनिक प्रदर्शन ने उन्हें ख्याति दिलाई। उनकी आवाज और शैली ने ठुमरी को एक नया रूप दिया, जिसमें लोक संगीत की मिठास थी। महात्मा गांधी भी उनके भजन 'राधेश्याम बोल' से प्रभावित हुए थे।
फिल्मों में योगदान
बड़े गुलाम अली खां फिल्मों में गाने के खिलाफ थे, लेकिन 'मुगल-ए-आजम' के लिए उन्होंने 25,000 रुपये की मांग की, जो उस समय की सबसे बड़ी रकम थी। उन्होंने फिल्म में तानसेन के किरदार के लिए 'प्रेम जोगन बन के' और 'शुभ दिन आयो' गाए।
अंतिम वर्ष और सम्मान
1947 के विभाजन के बाद वे कुछ समय पाकिस्तान में रहे, लेकिन फिर भारत लौट आए। उन्होंने भारत को अपनी कर्मभूमि बनाया और 1962 में पद्म भूषण और संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित हुए। उनका निधन 25 अप्रैल 1968 को हैदराबाद में हुआ।
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