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प्रेम धवन: भारतीय सिनेमा के अमर गीतकार की अनकही कहानी

प्रेम धवन, भारतीय सिनेमा के एक प्रसिद्ध गीतकार, जिन्होंने 'ए वतन, ए वतन' और 'सरफरोशी की तमन्ना' जैसे अमर गीतों की रचना की। जानें उनके जीवन के अनकहे पहलुओं के बारे में, जिसमें एक बड़ा अवसर ठुकराने की कहानी और उनके करियर में आए मोड़ शामिल हैं। उनके योगदान को देखते हुए उन्हें कई पुरस्कार भी मिले। इस लेख में उनके जीवन की यात्रा और उपलब्धियों पर एक नजर डालें।
 
प्रेम धवन: भारतीय सिनेमा के अमर गीतकार की अनकही कहानी

प्रेम धवन का जीवन और करियर


मुंबई, 6 मई। भारतीय फिल्म उद्योग के प्रसिद्ध गीतकार प्रेम धवन के गीत आज भी लोगों में उत्साह भर देते हैं। उनका निधन 7 मई 2001 को हुआ, लेकिन 'ए वतन, ए वतन' और 'सरफरोशी की तमन्ना' जैसे गाने उन्हें अमर बनाए रखते हैं। बहुत कम लोग जानते हैं कि उनके जीवन में एक ऐसा क्षण आया था जब उन्होंने खुद एक बड़ा अवसर ठुकरा दिया था। लेकिन एक मित्र की जिद ने उनके करियर की दिशा बदल दी और उन्हें नई पहचान दिलाई।


प्रेम धवन का जन्म 13 जून 1923 को हरियाणा के अंबाला में हुआ। उनके पिता ब्रिटिश शासन के दौरान जेल अधीक्षक थे। उन्होंने अपनी शिक्षा लाहौर में प्राप्त की, जहां से उनके जीवन की दिशा तय होने लगी। पढ़ाई के दौरान, वह सामाजिक और राजनीतिक गतिविधियों में शामिल हुए, जिससे उनके अंदर देशभक्ति की भावना और मजबूत हुई।


उन्होंने 1946 में अपने करियर की शुरुआत की, जब वह फिल्म 'आज और कल' में एक संगीतकार के सहायक बने। इसके बाद, वह मुंबई आए और इंडियन पीपुल्स थिएटर एसोसिएशन से जुड़े। यहां उन्हें महान संगीतकार रविशंकर से संगीत सीखने का अवसर मिला।


इसी वर्ष, उन्होंने फिल्म 'धरती के लाल' से बतौर गीतकार अपने करियर की शुरुआत की। इसके बाद, उन्होंने कई फिल्मों के लिए गीत लिखे, जिनमें 'आराम', 'तराना', 'आसमान', 'काबुलीवाला', 'एक फूल दो माली' और 'पूरब और पश्चिम' शामिल हैं। उनके गीतों में सादगी और गहराई होती थी, जो सीधे लोगों के दिलों तक पहुंचती थी।


उनके करियर का सबसे दिलचस्प मोड़ फिल्म 'शहीद' के दौरान आया। जब मनोज कुमार ने उनसे इस फिल्म के लिए संगीत देने का अनुरोध किया, तो प्रेम धवन ने मना कर दिया। उनका मानना था कि वह एक अच्छे गीतकार हैं और उन्हें उसी पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। लेकिन मनोज कुमार ने अपनी बात पर अड़े रहकर कहा कि अगर प्रेम धवन संगीत नहीं देंगे, तो वह फिल्म नहीं बनाएंगे। अंततः उनकी जिद के आगे प्रेम धवन को मानना पड़ा।


इसके बाद जो हुआ, वह इतिहास बन गया। फिल्म 'शहीद' के गीत और संगीत लोगों के दिलों में बस गए। 'ए वतन, ए वतन' और 'मेरा रंग दे बसंती चोला' जैसे गाने आज भी देशभक्ति के प्रतीक माने जाते हैं। इस फिल्म ने प्रेम धवन को नई पहचान दी और यह उनके करियर की सबसे बड़ी उपलब्धियों में से एक बन गई।


प्रेम धवन केवल गीतकार और संगीतकार नहीं थे, बल्कि उन्होंने अभिनय और कोरियोग्राफी में भी हाथ आजमाया। उन्होंने 'लाजवाब' और 'गूंज उठी शहनाई' जैसी फिल्मों में अभिनय किया। वहीं, 'नया दौर', 'धूल का फूल' और 'वक्त' जैसी फिल्मों में कोरियोग्राफर के रूप में काम किया। हालांकि इस क्षेत्र में उन्हें उतनी सफलता नहीं मिली, लेकिन उन्होंने हर काम को पूरी मेहनत से किया।


उनके योगदान को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें 1970 में पद्म श्री से सम्मानित किया। इसके बाद 1971 में उन्हें फिल्म 'नानक दुखिया सब संसार' के लिए सर्वश्रेष्ठ गीतकार का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला।


समय के साथ 1980 के दशक में उनके करियर की गति थोड़ी धीमी हो गई, लेकिन उनके गीतों की लोकप्रियता कभी कम नहीं हुई। 7 मई 2001 को 77 वर्ष की आयु में उन्होंने अंतिम सांस ली।


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