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सी. रामचंद्र: संगीत के जादूगर जिनकी धुनों पर लता मंगेशकर भी थीं फिदा

सी. रामचंद्र, एक अद्वितीय संगीतकार, जिनकी धुनें आज भी लोगों के दिलों में बसी हुई हैं। लता मंगेशकर के साथ उनकी गहरी दोस्ती और संगीत के प्रति उनके जुनून ने उन्हें एक अद्वितीय पहचान दिलाई। जानें उनके जीवन, करियर और प्रसिद्ध गानों के बारे में।
 
सी. रामचंद्र: संगीत के जादूगर जिनकी धुनों पर लता मंगेशकर भी थीं फिदा

सी. रामचंद्र का संगीत सफर




मुंबई, 4 जनवरी। फिल्म संगीत की दुनिया में कुछ ऐसे नाम हैं, जिनकी धुनें आज भी लोगों के दिलों में गूंजती हैं। 1940 और 50 के दशक में हिंदी सिनेमा में संगीत का एक सुनहरा युग था, जिसमें सी. रामचंद्र का नाम सबसे ऊपर आता है। उनकी धुनों में एक अनोखी मिठास थी, जो सुनने वालों को तुरंत आकर्षित कर लेती थी। लता मंगेशकर के साथ उनकी कहानी भी बेहद दिलचस्प है।


कहा जाता है कि लता मंगेशकर अक्सर रातभर सी. रामचंद्र के पास बैठकर उनके गानों की बारीकियों को सुनती थीं।


सी. रामचंद्र का जन्म 12 जनवरी 1918 को महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले के बुदवा गांव में हुआ। उनका असली नाम रामचंद्र नरहर चितलकर था। बचपन से ही संगीत में उनकी रुचि थी, और उन्होंने संगीत की शिक्षा भी ली।


शुरुआत में, सी. रामचंद्र ने अभिनय में कदम रखा और यूबी राव की फिल्म 'नागानंद' में मुख्य भूमिका निभाई, लेकिन उन्हें ज्यादा सफलता नहीं मिली। इस अनुभव के बाद उन्होंने संगीत की ओर रुख किया और फिल्म उद्योग में अपनी पहचान बनाने का निर्णय लिया। उन्होंने मिनर्वा मूविटोन के बिन्दु खान और हबीब खान के समूह में शामिल होकर हारमोनियम वादक के रूप में काम करना शुरू किया।


सी. रामचंद्र की संगीत यात्रा का पहला बड़ा मील का पत्थर तमिल फिल्मों में था। लेकिन हिंदी सिनेमा में उन्हें असली पहचान 1942 में भगवान दादा की फिल्म 'सुखी जीवन' से मिली। इसके बाद 1947 में आई फिल्म 'शहनाई' ने उन्हें एक प्रसिद्ध संगीतकार बना दिया। इस फिल्म का गाना 'आना मेरी जान संडे के संडे' आज भी लोगों की जुबान पर है।


1950 के दशक में उनका करियर पूरी तरह से चमक उठा। 1951 में रिलीज हुई कॉमेडी फिल्म 'अलबेला' उनके लिए एक मील का पत्थर साबित हुई। इस फिल्म के गाने जैसे 'भोली सूरत दिल के खोटे', 'शोला जो भड़के दिल मेरा धड़के', और 'किस्मत की हवा कभी नरम, कभी गरम' बेहद हिट हुए। इस दौरान लता मंगेशकर उनकी संगीत प्रतिभा की इतनी बड़ी प्रशंसक बन गईं कि अक्सर रातभर बैठकर उनके गाने सुनती थीं।


सी. रामचंद्र ने हमेशा संगीत में नए प्रयोग किए। उन्होंने पश्चिमी संगीत वाद्यों जैसे ट्रम्पेट, बोंगो, ऑल्टो सैक्स, हारमोनिका और यहां तक कि सीटी को भारतीय संगीत में शामिल किया। उनके गानों में विभिन्न रागों का मिश्रण और पश्चिमी संगीत के तत्वों का संतुलन इसे खास बनाता था।


उनके करियर में लगभग 150 फिल्मों में संगीत शामिल था। उन्होंने हिंदी के अलावा मराठी, तमिल, तेलुगु और भोजपुरी फिल्मों में भी संगीत दिया। उनके सबसे प्रसिद्ध गीतों में देशभक्ति का गाना 'ऐ मेरे वतन के लोगों' शामिल है, जिसे सुनकर प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की आंखें भी नम हो गई थीं।


सी. रामचंद्र को उनके संगीत योगदान के लिए कई पुरस्कार मिले और संगीत प्रेमियों ने हमेशा उनकी सराहना की। उन्होंने अपनी बायोग्राफी 'द सिम्फनी ऑफ माय लाइफ' भी लिखी, जिसमें उन्होंने अपने जीवन और संगीत के सफर की बातें साझा कीं। 5 जनवरी 1995 को उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कहा, लेकिन उनकी धुनें आज भी लोगों के दिलों में बसी हुई हैं।


--News Media


पीके/एबीएम


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