भारतीय सिनेमा की जड़ों की ओर लौटने की सलाह: पूजा भट्ट और एस.एम.एम. औसाजा की चर्चा
भारतीय सिनेमा का महत्व और युवा निर्देशकों की जिम्मेदारी
मुंबई, 30 अप्रैल। भारतीय सिनेमा केवल मनोरंजन का साधन नहीं है, बल्कि यह देश की संस्कृति और बदलते समय का एक जीवंत दस्तावेज भी है। निर्देशक अक्सर पुरानी और दबाई गई कहानियों को पर्दे पर लाकर युवाओं को उनके गौरवमयी अतीत से परिचित कराते हैं। हालांकि, मौलिक पटकथा के बजाय विदेशी फिल्मों से प्रेरित कहानियों का चलन भी बढ़ रहा है।
अभिनेत्री पूजा भट्ट के पॉडकास्ट में इस विषय पर प्रसिद्ध फिल्म इतिहासकार एस.एम.एम. औसाजा ने चिंता व्यक्त की। उनका मानना है कि युवा फिल्मकारों को पश्चिमी प्रभाव के बजाय अपने समृद्ध इतिहास की ओर ध्यान देना चाहिए। ऐसा करने से न केवल वे मौलिक पटकथा लिख सकेंगे, बल्कि भारतीय मूल्यों और संदेशों को भी मजबूती प्रदान कर सकेंगे।
गुरुवार को पूजा भट्ट ने एस.एम.एम. औसाजा का एक क्लिप इंस्टाग्राम स्टोरीज पर साझा किया, जिसमें उन्होंने युवा निर्देशकों को अपनी जड़ों की ओर लौटने की सलाह दी। पूजा ने उनसे पूछा कि वे उन निर्देशकों को क्या सलाह देंगे जो पुराने रिकॉर्ड्स और इतिहास की अहमियत को नहीं समझते।
इस सवाल का जवाब देते हुए औसाजा ने कहा कि केवल हॉलीवुड से प्रेरणा लेना पर्याप्त नहीं है, क्योंकि उनकी भाषा और संस्कृति हमारी मिट्टी से भिन्न है।
उन्होंने कहा, "भारतीय सिनेमा जानकारियों का एक अथाह सागर है। पुराने सिनेमा में महिलाओं के अधिकार, ऐतिहासिक संदर्भ, कविता और साहित्य की जो बारीकियां हैं, वे कहीं और नहीं मिलतीं। 1930 के दशक से लेकर अब तक का सिनेमा केवल फिल्में नहीं हैं, बल्कि यह भारत के सामाजिक और राजनीतिक बदलावों का दस्तावेज है।"
औसाजा ने यह भी कहा कि आज के निर्देशकों को यह समझना चाहिए कि पंडित नेहरू या इंदिरा गांधी के समय में किस प्रकार की फिल्में बनाई जाती थीं। उन्होंने कहा, "उन्हें जानना चाहिए कि क्या उस समय सरकारी एजेंडे पर फिल्में बनती थीं या सरकार विरोधी फिल्मों को भी जगह मिलती थी। अगर कोई फिल्म निर्माता अपने देश के सिनेमाई इतिहास को नहीं देखता, तो वह सही मायनों में भारतीय मूल्यों को नहीं समझ पाएगा।"
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