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कवि प्रदीप: वो आवाज जिसने देशभक्ति को नया अर्थ दिया

कवि प्रदीप, जिनका जन्म 6 फरवरी 1915 को हुआ, ने 'ऐ मेरे वतन के लोगों' जैसे अमर गीतों की रचना की। उनकी लेखनी ने न केवल देशभक्ति को नया अर्थ दिया, बल्कि कई पीढ़ियों को प्रेरित किया। जानें उनके जीवन की कहानी, संघर्ष और उनके गीतों की भावनाएं।
 
कवि प्रदीप: वो आवाज जिसने देशभक्ति को नया अर्थ दिया

कवि प्रदीप की जयंती: एक अमर गीतकार की कहानी


मुंबई, 5 फरवरी। 'ऐ मेरे वतन के लोगों' जैसे भावुक गीत के रचनाकार कवि प्रदीप की लेखनी में एक अनोखा जादू था, जिसने न केवल पूर्व प्रधानमंत्री को बल्कि लता मंगेशकर को भी भावुक कर दिया। आज भी उनके गीतों में वही देशभक्ति की मिठास और जोश है, जो उन्हें प्रशंसकों के दिलों में विशेष स्थान दिलाता है।


कवि प्रदीप, जिनका असली नाम रामचंद्र नारायणजी द्विवेदी था, का जन्म 6 फरवरी 1915 को मध्य प्रदेश के बड़नगर में हुआ। उन्हें 'ऐ मेरे वतन के लोगों' के लिए याद किया जाता है, जो 1962 के भारत-चीन युद्ध में शहीदों की याद में लिखा गया था। यह गीत आज भी हर भारतीय के दिल में गूंजता है।


लखनऊ विश्वविद्यालय से अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद, प्रदीप ने मुंबई का रुख किया। उन्होंने अपने साहित्यिक सपनों को पूरा करने के लिए कवि प्रदीप नाम अपनाया। 1939 में एक कवि सम्मेलन में उनकी प्रतिभा को देखकर बॉम्बे टॉकीज ने उन्हें 200 रुपए मासिक वेतन पर काम पर रखा, जिससे उनकी रचनात्मक यात्रा की शुरुआत हुई।


उन्होंने लगभग 1700 गीतों की रचना की, जिनमें से कई देशभक्ति से भरे थे। 1940 में फिल्म 'बंधन' का एक गाना इतना जोशीला था कि ब्रिटिश सरकार ने उस पर प्रतिबंध लगा दिया। 1943 में, फिल्म 'किस्मत' के गीतों के कारण उन्हें भूमिगत होना पड़ा।


'ऐ मेरे वतन के लोगों' आज भी उसी सम्मान के साथ गाया जाता है। इस गीत की कहानी भी बेहद भावुक है। जब लता मंगेशकर ने इसे सुना, तो वह भावुक हो गईं और तुरंत गाने के लिए तैयार हो गईं, लेकिन उन्होंने शर्त रखी कि कवि प्रदीप रिहर्सल में मौजूद रहेंगे।


26 जनवरी 1963 को गणतंत्र दिवस पर लता मंगेशकर ने इस गीत को गाया, जिसमें 50,000 से अधिक लोग मौजूद थे। उस समय के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन भी मंच पर थे। गाने के दौरान पूरा स्टेडियम शांत हो गया और नेहरू की आंखों में आंसू आ गए।


कवि प्रदीप को 1997 में दादासाहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया गया, लेकिन उनका व्यक्तिगत जीवन दुखद था। पत्नी के निधन के बाद वह लकवाग्रस्त हो गए और उनकी संतानों ने उन्हें अकेला छोड़ दिया। कोलकाता के व्यवसायी प्रदीप कुंडलिया ने उनकी देखभाल की।


11 दिसंबर 1998 को 83 वर्ष की आयु में कवि प्रदीप का निधन हुआ। उनकी याद में 2011 में डाक टिकट जारी किया गया और 'राष्ट्रीय कवि प्रदीप सम्मान' की शुरुआत की गई।


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