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शम्मी कपूर: कैसे बने हिंदी सिनेमा के 'रिबेल स्टार'?

शम्मी कपूर, हिंदी सिनेमा के एक अद्वितीय अभिनेता, ने अपने करियर की शुरुआत में कई संघर्षों का सामना किया। 50 रुपए महीने की नौकरी से लेकर 'रिबेल स्टार' बनने तक, उनकी कहानी प्रेरणादायक है। जानें कैसे उन्होंने अपने अद्वितीय स्टाइल और रोमांटिक छवि से दर्शकों का दिल जीता।
 

शम्मी कपूर का सफर


मुंबई, 20 अक्टूबर। बॉलीवुड के दिग्गज अभिनेता शम्मी कपूर ने हिंदी सिनेमा में एक नई पहचान बनाई, जिसने हीरो की पारंपरिक छवि को बदलकर रख दिया। उनका अद्वितीय स्टाइल अन्य कलाकारों से अलग था, लेकिन इस मुकाम तक पहुंचना उनके लिए आसान नहीं था। फिल्मी परिवार से होने के बावजूद, उन्हें अपने करियर की शुरुआत में कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।


एक समय था जब वह अपने पिता पृथ्वीराज कपूर के थिएटर में जूनियर आर्टिस्ट के रूप में काम करते थे और उन्हें महीने में केवल 50 रुपए मिलते थे। बाद में, यही व्यक्ति हिंदी सिनेमा के सबसे लोकप्रिय सितारों में से एक बन गया।


शम्मी कपूर का जन्म 21 अक्टूबर 1931 को मुंबई में हुआ। उनका असली नाम शमशेर राज कपूर था। वह प्रसिद्ध अभिनेता पृथ्वीराज कपूर के बेटे और राज कपूर तथा शशि कपूर के भाई थे। उनके परिवार का सिनेमा और थिएटर से गहरा संबंध था। शम्मी ने अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद 1948 में अपने पिता की थिएटर कंपनी पृथ्वी थिएटर्स में काम करना शुरू किया। यहां उन्होंने जूनियर आर्टिस्ट के रूप में काम किया। शुरुआत में उन्हें 50 रुपए महीने मिलते थे, जो 1952 में 300 रुपए तक पहुंच गए।


थिएटर में काम करने के बाद, शम्मी कपूर ने फिल्मों में कदम रखा। उन्होंने 1953 में फिल्म 'जीवन ज्योति' से बतौर हीरो अपने करियर की शुरुआत की। इसके बाद 'रेल का डिब्बा', 'लैला मजनू', 'ठोकर' और 'शमा परवाना' जैसी फिल्मों में नजर आए, लेकिन इनसे उन्हें वह पहचान नहीं मिली, जिसकी उन्हें उम्मीद थी। शुरुआती दौर में उनकी कई फिल्में बॉक्स ऑफिस पर सफल नहीं हो पाईं, जिससे उनकी अलग पहचान बनाना चुनौतीपूर्ण हो गया।


शम्मी कपूर के करियर में 1957 में आई फिल्म 'तुमसा नहीं देखा' ने बड़ा बदलाव लाया। इस फिल्म ने उन्हें एक नए रोमांटिक हीरो के रूप में पहचान दिलाई। इसके बाद 1959 में आई 'दिल देके देखो' ने उनकी लोकप्रियता को और बढ़ाया। 1961 में रिलीज हुई 'जंगली' उनके करियर का एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुई। इस फिल्म में उनका जोशीला अंदाज और 'चाहे कोई मुझे जंगली कहे' गाने में उनका डांस दर्शकों के बीच बेहद पसंद किया गया।


उनका 'याहू' वाला अंदाज उनकी पहचान बन गया। शम्मी कपूर ने 'प्रोफेसर', 'कश्मीर की कली', 'ब्लफ मास्टर', 'जानवर', 'तीसरी मंजिल', 'एन इवनिंग इन पेरिस' और 'ब्रह्मचारी' जैसी फिल्मों में काम किया और 1960 के दशक के प्रमुख सितारों में शामिल हो गए।


उन्हें 1968 में 'ब्रह्मचारी' के लिए फिल्मफेयर का बेस्ट एक्टर अवॉर्ड मिला। 1982 में फिल्म 'विधाता' के लिए उन्हें बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर का फिल्मफेयर अवॉर्ड मिला। 1995 में उन्हें फिल्मफेयर लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड से भी सम्मानित किया गया।


बाद में, शम्मी कपूर ने मुख्य भूमिकाओं के बजाय सहायक भूमिकाएं निभाना शुरू किया। उन्होंने 'प्रेम रोग', 'हीरो', 'विधाता' और रणबीर कपूर की 'रॉकस्टार' जैसी फिल्मों में भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। वह नई पीढ़ी के कलाकारों के साथ भी काम करते रहे। 14 अगस्त 2011 को 79 वर्ष की आयु में उनका निधन हो गया।


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