हसरत जयपुरी: एक अद्भुत गीतकार की कहानी जो दिलों में बसी है
हसरत जयपुरी का जीवन और करियर
मुंबई, 14 अप्रैल। 15 अप्रैल 1922 को जयपुर में जन्मे इकबाल हुसैन के जीवन में दो अलग-अलग संस्कृतियों का संगम था। एक ओर उनकी अंग्रेजी शिक्षा थी, जबकि दूसरी ओर उनके नाना, प्रसिद्ध शायर फिदा हुसैन से मिली उर्दू और फारसी की गहरी समझ। जब उन्होंने बीस साल की उम्र में पहली मोहब्बत में असफलता का सामना किया, तो उन्होंने 'हसरत' उपनाम अपनाया, जिसका अर्थ है 'अधूरी ख्वाहिश'। इसी नाम से वे फिल्म इंडस्ट्री में हसरत जयपुरी के रूप में मशहूर हुए।
1940 में, हसरत अपनी पत्नी के साथ बंबई चले आए। यह वह समय था जब वे दिन में बसों में टिकट काटते थे और रात में शहर के मशहूर मुशायरों में अपनी कला का प्रदर्शन करते थे। वे खुद को 'रंगीन मिजाज' मानते थे।
एक बार, हसरत ने एक मुशायरे में अपनी भावुक कविता 'मजदूर की लाश' पढ़ी, जिसे महान अभिनेता पृथ्वीराज कपूर ने सुना। उन्होंने हसरत की प्रतिभा को पहचाना और उन्हें अपने बेटे राज कपूर के पास भेजा।
राज कपूर अपनी फिल्म 'बरसात' (1949) के लिए एक गाना लिखवाना चाहते थे। उन्होंने हसरत को एक धुन सुनाई और कहा, "तुम्हारे पास 24 घंटे हैं, इस पर एक गाना लिखकर लाओ।" अगले दिन, हसरत ने राज कपूर को 'जिया बेकरार है, छाई बहार है' का गाना सुनाया, जो बाद में बहुत लोकप्रिय हुआ।
हसरत के पास प्यार के हर रंग के लिए शब्द थे। चाहे वह शम्मी कपूर का बिंदास अंदाज हो या किशोर कुमार की मस्ती, उनके गीत सीधे लोगों के दिलों में उतर जाते थे।
1969 में, उन्होंने फिल्म 'प्रिंस' के लिए एक ऐसा गाना लिखा, जो आज भी पार्टियों की जान है: "बदन पे सितारे लपेटे हुए।"
जब हसरत अपने करियर के शीर्ष पर थे और अच्छी कमाई कर रहे थे, तब उनकी पत्नी ने उन्हें सलाह दी कि वे अपने पैसे मुंबई की रियल एस्टेट में निवेश करें। जब फिल्में मिलना बंद हुईं, तब भी वे किराए की आय से अच्छे से जीवन यापन करते रहे। उन्होंने कभी भी अपने सिद्धांतों या कला से समझौता नहीं किया।
17 सितंबर 1999 को, 77 वर्ष की आयु में हसरत जयपुरी ने इस दुनिया को अलविदा कहा। उन्होंने 1,200 से अधिक गीतों का एक अमूल्य खजाना छोड़ा, जो आज भी लोगों के दिलों में बसा हुआ है।
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