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एसडी बर्मन: संगीत के जादूगर, जिनकी धुनें आज भी दिलों में बसी हैं

31 अक्टूबर 1975 को हिंदी सिनेमा के महान संगीतकार सचिन देव बर्मन का निधन हुआ। उनके संगीत की मिठास और लोकसंगीत की खुशबू आज भी संगीत प्रेमियों के दिलों में बसी हुई है। जानें उनके जीवन, करियर और संगीत यात्रा के बारे में, जिसने उन्हें एक अनमोल रत्न बना दिया।
 

संगीत की दुनिया का अनमोल रत्न




नई दिल्ली, 30 अक्टूबर। 31 अक्टूबर का दिन हिंदी सिनेमा के लिए एक दुखद दिन है, क्योंकि इसी दिन 1975 में महान संगीतकार सचिन देव बर्मन, जिन्हें एसडी बर्मन के नाम से जाना जाता है, का निधन हुआ था। उनकी संगीत रचनाएं, जिनमें मिठास और लोकसंगीत की खुशबू समाई हुई है, आज भी संगीत प्रेमियों के दिलों में जीवित हैं। उन्होंने 'गाइड', 'आराधना', 'प्यासा' और 'बंदिनी' जैसी फिल्मों में संगीत दिया, जो आज भी लोगों द्वारा सुने जाते हैं।


एसडी बर्मन का जन्म 1 अक्टूबर 1906 को पूर्वी बंगाल के कोमिल्ला (वर्तमान बांग्लादेश) में हुआ था। उनके पिता नबद्वीपचंद्र देव बर्मन त्रिपुरा के शाही परिवार से थे, जबकि उनकी मां निर्मला देवी मणिपुर के राजपरिवार की राजकुमारी थीं।


उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा कोमिल्ला में प्राप्त की और बाद में संगीत की औपचारिक शिक्षा ली। उन्होंने केसी डे, भीष्मदेव चट्टोपाध्याय और उस्ताद अलाउद्दीन खान जैसे दिग्गजों से संगीत की बारीकियां सीखी। उनका संगीत के प्रति जुनून इतना गहरा था कि उन्होंने अपनी पढ़ाई को अधूरा छोड़कर संगीत में करियर बनाने का निर्णय लिया।


एसडी बर्मन ने अपने करियर की शुरुआत बंगाली लोकसंगीत और शास्त्रीय संगीत से की। 1930 के दशक में वह कोलकाता रेडियो से जुड़े और 1932 में उनका पहला रिकॉर्ड जारी हुआ। इसके बाद उन्होंने बंगाली फिल्मों में संगीत देना शुरू किया और 1944 में मुंबई आ गए।


फिल्म 'दो भाई' (1947) के गाने 'मेरा सुंदर सपना बीत गया' ने उन्हें हिंदी सिनेमा में पहचान दिलाई। इसके बाद उन्होंने कई हिट फिल्मों में संगीत दिया, जैसे 'बाजी', 'टैक्सी ड्राइवर', 'देवदास', 'प्यासा', 'गाइड' और 'आराधना'।


उनकी खासियत यह थी कि वह हर गायक की आवाज के अनुसार धुन तैयार करते थे। किशोर कुमार के साथ उनकी जोड़ी ने कई यादगार गाने दिए, और 'आराधना' के संगीत ने किशोर कुमार को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया। आशा भोसले, लता मंगेशकर और मोहम्मद रफी के साथ भी उनके कई गाने आज भी लोकप्रिय हैं।


31 अक्टूबर 1975 को मुंबई में उनका निधन हुआ, लेकिन उनके संगीत की विरासत आज भी जीवित है।


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