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गुलशन बावरा: एक गीतकार की संघर्ष भरी कहानी जो आज भी दिलों में बसी है

गुलशन बावरा, जिनके गाने आज भी लोगों के दिलों में गूंजते हैं, की जयंती 12 अप्रैल को है। जानें उनके संघर्ष की कहानी, जिसमें उन्होंने अपने माता-पिता को खोने के बाद भी गीतकार बनने का सपना नहीं छोड़ा। निर्माता रविंद्र दुबे की शर्तों के बावजूद, उन्होंने बॉलीवुड में अपनी पहचान बनाई। इस लेख में उनके जीवन के अनदेखे पहलुओं पर चर्चा की गई है।
 
गुलशन बावरा: एक गीतकार की संघर्ष भरी कहानी जो आज भी दिलों में बसी है

गुलशन बावरा का अनकहा सफर


मुंबई, 11 अप्रैल। 'चांदी की दीवार न तोड़ी, प्यार भरा दिल तोड़ दिया' और 'यारी है ईमान मेरा यार मेरी दोस्ती' जैसे गाने आज भी लोगों के दिलों में गूंजते हैं। हालांकि, इन गानों के पीछे छिपे गीतकार गुलशन कुमार मेहता, जिन्हें गुलशन बावरा के नाम से भी जाना जाता है, के संघर्ष की कहानी बहुत कम लोग जानते हैं।


गुलशन बावरा की जयंती 12 अप्रैल को है, और इस अवसर पर हम उनके जीवन के कुछ अनदेखे पहलुओं पर चर्चा करेंगे। उनका जन्म पाकिस्तान के शेखुपुर में हुआ था, और विभाजन के समय उन्होंने अपने माता-पिता को खो दिया। इसके बाद, उन्होंने दिल्ली में रेलवे में क्लर्क की नौकरी की, लेकिन कविता लिखने का उनका जुनून उन्हें बॉलीवुड की ओर खींच लाया।


बॉलीवुड में कदम रखने से पहले, उन्हें निर्माता और निर्देशक रविंद्र दुबे ने एक शर्त रखी थी। उन्होंने गुलशन को बताया कि वह केवल गीत लिख सकते हैं, एक्टिंग नहीं कर सकते। गुलशन ने इस शर्त को स्वीकार किया क्योंकि उनका सपना एक गीतकार बनने का था।


गुलशन बावरा ने हिंदी सिनेमा में कई फिल्मों में छोटे-छोटे किरदार निभाए, जैसे कि 'उपकार', 'जाने-अनजाने', और 'अगर तुम न होते'। हालांकि, उनका असली प्यार गीत लेखन ही था।


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