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लीला सैमसन: भारतीय शास्त्रीय नृत्य की धरोहर और भरतनाट्यम की महान नृत्यांगना

लीला सैमसन, भारतीय शास्त्रीय नृत्य की एक प्रमुख हस्ती, ने भरतनाट्यम को अपने जीवन का अभिन्न हिस्सा बना लिया। तमिलनाडु में जन्मी लीला ने कम उम्र में नृत्य की साधना शुरू की और अपने करियर में कई उपलब्धियां हासिल कीं। उन्होंने 'स्पंदा' नामक डांस ग्रुप की स्थापना की और कला के क्षेत्र में महत्वपूर्ण प्रशासनिक भूमिकाएं निभाईं। उनके योगदान के लिए उन्हें पद्मश्री जैसे सम्मान मिले। जानें उनके जीवन और कला के प्रति समर्पण के बारे में।
 
लीला सैमसन: भारतीय शास्त्रीय नृत्य की धरोहर और भरतनाट्यम की महान नृत्यांगना

लीला सैमसन का अद्वितीय सफर


मुंबई, 5 मई। भारतीय शास्त्रीय नृत्य की दुनिया में लीला सैमसन एक महत्वपूर्ण नाम हैं, जिन्होंने भरतनाट्यम को केवल एक कला नहीं, बल्कि अपने जीवन का अभिन्न हिस्सा बना लिया। उन्होंने बहुत कम उम्र में नृत्यांगना बनने का संकल्प लिया, जो बाद में उनकी पहचान बन गया।


लीला सैमसन का जन्म 6 मई 1951 को तमिलनाडु के कूनूर में हुआ। उनके पिता, बेंजामिन अब्राहम सैमसन, भारतीय नौसेना में अधिकारी थे, जबकि उनकी मां, लैला, कला और संगीत की प्रेमिका थीं। इस परिवार के माहौल ने लीला के भीतर कला के प्रति झुकाव को जन्म दिया। उनकी मां ने उन्हें इस दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया।


जब लीला केवल 9 वर्ष की थीं, तब उनके पिता ने उन्हें चेन्नई के प्रसिद्ध 'कलाक्षेत्र' संस्थान में दाखिल कराया। यहीं से उनके नृत्य जीवन की शुरुआत हुई, जहां उन्होंने महान गुरु रुक्मिणी देवी अरुंडेल से भरतनाट्यम सीखा। इस दौरान उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी इस कला को समर्पित करने का निर्णय लिया।


शिक्षा के साथ-साथ, लीला ने नृत्य की साधना जारी रखी। पढ़ाई पूरी करने के बाद भी उन्होंने भरतनाट्यम सीखना नहीं छोड़ा। उनकी मेहनत रंग लाई और वे एक उत्कृष्ट नृत्यांगना के रूप में पहचान बनाई।


अपने करियर की शुरुआत में, उन्होंने दिल्ली के श्रीराम भारतीय कला केंद्र और गंधर्व महाविद्यालय में छात्रों को भरतनाट्यम सिखाया। धीरे-धीरे, उन्होंने भारत के साथ-साथ विदेशों में भी अपनी कला का प्रदर्शन किया, जिसमें यूरोप, अफ्रीका और अमेरिका शामिल हैं।


1995 में, लीला सैमसन ने 'स्पंदा' नामक एक डांस ग्रुप की स्थापना की, जिसका उद्देश्य भरतनाट्यम को नए तरीके से प्रस्तुत करना था, ताकि नई पीढ़ी भी इस कला से जुड़ सके। उन्होंने कई छात्रों को प्रशिक्षित किया, जो बाद में खुद अच्छे कलाकार बने।


लीला ने कला के साथ-साथ प्रशासनिक जिम्मेदारियां भी निभाईं। वह 2005 से 2012 तक कलाक्षेत्र की निदेशक रहीं और संगीत नाटक अकादमी की चेयरपर्सन और सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन (सीबीएफसी) की प्रमुख भी रहीं। इन पदों पर रहते हुए उन्होंने कला और संस्कृति के क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण निर्णय लिए।


उनके योगदान के लिए उन्हें पद्मश्री सम्मान से नवाजा गया, साथ ही संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार सहित कई अन्य बड़े सम्मान भी मिले।


हालांकि उनके करियर में कुछ विवाद भी आए, लेकिन उनकी पहचान एक समर्पित कलाकार और शिक्षक के रूप में बनी रही। उन्होंने हमेशा कला को प्राथमिकता दी और अपनी पूरी जिंदगी इसी के लिए समर्पित की।


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