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सुखविंदर सिंह: एक आवाज जो ऑस्कर तक पहुंची, जानें उनके सफर की कहानी

सुखविंदर सिंह की कहानी एक प्रेरणादायक यात्रा है, जो उनके बचपन से शुरू होती है जब शिक्षक उन्हें गाने के लिए प्रेरित करते थे। उनकी अद्वितीय आवाज ने उन्हें ऑस्कर तक पहुंचाया। जानें कैसे उन्होंने अपने करियर में कई पुरस्कार जीते और आज भी संगीत की दुनिया में सक्रिय हैं। इस लेख में उनके जीवन के महत्वपूर्ण मोड़ और उपलब्धियों के बारे में विस्तार से जानकारी दी गई है।
 

सुखविंदर सिंह का अनोखा सफर


मुंबई, 17 जुलाई। गायक सुखविंदर सिंह की बचपन की कहानी दिलचस्प है। कहा जाता है कि जब वह स्कूल में होमवर्क नहीं करते थे, तो शिक्षक उन्हें सजा देने के बजाय गाने के लिए प्रेरित करते थे। उस समय उन्हें यह नहीं पता था कि उनकी आवाज एक दिन ऑस्कर के मंच पर गूंजेगी।


ऑस्कर, जिसे आधिकारिक रूप से एकेडमी अवार्ड्स कहा जाता है, फिल्म उद्योग में उत्कृष्टता के लिए दिया जाने वाला सबसे बड़ा सम्मान है।


सुखविंदर का जन्म 18 जुलाई 1971 को अमृतसर में एक सिख परिवार में हुआ। उन्होंने केवल 8 साल की उम्र में मंच पर कदम रखा और 1970 की फिल्म 'अभिनेत्री' के प्रसिद्ध गीत 'सा रे गा मा पा' को गाकर सभी को चौंका दिया। उनकी संगीत प्रतिभा इतनी अद्वितीय थी कि 13 साल की उम्र में उन्होंने मलकीत सिंह के लिए भांगड़ा गीत 'तूतक तूतक तूतिया' की धुन बनाई, जो आज भी लोकप्रिय है।


किशोरावस्था में, सुखविंदर ने गुरु प्रोफेसर बीएस नारंग से शास्त्रीय संगीत की शिक्षा ली और फिर मुंबई में लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल के साथ म्यूजिक अरेंजर के रूप में काम करना शुरू किया। हालांकि, उन्होंने कुछ समय के लिए इंग्लैंड और अमेरिका का दौरा किया, जहां उन्होंने विभिन्न संगीत शैलियों को सीखा। यह अनुभव उनके लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ, जिसने उनकी आवाज में सूफी और लोक संगीत का अनूठा मिश्रण तैयार किया।


भारत लौटने के बाद, सुखविंदर ने दक्षिण भारत में एआर रहमान के साथ काम किया। उन्होंने एक धुन बनाई, जिसे रहमान ने पहचाना और गुलजार ने इसके बोल लिखे। इस प्रकार 1998 की फिल्म 'दिल से' का प्रसिद्ध गीत 'छैय्या छैय्या' बना।


सुखविंदर को 1998 में 'छैंया छैंया' के लिए फिल्मफेयर का सर्वश्रेष्ठ पुरुष पार्श्वगायक पुरस्कार मिला। 2007 में 'चक दे इंडिया' को राष्ट्रीय खेल गीत का दर्जा मिला। 2008 में 'हौले हौले' को फिल्मफेयर पुरस्कार मिला, और उसी वर्ष 'जय हो' ने ऑस्कर और ग्रैमी जीते। 2014 में 'बिस्मिल' के लिए उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला।


डिजिटल युग में भी, सुखविंदर अपने लाइव प्रदर्शन में कभी ऑटो-ट्यून का सहारा नहीं लेते। वर्तमान में, वह फिल्मों के लिए गाने गा रहे हैं और कई लाइव कॉन्सर्ट में भाग ले रहे हैं। हाल ही में, उन्होंने 'शतक', 'बॉर्डर 2' और 'ओ' रोमियो' जैसी फिल्मों में गाने गाए हैं।


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