जीत सिंह नेगी: गढ़वाली लोक संगीत के जनक की प्रेरणादायक यात्रा
जीत सिंह नेगी का जीवन और संगीत यात्रा
मुंबई, 20 जून। जीत सिंह नेगी, जिन्हें आधुनिक गढ़वाली लोक संगीत का जनक माना जाता है, का जन्म 2 फरवरी 1925 को उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल जिले के अयाल गांव में हुआ। वे एक बहुपरकारी व्यक्तित्व थे, जिसमें संगीतकार, गायक, गीतकार, लेखक, निर्देशक और रंगकर्मी शामिल थे।
जब रेडियो केवल कुछ घरों में ही था और टीवी की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी, तब जीत सिंह नेगी ने लोक संगीत को एक नई पहचान दी और इसे पूरे देश में लोकप्रिय बनाया।
उनके पिता, सुल्तान सिंह नेगी, ब्रिटिश सेना में थे और म्यांमार में तैनात थे, जबकि उनकी माता का नाम रूपदेई देवी था। जीत ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा गांव में प्राप्त की और बाद में अपने पिता के साथ म्यांमार चले गए, जहां उन्होंने कक्षा 6 से 8 तक पढ़ाई की।
इसके बाद, उनके पिता का ट्रांसफर लाहौर हुआ, जहां उन्होंने मैट्रिक की पढ़ाई पूरी की। फिर वे अपने गांव लौट आए और सरकारी कॉलेज से इंटरमीडिएट पास किया। हालांकि, पारिवारिक परिस्थितियों के कारण वे 12वीं के बाद आगे की पढ़ाई नहीं कर सके।
जीत सिंह नेगी को बचपन से ही संगीत में गहरी रुचि थी। 12वीं के बाद उन्होंने गायिकी की ओर कदम बढ़ाया और 1949 में 'यंग इंडिया ग्रामोफोन कंपनी' के लिए अपने छह गीतों की रिकॉर्डिंग की। बाद में, 'एंजेल न्यू रिकॉर्डिंग' ने भी उनके कुछ गीत रिकॉर्ड किए।
वे उत्तराखंड के पहले लोक गायक थे, जिन्होंने 1949 में एलपी रिकॉर्ड (ग्रामोफोन) बनाया। उस समय केवल हिंदी और फिल्मी गीतों के रिकॉर्ड बनते थे। जीत ने अपनी अनूठी प्रतिभा से गढ़वाली लोकगीतों को एक नई पहचान दी।
1954 में, उन्होंने पहली बार आकाशवाणी दिल्ली के लिए अपने गीतों की रिकॉर्डिंग की, जो उस समय एक बड़ी उपलब्धि थी। उनका निधन 21 जून 2020 को 94 वर्ष की आयु में देहरादून के धर्मपुर स्थित अपने निवास पर हुआ। उनकी पत्नी का नाम मनोरमा नेगी है और उनके तीन बच्चे हैं: एक बेटा ललित मोहन नेगी और दो बेटियां, मधु और मंजू।
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