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कौन हैं पंडित शिवकुमार शर्मा? जानें संतूर के जादूगर की कहानी

पंडित शिवकुमार शर्मा, जिनकी जयंती 13 जनवरी को मनाई जाती है, ने संतूर को वैश्विक पहचान दिलाई और भारतीय शास्त्रीय संगीत में एक नई दिशा दी। उनके पिता की प्रेरणा से शुरू हुआ यह सफर, उन्हें संगीत की दुनिया में एक अद्वितीय स्थान दिलाने में सफल रहा। जानें उनके जीवन की प्रेरणादायक कहानी और संतूर के प्रति उनके योगदान के बारे में।
 
कौन हैं पंडित शिवकुमार शर्मा? जानें संतूर के जादूगर की कहानी

पंडित शिवकुमार शर्मा का संगीत सफर


मुंबई, 12 जनवरी। यह कहा जाता है कि जो कुछ भी किस्मत में लिखा होता है, उसके लिए रास्ते अपने आप खुल जाते हैं। दिवंगत पद्म विभूषण से सम्मानित संगीतकार और संतूर वादक पंडित शिवकुमार शर्मा के साथ भी ऐसा ही हुआ। उन्होंने कश्मीरी वाद्य यंत्र संतूर को वैश्विक पहचान दिलाई और भारतीय शास्त्रीय संगीत को एक नई दिशा दी।


शिवकुमार शर्मा की जयंती 13 जनवरी को मनाई जाती है। इस अवसर पर हम आपको बताएंगे कि कैसे उनके पिता ने उन्हें संतूर बजाने के लिए प्रेरित किया।


कश्मीर के एक पंडित परिवार में जन्मे शिवकुमार के खून में शास्त्रीय संगीत था। उनके पिता, उमा दत्त शर्मा, एक कुशल गायक और शास्त्रीय संगीत के ज्ञाता थे। वे सरकारी रेडियो स्टेशन पर गाते थे और तबला भी बजाते थे। उन्होंने चाहा कि उनका बेटा उनकी विरासत को आगे बढ़ाए, लेकिन एक अलग तरीके से। उन्होंने संतूर पर शोध किया और उसे बजाना सीखा, फिर एक दिन अचानक उसे घर लाकर शिवकुमार को बजाने के लिए कहा।


शिवकुमार ने 5 साल की उम्र से गायन और तबला वादन सीखा था, लेकिन संतूर बजाने का कोई अनुभव नहीं था। पहले तो उन्होंने संतूर बजाने से मना कर दिया, लेकिन उनके पिता की प्रेरणा ने उन्हें संतूर सीखने के लिए मजबूर कर दिया। एक पुराने इंटरव्यू में उन्होंने बताया कि उनके पिता ने कहा था कि 'तुम्हें नहीं पता कि तुम्हारे नाम और संतूर के साथ क्या होने वाला है। ये दोनों एक-दूसरे के पर्याय बन सकते हैं।'


उनकी मां का भी सपना था कि शिवकुमार संतूर बजाएं और संगीत की दुनिया में अपनी पहचान बनाएं। 13 साल की उम्र में उन्होंने संतूर बजाना सीखा और 17 साल की उम्र तक आते-आते वे धुन, राग और ताल के साथ संतूर और तबला दोनों बजाने लगे। उन्होंने रवि शंकर (सितार) और उस्ताद अली अकबर खान (सरोद) के साथ मिलकर कई बॉलीवुड फिल्मों में संगीत दिया।


उन्होंने 'चांदनी', 'फासले', 'डर', और 'लम्हें' जैसी फिल्मों में संगीत दिया। उनका पहला बड़ा काम 'झनक झनक पायल बाजे' में था, और इसके बाद उन्होंने कई प्रसिद्ध संगीतकारों के साथ मिलकर एल्बम 'कॉल ऑफ द वैली' में भी काम किया।


भारतीय शास्त्रीय संगीत में पहले सरोद, शहनाई और वायलिन को प्रमुख माना जाता था, लेकिन शिवकुमार शर्मा ने संतूर को भारतीय संगीत का अभिन्न हिस्सा बना दिया और इस विरासत को अपने बेटे राहुल शर्मा को सौंपा।


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