राजेंद्र कृष्ण: हिंदी सिनेमा के अनमोल रत्न जिन्होंने संगीत को नया आयाम दिया
राजेंद्र कृष्ण का अद्वितीय योगदान
नई दिल्ली, 5 जून। हिंदी सिनेमा के महान फनकार राजेंद्र कृष्ण का नाम हमेशा सम्मान के साथ लिया जाएगा। उनका जन्म 6 जून 1919 को जलालपुर जट्टान (अब पाकिस्तान) में एक मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ। राजेंद्र कृष्ण दुग्गल के नाम से जाने जाने वाले इस प्रतिभाशाली व्यक्ति ने अपने लेखन से न केवल महफिलों की रौनक बढ़ाई, बल्कि लोगों को भी प्रेरित किया।
राजेंद्र कृष्ण की प्रारंभिक रुचि कविताओं और शायरी में थी। शिक्षा पूरी करने के बाद, उन्होंने शिमला में सरकारी नौकरी की, लेकिन 1940 के दशक के मध्य में वे मुंबई में अपने सपनों को पूरा करने पहुंचे।
फिल्म उद्योग में अपनी पहचान बनाने के लिए उन्होंने कड़ी मेहनत की। 1948 में, महात्मा गांधी की हत्या के बाद उन्होंने 'सुनो सुनो ऐ दुनिया वालों, बापू की ये अमर कहानी' गीत लिखा, जिसने उन्हें देशभर में प्रसिद्ध कर दिया। मोहम्मद रफी की आवाज में गाया गया यह गीत उस समय हर हिंदुस्तानी की आंखों को नम कर गया।
राजेंद्र कृष्ण एक बहुआयामी प्रतिभा थे। वे गंभीर और रोमांटिक गीतों के साथ-साथ मजेदार और चुलबुले गाने भी लिखने में माहिर थे। 'अलबेला' (1951) का 'शोला जो भड़के', 'पड़ोसन' (1968) का 'एक चतुर नार बड़ी होशियार', और 'ब्लैक मेल' (1973) का 'पल-पल दिल के पास' जैसे गाने उनके लेखन का उदाहरण हैं।
वे एक सफल पटकथा और संवाद लेखक भी थे। 'साधना', 'पड़ोसन', और 'बॉम्बे टू गोवा' जैसी फिल्मों के संवादों में उनकी लेखनी का जादू देखने को मिलता है। 1965 में, 'खानदान' फिल्म के गीत 'तुम्हीं मेरे मंदिर, तुम्हीं मेरी पूजा' के लिए उन्हें फिल्मफेयर अवॉर्ड भी मिला।
23 सितंबर 1987 को राजेंद्र कृष्ण का निधन हो गया, लेकिन उनके गाने आज भी हर पीढ़ी के दिलों में जीवित हैं।
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