झारखंड का पारंपरिक वाद्ययंत्र मांदर अब जीआई टैग के साथ नई पहचान पाएगा!
मांदर को मिला जीआई टैग
रांची, 30 सितंबर (वेब वार्ता)। झारखंड का मांदर, जो कि अखड़ों, लोकनृत्यों और आदिवासी त्योहारों का अभिन्न हिस्सा है, अब देशभर में अपनी विशिष्ट पहचान के साथ जाना जाएगा। भारत सरकार की जियोग्राफिकल इंडिकेशन रजिस्ट्री, चेन्नई ने इसे 'मांदर ऑफ झारखंड' के नाम से पंजीकृत किया है।
जीआई टैग मिलने का अर्थ है कि झारखंड में पारंपरिक तरीके से निर्मित इस वाद्ययंत्र को उसकी भौगोलिक और सांस्कृतिक पहचान के साथ आधिकारिक मान्यता प्राप्त हो गई है। इससे मांदर को अन्य स्थानों पर बनाए जाने वाले समान वाद्ययंत्रों से अलग पहचान मिलेगी। मांदर केवल एक वाद्ययंत्र नहीं है, बल्कि यह झारखंड की सांस्कृतिक धरोहर का प्रतीक है।
झारखंड के कई आदिवासी समुदायों में मांदर बजाने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। पारंपरिक मांदर का खोल स्थानीय मिट्टी से बनाया जाता है, जिसे आकार देकर पकाया जाता है और फिर चमड़े से ढका जाता है। इस निर्माण प्रक्रिया के कारण मांदर की आवाज में एक विशेष गूंज और झंकार होती है, जो इसे अन्य वाद्ययंत्रों से अलग बनाती है।
मांदर को जीआई टैग दिलाने की प्रक्रिया 2021 में शुरू हुई थी, जिसमें एनयूएसआरएल, रांची के डॉ. सत्यदीप सिंह की महत्वपूर्ण भूमिका रही। उन्होंने मांदर की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विशेषताओं से जुड़े दस्तावेज प्रस्तुत किए।
इस प्रक्रिया में गुमला के पूर्व उपायुक्त कर्ण सत्यार्थी और अन्य संस्थाओं का भी योगदान रहा। मांदर की झारखंड से जुड़ी पुरानी परंपरा को साबित करने के लिए विभिन्न ऐतिहासिक और शोध दस्तावेजों का सहारा लिया गया।
जीआई टैग मिलने का सीधा लाभ मांदर बनाने वाले कारीगरों को होगा। इससे पारंपरिक मांदर की पहचान को आधिकारिक मान्यता मिलेगी, जिससे कारीगरों के उत्पाद को बेहतर बाजार उपलब्ध कराने और उनके हुनर को संरक्षित करने में मदद मिलेगी।
गुमला के रायडीह प्रखंड का जरजट्टा गांव मांदर बनाने की पारंपरिक कारीगरी के लिए प्रसिद्ध है। जीआई पहचान मिलने से इन कारीगरों के लिए अपने पारंपरिक हुनर को नए बाजार से जोड़ने की संभावनाएं बढ़ेंगी। मांदर को जीआई टैग मिलना केवल एक वाद्ययंत्र की मान्यता नहीं है, बल्कि यह झारखंड की मिट्टी, कारीगरी और लोकपरंपरा की पहचान है।
.png)