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राहत इंदौरी: शायरी के बादशाह और खेल प्रेमी की अनकही कहानी

राहत इंदौरी, जिनकी शायरी ने लाखों दिलों को छुआ, केवल एक शायर नहीं थे, बल्कि एक खेल प्रेमी भी थे। जानें उनके जीवन के अनकहे पहलू, उनकी शायरी की गहराई और खेलों के प्रति उनके लगाव के बारे में। उनकी प्रसिद्ध पंक्तियाँ और फिल्मों के लिए लिखे गाने भी चर्चा का विषय रहे हैं। इस लेख में हम उनके जीवन की यात्रा और उनके योगदान पर एक नज़र डालेंगे।
 

राहत इंदौरी का जीवन और उनकी शायरी


मुंबई, 10 अगस्त। राहत इंदौरी का नाम सुनते ही उनकी मशहूर शायरी 'बुलाती है, मगर जाने का नहीं' याद आ जाती है। उनकी रचनाओं में जीवन, रिश्तों और आम आदमी की छोटी-छोटी बातें बखूबी झलकती थीं।


जब वह मंच पर अपनी बात रखते थे, तो दर्शक ध्यान से सुनते थे। शायरी की दुनिया में उन्होंने अपनी एक अलग पहचान बनाई, लेकिन उनके व्यक्तित्व का एक अनोखा पहलू यह था कि उन्हें खेलों में भी गहरी रुचि थी। एक इंटरव्यू में उन्होंने बताया था कि अपने शुरुआती दिनों में वह खुद को एक खिलाड़ी मानते थे और हॉकी तथा फुटबॉल दोनों खेलते थे। उन्होंने 11 अगस्त 2020 को अंतिम सांस ली।


राहत इंदौरी का जन्म 1 जनवरी 1950 को मध्य प्रदेश के इंदौर में हुआ। उनका असली नाम राहत कुरैशी था। इंदौर ने उनकी पहचान को इतना प्रभावित किया कि उन्होंने अपने नाम के साथ 'इंदौरी' जोड़ लिया। उनका बचपन इसी शहर में बीता, जिसने उनके व्यक्तित्व को गहराई से आकार दिया। उनकी शायरी में आम लोगों की जिंदगी, शहर और समाज की झलक मिलती है।


खेल के प्रति अपने लगाव के बारे में राहत इंदौरी ने कहा था, ''मैं शुरुआती दिनों में खुद को एक खिलाड़ी के रूप में देखता था। मैंने हॉकी और फुटबॉल दोनों खेला और स्कूल तथा कॉलेज स्तर पर इन खेलों की कप्तानी की। उस समय मेरे लिए मैदान केवल खेलने की जगह नहीं, बल्कि नेतृत्व सीखने का स्थान भी था। टीम के अन्य खिलाड़ियों के साथ खेलना और जिम्मेदारी लेना मेरे व्यक्तित्व का हिस्सा बन गया था। लेकिन समय के साथ मेरा झुकाव उर्दू साहित्य और शायरी की ओर बढ़ा।''


राहत इंदौरी ने उर्दू साहित्य में उच्च शिक्षा प्राप्त की और मुशायरों में एक बड़ा नाम बन गए। उनकी शायरी में आम आदमी की भाषा थी, जिससे लोग जल्दी जुड़ जाते थे। जब वह मोहब्बत पर लिखते थे, तो उनकी पंक्तियाँ दिल को छू जाती थीं, और जब समाज या व्यवस्था पर लिखते थे, तो उनके शब्दों में सवाल और विरोध स्पष्ट नजर आता था।


इंटरनेट के युग में उनकी पुरानी शायरी को नई पीढ़ी ने भी अपनाया। 'बुलाती है मगर जाने का नहीं' जैसी पंक्तियाँ सोशल मीडिया पर काफी चर्चित रहीं। इस पंक्ति के साथ कई मीम्स भी बने। लेकिन इस लोकप्रियता के पीछे दशकों की मेहनत थी। वह केवल इंटरनेट से मशहूर नहीं हुए, बल्कि देश-विदेश के मुशायरों में अपनी पहचान बना चुके थे।


राहत इंदौरी ने फिल्मों के लिए भी कई गीत लिखे। उनके प्रमुख गानों में 'इश्क' का 'नींद चुराई मेरी', 'करीब' का 'चोरी-चोरी जब नजरें मिलीं', 'मुन्ना भाई एमबीबीएस' का 'छन छन' और 'मर्डर' का 'दिल को हजार बार रोका' शामिल हैं।


11 अगस्त 2020 को 70 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया। कोरोना संक्रमण के कारण उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया था, और अगले दिन उनके निधन की खबर ने साहित्य और फिल्म जगत में शोक की लहर दौड़ दी।


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