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शकील बदायूंनी: हिंदी सिनेमा के अमर गीतकार की 110वीं जयंती

इस साल, शकील बदायूंनी की 110वीं जयंती मनाई जा रही है। हिंदी सिनेमा के इस महान गीतकार ने कई अमर गीतों की रचना की, जो आज भी लोगों के दिलों में बसे हुए हैं। उनके जीवन, कार्य और नौशाद के साथ उनकी जोड़ी के बारे में जानें। शकील का योगदान हिंदी फिल्म उद्योग में अद्वितीय है, और उनकी रचनाएँ आज भी संगीत प्रेमियों के बीच लोकप्रिय हैं।
 

शकील बदायूंनी का जीवन और योगदान


नई दिल्ली, 2 अगस्त। मशहूर गीतकार और शायर शकील बदायूंनी का जन्म 3 अगस्त, 1916 को उत्तर प्रदेश के बदायूं जिले में हुआ था। इस साल उनकी 110वीं जयंती मनाई जा रही है। हिंदी सिनेमा को उन्होंने कई ऐसे गीत दिए हैं, जो आज भी लोगों के दिलों में जीवित हैं। उनका निधन 20 अगस्त, 1970 को मुंबई में हुआ।


शकील बदायूंनी का असली नाम शकील अहमद था, लेकिन उन्होंने अपने उपनाम में 'बदायूंनी' जोड़ लिया। अपनी प्रारंभिक शिक्षा पूरी करने के बाद, वे अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय पहुंचे और वहां से पढ़ाई पूरी करने के बाद दिल्ली में सरकारी नौकरी शुरू की। दिल्ली में रहते हुए, उन्होंने मुशायरों में भी भाग लेना शुरू किया। 1940 में उन्होंने सलमा से विवाह किया और 1944 में मुंबई चले गए।


मुंबई में आने के बाद, शकील ने कई यादगार फिल्मी गीत लिखे। उन्होंने न केवल फिल्मी गाने, बल्कि कई भजनों की रचना भी की। उनका लिखा भजन 'बैजू बावरा' का 'मन तड़पत हरि दर्शन को आज...' आज भी लोगों के दिलों में बसा हुआ है। शकील और संगीतकार नौशाद की जोड़ी ने हिंदी सिनेमा को कई बेहतरीन गीत दिए। उन्हें सर्वश्रेष्ठ गीतकार का फिल्मफेयर पुरस्कार भी मिला। उन्होंने कुल 89 फिल्मों के लिए गीत लिखे और केवल 53 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया।


शकील के कुछ बेहतरीन गीतों में 'चौदहवीं का चांद', 'प्यार किया तो डरना क्या', 'न जाओ सैंया छुड़ा के बैयां कसम तुम्हारी', 'हुस्नवाले तेरा जवाब नहीं' और 'सुहानी रात ढल चुकी' शामिल हैं। उनके लिखे गानों ने उन्हें अपार लोकप्रियता दिलाई।


नौशाद के साथ शकील ने पहली बार फिल्म 'दर्द' के लिए लिखे गीतों से जबरदस्त सफलता हासिल की। इसके बाद, नौशाद ने 'दर्द', 'दीदार', 'बैजू बावरा', 'मदर इंडिया', 'मुगल-ए-आजम', 'गंगा जमुना' और 'मेरे मेहबूब' जैसी कई फिल्मों के लिए शकील से गाने लिखवाए।


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