गिरिजा देवी: ठुमरी की रानी का संगीत सफर और उनकी विरासत
गिरिजा देवी का अद्वितीय संगीत सफर
नई दिल्ली, 7 मई। भारतीय शास्त्रीय संगीत की दुनिया में गिरिजा देवी ने अपनी अनोखी पहचान बनाई। उनकी आवाज में भारतीय संगीत की आत्मा का समावेश था। ठुमरी को वैश्विक पहचान दिलाने वाली गिरिजा देवी ने उस समय संगीत की राह चुनी, जब समाज में महिलाओं के लिए मंच पर गाना असामान्य माना जाता था। उन्होंने हर चुनौती का सामना करते हुए खुद को इस ऊंचाई तक पहुंचाया कि उन्हें 'ठुमरी की रानी' के नाम से जाना जाने लगा।
कम ही लोग जानते हैं कि उनके करियर की शुरुआत में ही उन्हें ऐसा सम्मान मिला था, जो उस समय केवल बड़े कलाकारों को ही मिलता था। उनका पहला महत्वपूर्ण रेडियो ऑडिशन लगभग डेढ़ घंटे तक चला, जिसके बाद उन्हें 90 रुपए का मेहनताना मिला, जो उस समय काफी बड़ी रकम मानी जाती थी।
गिरिजा देवी का जन्म 8 मई 1929 को वाराणसी के एक गांव में हुआ। उनके पिता, रामदेव राय, एक जमींदार और संगीत प्रेमी थे। वह खुद भी संगीत सीखते थे और बड़े कलाकारों के कार्यक्रमों में जाते थे। छोटी गिरिजा भी उनके साथ संगीत सभाओं में जाती थीं, जिससे उनका संगीत की ओर झुकाव बढ़ा। यह देखकर उनके पिता ने समाज की परवाह किए बिना उन्हें संगीत सिखाने का निर्णय लिया।
गिरिजा देवी ने केवल पांच साल की उम्र में संगीत की शिक्षा लेना शुरू किया। उनके गुरु पंडित सरजू प्रसाद मिश्रा थे, जिन्होंने उन्हें 'ख्याल' और 'टप्पा' जैसी शास्त्रीय शैलियों में प्रशिक्षित किया। बचपन से ही वह घंटों रियाज करती थीं, हालांकि परिवार के कुछ सदस्य उनके संगीत सीखने के पक्ष में नहीं थे। उनकी मां और दादी चाहती थीं कि वह सामान्य लड़कियों की तरह घर-गृहस्थी पर ध्यान दें, लेकिन उनके पिता ने हमेशा उनका समर्थन किया।
जब भी गिरिजा देवी कोई नया राग सीखती थीं, उनके पिता उन्हें इनाम में गुड़िया लाकर देते थे। यही प्यार और प्रोत्साहन उनके आत्मविश्वास का मुख्य आधार बना। 1944 में उनकी शादी मधुसूदन जैन से हुई, जो उनसे उम्र में काफी बड़े थे। शादी के बाद भी उनका संगीत का सफर जारी रहा, और उनके पति ने उनका समर्थन किया। बाद में उन्होंने श्रीचंद मिश्रा से भी संगीत की शिक्षा ली और अपनी गायकी को और मजबूत किया।
गिरिजा देवी के जीवन में एक महत्वपूर्ण मोड़ तब आया, जब 1949 में उन्हें इलाहाबाद रेडियो से बुलावा मिला। उनका ऑडिशन लगभग डेढ़ घंटे तक चला, जिसमें उन्होंने राग देसी का ख्याल, ठुमरी और टप्पा गाया। ऑडिशन के बाद उन्हें 90 रुपए का मेहनताना मिला, जो उस समय केवल प्रसिद्ध कलाकारों को दिया जाता था। इससे उन्हें एहसास हुआ कि रेडियो ने उन्हें शीर्ष कलाकारों की श्रेणी में रखा है।
इसके बाद, 1951 में उन्होंने बिहार के आरा में अपना पहला बड़ा मंचीय कार्यक्रम किया, जहां उपस्थित बड़े कलाकारों और संगीत प्रेमियों ने उनकी आवाज की सराहना की। धीरे-धीरे उनकी पहचान पूरे देश में बनने लगी। उन्होंने ठुमरी, दादरा, कजरी, चैती और होरी जैसी शैलियों को नई ऊंचाई दी। उनकी गायकी में बनारस और पूर्वी उत्तर प्रदेश की संस्कृति की झलक स्पष्ट थी।
गिरिजा देवी को संगीत में उनके योगदान के लिए कई महत्वपूर्ण सम्मान मिले, जैसे 1972 में पद्मश्री, 1977 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, 1989 में पद्म भूषण और 2016 में पद्म विभूषण। उन्होंने लंबे समय तक संगीत सिखाने का कार्य किया और नई पीढ़ी को भारतीय शास्त्रीय संगीत की परंपरा से जोड़े रखा।
24 अक्टूबर 2017 को दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया। लेकिन उनकी आवाज, ठुमरी और संगीत आज भी लोगों के दिलों में जीवित हैं।
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