विनय पाठक की अनकही कहानी: कैसे एक छात्र ने कला की दुनिया में बनाई पहचान?
विनय पाठक का अद्भुत सफर
मुंबई, 11 जुलाई। रामधारी सिंह दिनकर की 'रश्मिरथी' और हरिवंश राय बच्चन की 'मधुशाला' की पंक्तियों को कंठस्थ करने वाले एक बिहार के लड़के की असली यात्रा किसी थ्रिलर फिल्म से कम नहीं है। 1990 के दशक के प्रारंभ में, जब वह एमबीए की पढ़ाई कर रहा था, तब वह अपनी कक्षा के शीर्ष 10 छात्रों में शामिल था। लेकिन एक सुरक्षित कॉरपोरेट करियर की बजाय, उसने थियेटर में पीटर शेफर के नाटक 'ऐकव्स' को देखने के बाद बिना किसी को बताए 'बैचलर ऑफ फाइन आर्ट्स' में दाखिला ले लिया।
सबसे दिलचस्प बात यह है कि विनय पाठक ने चार साल तक अपने परिवार से इस बदलाव को छुपाए रखा। जब दीक्षांत समारोह में कुछ ही दिन बचे थे, तब उन्होंने अपने पिता सच्चिदानंद पाठक, जो बिहार पुलिस में एक सख्त उपाधीक्षक थे, को सच बताया। उनके पिता ने उनकी इस कला के प्रति रुचि का पूरा समर्थन किया।
विनय पाठक का जन्म 12 जुलाई 1968 को बिहार के भोजपुर जिले के बिहिया में हुआ। उनका पालन-पोषण एक पारंपरिक और अनुशासित परिवार में हुआ। उनकी मां किशोरी पाठक एक गृहिणी थीं, जबकि उनके बड़े भाई शशि शेखर पाठक एक प्राध्यापक बने। पिता के पुलिस विभाग में स्थानांतरण के कारण उनका बचपन रांची और धनबाद में बीता। प्रारंभिक शिक्षा रांची के बोर्डिंग स्कूल में हुई, इसके बाद उन्होंने 'सेंट कोलंबा कॉलेज, हजारीबाग' और फिर 'इलाहाबाद यूनिवर्सिटी' से इंग्लिश ऑनर्स की डिग्री प्राप्त की।
1995 में, थियेटर मेंटर डॉ. फारले रिचमंड की सलाह पर उन्होंने भारतीय रंगमंच की ओर कदम बढ़ाया। इसी दौरान, विज्ञापन फिल्मों की शूटिंग के दौरान उनकी मुलाकात सोनिका सहाय से हुई, जिनसे उन्होंने बाद में विवाह किया।
1990 के अंत में मुंबई आने के बाद, विनय पाठक को कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। उन्होंने विज्ञापनों और टेलीविजन से अपने करियर की शुरुआत की, जहां 1998 में धारावाहिक 'हिप हिप हुर्रे' में 'विन्नी सर' के रूप में उन्हें पहचान मिली। रणवीर शौरी के साथ 'रणवीर, विनय और कौन?' और 'द ग्रेट इंडियन कॉमेडी शो' जैसे कार्यक्रमों ने उनकी हास्य प्रतिभा को निखारा। 2006 में 'खोसला का घोसला' में आसिफ इकबाल और 2007 में 'भेजा फ्राई' में सीधे-सादे टैक्स इंस्पेक्टर 'भारत भूषण' के किरदारों ने उन्हें स्टारडम की ऊंचाइयों पर पहुंचाया।
विनय पाठक ने कभी भी खुद को किसी एक शैली में सीमित नहीं रखा। 'जॉनी गद्दार' में नकारात्मक भूमिका हो, 'रब ने बना दी जोड़ी' में राज का भरोसेमंद दोस्त बॉबी या 'गौर हरि दास्तान' में अपनी पहचान की लड़ाई लड़ता वृद्ध स्वतंत्रता सेनानी, उन्होंने हमेशा चरित्र की संवेदनशीलता को जीवित रखा। सुधीर मिश्रा की 'खोया खोया चांद' में उनके अभिनय को विशेष सराहना मिली।
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